सर्वाधिक टैक्स देने वाले, सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे, सबसे समृद्ध जैन समाज एक लुंगी नहीं खरीद कर दे सकते मुनिराज को

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28 अगस्त 2026 /श्रावण शुक्ल पूर्णिमा /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन

॰ लोग चांद पर गये, आप यहीं पर नंगे रहते हैं ॰ कब तक जिओगे रूढ़िवादी रहकर
आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी द्वारा दिगंबरत्व का सही रूप परिभाषित
॰ दिगंबर मुनि प्रकृति रूप, शेष विकृति रूप ॰ निसंगता, निष्परिग्रहता, अयाचक वृति के पालनकर्ता ॰ दिगंबरत्व रूढ़ि नहीं, स्वभाव है

07.08.2026 : एक प्रश्न आया मेरे सामने- ‘यह दिगंबर मुनि दिगंबर क्यों रहते हैं? क्या इस समाज के पास वस्त्र पहनाने की क्षमता नहीं है, पैसे नहीं हैं? जबकि सर्वाधिक देश में वस्त्रालय जैनियों के हैं और देश में सर्वाधिक टैक्स देने वाली समाज जैन समाज है। पूरे भारत की सरकार के लिए सबको मालूम है, पढ़ी-लिखी समाज जैन समाज है।’ यह कहकर आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी ने ऋषभोदय धर्मसभा को लगभग चौंका दिया

‘यह क्यों इस भौतिक युग में, वर्तमान के काल में भी यह लोग भगवान ऋषभदेव, वेद-पुराणों से पूर्व से श्रवण संस्कृति दिगंबरत्व से युक्त हैं, वह आज भी लोग रूढ़ि में जी रहे हैं? अब तो कपड़े पहन लेना चाहिए न इनको? अब तो रूढ़ि छोड़ देना चाहिए न इनको?’

शरद जी, आपने यह प्रश्न किया कि ‘लोग चांद पर पहुँच गए, तुम यही घूम रहे हो नंगे होकर के।’
पहला प्रश्न है- देखा किसने कि तुम चांद पर पहुँचे हो? किसी चट्टान पर उतर जाना, चांद पर पहुँचना नहीं हो जाता। (यह सवाल शास्त्र सम्मत था)।
अगला प्रश्न मेरा आपसे है, आपने कहा कि ‘यह तुम रूढ़ि में ही जीते रहोगे अभी तक?’

मित्र! मैं रूढ़ि में नहीं हूँ, रूढ़ि में आप लोग हो। क्यों? यह दिगंबरत्व रूढ़ि नहीं है, दिगंबरत्व स्वभाव है। रूढ़ि अन्धानुकरण होती है, रूढ़ि अंधविश्वास होती है, पर यह रूढ़ नहीं है – यह स्वभाव है।
सान्ध्य महालक्ष्मी आपसे प्रश्न है- ऐसा लोक में कौन सा जीव उत्पन्न हुआ जो अपनी माँ के पेट से कपड़े पहन के आया हो? जगती इस धरा पर ऐसा चाहे पशु हो… मनुष्य हो, पक्षी हो… मित्र, आपकी संख्या बहुत कम है, सर्वाधिक संख्या हमारी है – दिगंबर हैं सब!

आचार्य श्री बोले – ओहोहो! क्यों? गगन-अंबर शून्य… , अवनी-अंबर शून्य… उसके बीच में रहते दिगंबर! ओहो! कब से, क्यों?
आज तक कोई कपड़े पहन के जन्मा नहीं। कितना तुम श्वेत पहनो, पीले पहनो, गोरे पहनो… कैसे ही पहन लीजिए, यह तुमने पहने हैं! विकृत हुए हो, प्राकृतिक नहीं है, शरद जी और फिर कहा जो प्रकृति का धर्म है- विकृति शून्य है, विकार शून्य है, उसका नाम दिगंबरत्व है। हम लोग नंगे नहीं हैं! जो वासना से गृहीत होता है, वह नंगा होता है। वासना शून्य होकर के जो पृथ्वी पर विचरण करता है, उसका नाम दिगंबर होता है।

दिगंबरत्व की साधना को स्पष्ट करते आचार्य श्री ने कहा – ‘दिगंबरत्व की साधना निसंगता, निष्परिग्रहता, अयाचक वृत्ति, किसी से माँगना नहीं… माँगना पड़ेगा वस्त्र! अयाचक वृत्ति, इसलिए नहीं माँगना मुझे! इसके साथ-साथ दीनता—ठंडी लग रही है, मोटे चाहिए; गर्मी लग रही है, पतले चाहिए… दीनता! एक से ही स्वाधीन हैं, पराधीनता का कष्ट विलीन हो गया है।’
हम स्वाधीन हैं! तुम्हारे गंदे हो जाएँ, तो चेहरा बिगड़ता है; फिर धोने के लिए हिंसा होती है। धुलाओगे तो हिंसा होगी; कपड़े पहनना तो हिंसा, उतारना तो हिंसा; पसीना आ गया, पोंछ दिया – उसमें कितने जीव मर गए! कुछ नहीं… सहज जीवन! अहिंसा परम ब्रह्म की सिद्धि ही दिगंबरत्व है।

