आस्था का सवा सौ साल पुराना पहरा और मौन साधना की अनकही कहानी… भाग- 5
‘भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी’ के गौरवमयी 125 वर्ष के इतिहास की अनकही गौरव गाथा की परतें खोलते हुए एक-एक करके सान्ध्य महालक्ष्मी आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही है। भाग-4 में आपने पढ़ा कैसे सन् 1912 में पारनाथ पर्वत के समस्त मंदिर, धर्मशालाएं के अधिकार को लेकर श्वेतांबर समाज के एक मुकदमे ने दिगंबर समाज को झकझोर कर रख दिया। न्याय की पुनीत सुबह आई और सत्य का अभिषेक हुआ। 11 वर्ष का पूर्वजों का अखंड तप के आगे प्रस्तुत है यहां पांचवीं भावपूर्ण कड़ी:
14 जुलाई 2026 /आषाढ़ कृष्ण अमावस /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन

आस्था के मान, प्राचीनता के सम्मान और 6 वर्षों के उस अद्भुत शौर्य की अनकही शौर्य-गाथा
आज 22 अक्टूबर 2026 की यह गौरवमयी सुबह, ‘भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी’ के 125वें स्वर्णिम वर्ष (शतकोत्तर रजत महोत्सव) के महा-यज्ञ में कृतज्ञता की एक नई समिधा है। इस ऐतिहासिक श्रृंखला की पींचवीं भावपूर्ण कड़ी में, आइए आज इतिहास के उस रोमांचक और सांसें रोक देने वाले कानूनी महा-संग्राम की गूँज सुनें, जिसने शिखरजी की पावन वंदना की प्राचीनता, मर्यादा और हर एक जैन यात्री के आत्मसम्मान को हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया।

जब साजिशों के बवंडर ने हमारी अनादि आस्था को घेरना चाहा…
सन् 1920 का वह दौर, जब दिगंबर जैन समाज को रांची की अदालत में ‘इंजंक्शन मुकदमा (नं. 256)’ दायर करने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह केवल कागजों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह उस कुटिल सोच के खिलाफ एक धर्मयुद्ध था, जो हमारे अनादिकालीन अधिकारों को कुचलना चाहती थी।
पावन चरणों से दुस्साहस: हमारे पूज्य, प्राचीन ‘चरण चिह्नों’ को उखाड़कर वहाँ नई आकृतियाँ स्थापित करने का प्रयास किया गया, जिसने समूचे दिगंबर समाज के अंतर्मन को गहरी ठेस पहुँचाई।
भक्ति के मार्ग में कांटे: पावन भाव से वंदना करने वाले यात्रियों को पूजन से रोका गया, और उनके साथ जाने वाले पुजारियों व रक्षकों के मार्ग में व्यवधान खड़े किए गए।
पवित्रता पर प्रहार की तैयारी: नवंबर 1919 से ही पर्वतराज की शांत छाती पर अनधिकृत मकान और फाटक बनाने के लिए सामान इकट्ठा किया जाने लगा, जिससे वंदना मार्ग और पर्वत की अलौकिक शुचिता खतरे में पड़ गई।

धमकियों का साया: सत्य की आवाज उठाने वाले समाज के प्रतिनिधियों और सीधे-सादे श्रावकों को डराया-धमकाया गया, ताकि वे अपने हक की आवाज बुलंद न कर सकें।
रांची से पटना और फिर लंदन… जहाँ सत्य झुका नहीं, थमा नहीं!
इस विकट घड़ी में हमारी तीर्थक्षेत्र कमेटी के महापुरुषों ने अद्भुत सूझबूझ, धैर्य और दूरदर्शिता का परिचय दिया। जब त्योहारों (दुर्गा पूजा की छुट्टियों) की आड़ में चुपके से अवैध निर्माण करने की साजिश रची गई, तो कमेटी ने तुरंत न्याय का दरवाजा खटखटाया।
10 मई 1921 का ऐतिहासिक ‘स्टे’ (र३ं८): अदालत ने साफ शब्दों में आदेश सुनाया— पर्वतराज पर न तो कोई नया निर्माण होगा, न चरणों के साथ कोई छेड़छाड़ होगी, और न ही किसी दिगंबर की भक्ति में कोई विघ्न डाला जाएगा।
पटना हाईकोर्ट की मुहर (21 नवंबर 1922): उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यात्रियों के स्वतंत्र मार्ग में कोई फाटक या अवरोध नहीं खड़ा किया जा सकता। पुजारियों और रक्षकों को साथ ले जाने का अधिकार अक्षुण्ण रहेगा।
लंदन की प्रिवी काउंसिल में अंतिम विजय: साजिशों के ताने-बाने जब सात समंदर पार लंदन की प्रिवी काउंसिल तक पहुँचे, तो वहाँ भी विरोधियों की दलीलों को खारिज (ऊ्र२े्र२२) कर दिया गया। न्याय के वैश्विक मंच ने हमारी जीत पर अंतिम मुहर लगा दी।
6 वर्षों का अखंड न्याय-यज्ञ और ‘मधुबन’ की सुरक्षा
यह धर्मयुद्ध एक या दो दिन का नहीं, बल्कि तीन-तीन अदालतों में पूरे 6 वर्षों तक चला। इसी कठोर साधना के कालखंड में ‘मधुबन बंगला शाला केस’ भी लंदन की प्रिवी काउंसिल तक पूरी ताकत से लड़ा गया, जहाँ हर बार न्याय ने हमारी निष्कलंक आस्था का साथ दिया।

‘कमेटी के ये 125 वर्ष इस बात के साक्षात गवाह हैं कि हमारे पूर्वजों ने केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना ही नहीं की, बल्कि जब-जब आस्था पर आंच आई, अपने पवित्र तीर्थों के मान के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अदालतों में भी सत्य की सिंह-गर्जना की।’

मथुरा का महाधिवेशन: अपनी विरासत के रक्षक बनने का आह्वान!
आइए, पूर्वजों के इस अदभुत शौर्य और समर्पण को नमन करने के लिए मथुरा के इस ऐतिहासिक ‘शतकोत्तर रजत महोत्सव’ के साक्षी बनें और अपनी गौरवशाली विरासत के संरक्षक होने का संकल्प दोहराएं। इस जागरूकता महा महोत्सव की शुरुआत 21- 22 अक्टूबर को सिद्ध क्षेत्र मथुरा चौरासी से स्थविराचार्य श्री सुरत्न सागर मुनिराज के परम सानिध्य में होगी। तीर्थ क्षेत्र कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जंबू प्रसाद जैन, शतकोंत्तर रजत महामहोत्सव के चेयरमैन जवाहरलाल जैन इसके लिए हर अंचल को जोड़कर पूरी तैयारी में लगे हैं।
इस श्रृंखला के अगले भाग में पढ़िए: कैसे हमारे पूर्वजों ने विषम परिस्थितियों में भी तीर्थों का वैभव बनाए रखा और क्या हैं भविष्य की स्वर्णिम योजनाएं। (जारी)



















