॰ सुप्रीम कोर्ट की इस कानूनी लड़ाई पर सख्त टिप्पणी, फैसला किया सुरक्षित
22 सितम्बर 2026 / भाद्रपद शुक्ल पंचमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
‘‘क्या ऐसा संभव है कि सुबह श्वेताम्बर सम्प्रदाय अपनी परम्परा से पूजा करें और शाम को दिगम्बर सम्प्रदाय (उसके) वस्त्र (उतारकर) बदलकर अपनी पद्धति से पूजा करें। आप अनावश्यक मुकदमेबाजी करके भगवान को परेशान कर रहे हैं, इससे आपके भगवान प्रसन्न नहीं होंगे।’’ इस सख्त टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट डबल बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

राजस्थान के करौली जिले में स्थित सुप्रसिद्ध श्री महावीर जी दिगंबर जैन मंदिर के प्रबंधन और नियंत्रण को लेकर दिगंबर और श्वेताम्बर सम्प्रदायों के बीच दशकों से चला आ रहा कानूनी विवाद अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। 09 सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट के माननीय जज जे.बी. पारदीवाला और जज के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए फैसला सुरक्षित कर लिया है। दोनों पक्षों को 8 दिन में अपना लिखित जवाब का समय भी दिया।
इतिहास विवाद का और अदालतों में घटनाक्रम :
सान्ध्य महालक्ष्मी को मिली जानकारी के अनुसार इस विवाद की कानूनी शुरूआत राजस्थान पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1959 के तहत शुरू हुई थी।

1994 में ट्रायल कोर्ट का फैसला:
श्वेताम्बर सम्प्रदाय की ओर से याचिका दायर कर मंदिर का प्रबंधन संभाल रही दिगंबर समिति के अध्यक्ष व सचिव को हटाने और नई प्रबंध समिति बनाने की मांग की गई थी। वर्ष 1994 में ट्रायल कोर्ट ने ‘पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 की धारा 4’ का हवाला देते हुए श्वेताम्बर पक्ष द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया था।
फिर हाइकोर्ट पहुंचे :
निचली अदलात के फैसले के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में अपील की गई। हाईकोर्ट ने माना कि ट्रस्ट अधिनियम की धारा 41 के तहत दिये गये आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है और मामला आगे जैसे ही बढ़ा, दशकों से अपनी परम्परा में चल रहे मंदिर के लिये दिगंबर जैन समिति ने हाइकोर्ट के रूख के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी :
आपस में लड़कर भगवान को परेशान कर रहे हैं।
शिखरजी, केसरियाजी, शिरपुर, चंवलेश्वर जैसे तीर्थों पर विवाद करने से क्या भगवान खुश होते हैं, शायद यही चिंतन करते सुनवाई के दौरान जज महोदय पारदीवाला की पीठ ने दोनों सम्प्रदायों के रवैये को आड़े हाथों लिया और इसे अत्यंत चिंताजनक बताया।
॰ आध्यात्मिक मूल्यों पर सवाल –
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैन धर्म अहिंसा और शांति का संदेश देता है। ऐसे में मंदिर के प्रबंधन पर अधिकार को लेकर इस तरह सालों साल अदालतों के चक्कर लगाना और आपसी कटुता को बढ़ाना, जैन समाज और भगवान महावीर के सिद्धांतों के विपरीत है।
॰ अदालत की टिप्पणी –
क्या ऐसा संभव है कि सुबह श्वेताम्बर अपनी परम्परा से पूजा करें और शाम को दिगंबर सम्प्रदाय वस्त्र बदलकर अपनी पद्धति से पूजा करें? अनावश्यक मुकदमेबाजी करके आप भगवान को परेशान कर रहे हैं?
अब कानूनी पेंच में आज की स्थिति:
दिगंबर पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि मंदिर का प्रबंधन ऐतिहासिक रूप से दिगंबर समाज के ही पास रहा है और यहां मंदिर के धार्मिक स्वरूप को बदलने की कोई मांग नहीं है, इसलिए विवाद केवल प्रशासनिक अधिकारों का है। वहीं दूसरी ओर, श्वेताम्बर पक्ष के अधिवक्ताओं ने प्रबंधन में भागीदारी और अपने अधिकारों की बात रखी।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को 8 दिन के भीतर लिखित दलीलें पेश करने के निर्देश देकर फैसला सुरक्षित रखा है, अदालत की टिप्पणी से स्पष्ट है कि धार्मिक संस्थाओं के बीच प्रशासनिक अधिकारों को लेकर समाज के ताने-बाने को नुकसान पहुंचाती है और इसका समाधान कानूनी दांवपेज की बजाय, आपसी सहमति और सद्भाव से निकाला जाना चाहिए।


















