पालगंज की राजभक्ति, वायसराय से टक्कर और ‘परवार स्टेट’ का अमर संकल्प! आस्था का सवा सौ साल पुराना पहरा और मौन साधना की अनकही कहानी… भाग- 6

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आस्था का सवा सौ साल पुराना पहरा और मौन साधना की अनकही कहानी… भाग- 6
‘भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी’ के गौरवमयी 125 वर्ष के इतिहास की अनकही गौरव गाथा की परतें खोलते हुए एक-एक करके सान्ध्य महालक्ष्मी आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही है। भाग-5 में आपने पढ़ा ‘इंजंक्शन केस’ — जब पर्वतराज की पवित्रता की ढाल बनी न्याय की तलवार! रांची से पटना और फिर लंदन… जहाँ सत्य झुका नहीं, थमा नहीं! तीन-तीन अदालतों में पूरे 6 वर्षों तक मुकदमें चले। इसी कठोर साधना के कालखंड में ‘मधुबन बंगला शाला केस’ भी लंदन की प्रिवी काउंसिल तक पूरी ताकत से लड़ा गया। प्रस्तुत है यहां छठी भावपूर्ण कड़ी :

02 अगस्त 2026 /श्रावण कृष्ण दशमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन EXCLUSIVE/

जब तीर्थराज की शुचिता को बचाने के लिए पूर्वजों ने बहाई धन और धैर्य की अविरल गंगा

आज जब 22 अक्टूबर 2026 को ‘भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी’ अपने सवा सौ साल (125वें वर्ष) के पावन पड़ाव पर खड़ी है, तो हमें इतिहास के उन विस्मृत पन्नों को पलटना होगा, जहाँ हमारे पूर्वजों ने कदम-कदम पर त्याग, राजशाही और साम्राज्यवादी ताकतों से लोहा लेकर हमारी आस्था को सुरक्षित रखा। हमारी विशेष शृंखला की इस भावपूर्ण कड़ी में पढ़िए वह इतिहास, जो आपके रोंगटे खड़े कर देगा।

पालगंज राजघराना: राजमुकुट जब झुका जिनशासन के चरणों में
सदियों से पर्वतराज शिखरजी की देखरेख करने वाला पालगंज राजघराना केवल एक शासक नहीं, जिनशासन का अनन्य अनुरागी था। इस घराने की रगों में दिगंबर जैन धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा बहती थी।
श्रद्धा का भव्य देवालय: अपनी इसी अटूट आस्था के प्रतीक स्वरूप, इस राजघराने ने पालगंज में एक भव्य दिगंबर जैन मंदिर का निर्माण कराया। विक्रम संवत 1939 (सन् 1882) की वह पावन सुबह आज भी याद की जाती है, जब पूज्य क्षुल्लक श्री 105 धर्मदासजी महाराज के मंगल सान्निध्य में इस मंदिर की प्रतिष्ठा हुई थी।

संकट में सच्चे हमसफर: नाता इतना गहरा था कि जब कर्मचारियों की अयोग्यता के कारण राजघराने पर कर्ज और आर्थिक संकट के बादल छाए, तो दिगंबर जैन समाज ने एक सच्चे हमसफर की तरह आगे बढ़कर राजा को बड़ा वित्तीय सहयोग दिया। यह राजा और प्रजा का नहीं, बल्कि आत्मा और कृतज्ञता का पवित्र बंधन था।

जब वायसराय की सत्ता से टकराई जैन समाज की एकजुटता (1907)
बात सन् 1907 की है… जब हजारीबाग के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर मि. कैरी की आँखों को पर्वतराज की अलौकिक और नैसर्गिक सुंदरता भा गई। वे पाश्चात्य संस्कृति (इंग्लैंड और स्कॉटलैंड) की तर्ज पर पर्वत की पावन छाती पर एक ‘सेनिटोरियम’ (आरामघर/ मौज-मस्ती का केंद्र) बनाना चाहते थे।

चेतना का देशव्यापी शंखनाद: लेकिन उन्हें क्या पता था कि तीर्थक्षेत्र कमेटी इस तपोभूमि की शुचिता पर एक खरोंच भी नहीं आने देगी! कमेटी के आह्वान पर पूरे देश में विरोध की ऐसी ज्वाला भड़की कि ब्रिटिश सरकार के दफ्तरों में 500 टेलीग्राम (तार) और 1000 प्रार्थना-पत्रों की बाढ़ आ गई।

साम्राज्य का आत्मसमर्पण: अंतत:, अगस्त 1907 में जब समाज का श्रेष्ठिवर्ग सीधे वायसराय से मिला, तो महामहिम को जैन समाज की धार्मिक दृढ़ता के आगे झुकना पड़ा। वायसराय ने आश्वासन दिया कि वे जैन समाज की भावनाओं को आहत नहीं होने देंगे, और वह विलासिता की योजना हमेशा के लिए रद्द कर दी गई।

वो ऐतिहासिक सौदा… जो भाग्य की करवट से रह गया अधूरा (1908)
इतिहास के गर्भगृह में एक ऐसा भावुक पल भी दर्ज़ है, जब सन् 1908 में दिगंबर जैन समाज और तत्कालीन बंगाल सरकार के बीच पर्वत के स्वामित्व (मालिकाना हक) को लेकर बातचीत पूरी तरह सफल हो गई थी।