प्रश्नसूचक दृष्टि से देखते चैनल महालक्ष्मी को इंगित करते आचार्य श्री बोले –
मित्र! इतना ही नहीं है, साधु में राग-द्वेष हो जाएगा! मतलब? योगी किसी के भक्त बन गए, तो वह सुंदर से सुंदर कटोरा लेकर आए। यहां के प्रधान जी भक्त बन गए, वह बोले – तुमने सोने का कटोरा दिया, मैं हीरे लगाकर दूँगा अपने गुरु को! ओहो! इसलिए दिगंबरत्व ने कहा- जैसा रंग तुम लेकर आए हो, वैसे रहो, यह दिगंबरत्व है- इसमें किसी को हीनदीन नहीं हो सकती।’ अवनी कब से है? अंबर कब से है? तभी से दिगंबर हैं। जब से अवनी, अंबर हैं… मित्र, आप स्वयं प्रश्न कर लीजिए!

प्रश्न है – कपड़े रहित बच्चों का जन्म कब से हो रहा है? बोलो न!
मैंने बंदरों को जन्म देते देखा, गाय-भैंस को जन्म देते देखा, सब के बछड़े-बछिया सब दिगंबर ही होते हैं, निर्वस्त्र ही होते हैं। महिलायें कैसे देखेंगी, इस रूप को, तब उन्होंने अपने जीवन की घटना बताई।
पन्ना जिले में एक देवेंद्र नगर है। वहाँ पर ठंडी का मौसम था और रिमझिम-रिमझिम बारिश भी हो रही थी, जिसको बोलते हैं मावठ।
डॉक्टर सुरेन्द्र के यहाँ एक माँ… जो कि आदिवासी माँ, अपने छोटे से बच्चे का उपचार कराने आई थी। उसी समय, मैं चर्या के लिए वहाँ से निकल पड़ा। सब ठिठुर रहे थे, ठंडी का मौसम था, मैं निकल गया।

वह आदिवासी माँ अपने बच्चे की पीड़ा को भूल करके मुझे रोड पर जाते देखने लग गई।
डॉक्टर साहब से क्या बोलती है? डाक्टर जी, भैया… बुंदेलखंडी में – भैया! भैया, ये तो ऐसे चले जा रहे हैं, जैसे हमारे आँगन में बच्चे घूमते हैं। माँ- डॉक्टर की आँखों में टप-टप आँसू टपक गए। उससे रहा नहीं गया, तुरंत मेरे पास आ गया। बोला, गुरु जी! मैंने कहा, क्या हो गया? एक आदिवासी माँ को नंगा पुरुष नहीं दिखा। आपको देख करके कह रही थी कि ये मेरे आँगन में बच्चे जैसे निकले जा रहे हैं। मित्र! यही दिगंबर धर्म है। यथाजात-रूपोऽहम्! जैसे बालक माँ की गोद में निर्विकार जीता है, ऐसे पृथ्वी की गोद में निर्विकार जिए – उसका नाम दिगंबर मुनि है।

बड़े-बड़े अन्य धर्मगुरु तो जरूर टोकते होंगे, सान्ध्य महालक्ष्मी की इस शंका पर आचार्य श्री ने कहा –
देश में मैंने जगह-जगह विहार किया। कोई कोना नहीं छोड़ रहा हूँ, मैं सब जगह विहार कर रहा हूँ। चाहे वैदिक मठ हों, मंदिर हों, मदरसे हों, धर्मशाला हों, क्रिश्चियन के —गिरजाघर! मित्र, कोई मना ही नहीं करता! इतने विश्वास की मुद्र्रा! बोले, हमारे यहाँ ठहर सकते हैं। अभी उत्तर प्रदेश में, कितने मुस्लिम स्थानों पर रुक कर आ रहे हैं। दक्षिण भारत में, मैं मठों में रुक कर आया हूँ।
एक जगह, मैसूर से मैंने विहार किया। रास्ते में वैदिक मठ था। उनके मठ के जो बड़े महंत जी थे, उन्होंने अपने भक्तों को फोन कर दिया- बेटा, महाराज जी आ रहे हैं, पूरी सेवा करना, पाद-पूजा करना।
एक घंटे तक, मंदिर में बिठाकर के उन्होंने एक घंटे तक पाद-पूजा की। मैं भी बैठा रहा, किसी की श्रद्धा को ठेस मत लगाओ।

फिर उन्होंने दिगंबर स्तोत्र पढ़ना प्रारंभ किया— ‘दिगम्बरा, दिगम्बरा…।’

हे मित्र, मैं सृष्टि पर वस्तु को देखता हूँ। व्यक्ति को देखूँगा तो राग-द्वेष होता है, और वस्तु को देखता हूँ तो निर्विकार दिखाई देती है।