आस्था की बड़ी आहुति:
कमेटी ने दिगंबर समाज की ओर से उस जमाने में रु. 50,000 की एक विशालकाय राशि सरकारी खजाने में बतौर डिपॉजिट जमा कर दी थी। प्रतिवर्ष रु.12,000 देने का अनुबंध स्वीकार हो चुका था और पर्वत की सीमांकन (हदबंदी) की तैयारियां शुरू थीं।

नियति का क्रूर खेल:
लेकिन हाय रे किस्मत! कानूनी पेचीदगियों के कारण भारत सरकार ने बंगाल सरकार के इस ऐतिहासिक सौदे को अंतिम मंजूरी नहीं दी। इसी बीच कूटनीति के पासे पलटे और पर्वत का मालिकाना हक श्वेतांबर समाज की ओर चला गया। इस पूरी प्रक्रिया में समाज के रु. 40,202 अतिरिक्त खर्च हुए। कमेटी लंदन की प्रिवी काउंसिल तक लड़ी, धन डूबा, पर पूर्वजों का हौसला नहीं टूटा!

‘परवार स्टेट’ — जब हार की राख से उपजा एक नया साम्राज्य!
दिगंबर समाज की डिक्शनरी में ‘हार मान लेना’ शब्द कभी था ही नहीं। जब प्रिवी काउंसिल से निराशा मिली, तो सन् 1913 में कमेटी के तत्कालीन जांबाज मैनेजर श्री मौजीलालजी परवार ने एक भगीरथ कदम उठाया। उन्होंने अपनी सूझबूझ से पर्वत पर 166 एकड़ का विशाल जंगल (जमीन) खरीद लिया और उसे पूरी श्रद्धा के साथ बीसपंथी कोठी को समर्पित कर दिया। आज इसी पावन धरा को हम और आप गर्व से ‘परवार स्टेट’ के नाम से जानते हैं।
इतिहास गवाह है कि दिगंबर जैन समाज ने अपने प्राणप्रिय तीर्थराज की रक्षा के लिए न कभी धन की कमी होने दी, और न कभी अपनी रगों में बहने वाले धैर्य का दामन छोड़ा। (जारी)

इतिहास पुकार रहा है… आओ मथुरा चौरासी चलें – स्थविर संत आचार्य श्री सुरत्न सागर जी
समय केवल बीतता नहीं, इतिहास भी रचता है। कुछ अवसर ऐसे आते हैं, जो पीढ़ियों में एक बार मिलते हैं। भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी का 125वाँ स्थापना वर्ष ऐसा ही एक ऐतिहासिक अवसर है। जिस पुण्यभूमि मथुरा चौरासी पर इस समिति की स्थापना हुई, वहीं से इस गौरवशाली वर्ष का शुभारम्भ हो रहा है। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपने तीर्थों, अपनी संस्कृति और अपने जिनशासन के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है। हम सब तीर्थों में दर्शन करने जाते हैं, पर आज समय की पुकार है कि दर्शन के साथ संरक्षण का भी संकल्प लें। तीर्थ केवल हमारी आस्था के केन्द्र नहीं हैं, वे हमारी पहचान हैं, हमारी संस्कृति हैं और हमारी आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर हैं।

यदि समाज संगठित रहेगा तो तीर्थ सुरक्षित रहेंगे। यदि तीर्थ सुरक्षित रहेंगे तो जिनशासन की गौरवगाथा युगों-युगों तक जीवित रहेगी।
आज मैं समाज के प्रत्येक परिवार, प्रत्येक युवा, प्रत्येक मातृशक्ति और प्रत्येक श्रद्धालु से आग्रह करता हूँ—अपने व्यस्त जीवन से कुछ समय धर्म के लिए निकालिए। 22 अक्टूबर 2026 को मथुरा चौरासी की पावन धरा पर अवश्य पधारिए। अपने बच्चों को भी साथ लाइए, ताकि वे अपने इतिहास, अपनी परम्परा और अपने तीर्थों का महत्व समझ सकें।
आपका वहाँ पहुँचना केवल आपकी उपस्थिति नहीं होगी, बल्कि यह संदेश होगा कि जैन समाज अपनी विरासत के प्रति जागरूक है, संगठित है और अपने तीर्थों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर है।
आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें—
हम तीर्थों का सम्मान करेंगे।
हम धर्म प्रभावना का कार्य करेंगे।
हम समाज की एकता को सुदृढ़ करेंगे।

और आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी आध्यात्मिक धरोहर सुरक्षित रखेंगे।
आइए… मथुरा चौरासी चलें।

आइए… 125 वर्षों के इस गौरवमयी इतिहास के साक्षी बनें।
आइए… धर्म, तीर्थ और संस्कृति के इस महाअभियान में अपना तन, मन, समय और सहयोग समर्पित करें।
धर्म की जय हो।
तीर्थों की जय हो।
जिनशासन की जय हो।
मंगल हो… कल्याण हो…।