आचार्य श्री की चर्या विशुद्ध, तन विशुद्ध, वचन विशुद्ध, आहार विशुद्ध, विहार विशुद्ध, ध्यान विशुद्ध ऋषभ विहार हो गया विशुद्ध
08 अगस्त 2026 /श्रावण कृष्ण दशमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
दिल वालों की दिल्ली, आज ज्ञान गंगा में डुबकी मार रही है। ऋषभ विहार में वर्षायोग कर रहे आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी ससंघ के सान्निध्य में मनोरंजन वाले वर्षायोग में आत्मरंजन ने जगह ले ली है। पूज्यपाद स्वामी के समाधितंत्र पर चल रहे प्रवचनों में आचार्य श्री द्वारा सहज रूप में कई बड़ी बातें, श्रद्धालुओं के जीवन में सही दिशा में बदलाव के लिये प्रेरित कर रही है, आज सान्ध्य महालक्ष्मी, इसी तरह की पहली कड़ी प्रस्तुत कर रहा है –

अब दिल्ली में हो यति सम्मेलन
जितने देश में चातुर्मास हो रहे हैं, सभी चातुर्मास मंगलमय हो और दिल्ली में जितने मुनि संघ हैं, ऐसा प्रयास करना एक दिन कि सभी एक साथ बैठकर के कम से कम क्षमावाणी के समय एक साथ रहें। जहां-जहां वर्षायोग चल रहा हो, जितनी कमेटियों में चातुर्मास करा रहे हैं, सभी से देश में एक समाचार जाए कि विश्व में अखंडता फैलाने के लिये जैसे दिल्ली में चातुर्मास हो रहा है, जहां सारे साधु एक साथ होंगे। और फिर तुम देखना पूरे देश में.. जैसे एक समय था, बेणूं नदी के तट पर आचार्य अरहद्वली स्वामी के सान्निध्य में यति सम्मेलन हुआ था। तो एक छोटा सा यति सम्मेलन, आपके यमुना के तट पर दिल्ली में हो जाएगा। पूरा देश मुस्कुराएगा, जब पहले 108 मुनि साधु लालकिले पर भगवान महावीर के जन्म महोत्सव पर आए थे, तब पूरे देश में एक ही चर्चा थी कि राजधानी में इतने दिगंबर मुनि। जो दिगंबरत्व से अपरिचित थे, उन्हें भी लगा कि आज भी दिगंबरत्व जीवित है। ये मुनियों का विहार इसलिए होता है कि भारत की भूमि भगवान महावीर की परंपरा से शून्य अभी नहीं है और साढ़े अट्ठारह हजार वर्ष तक यह दिगंबरत्व का विनाश होने वाला नहीं है। कोई कितने भी प्रश्न खड़े कर ले, चाहे पिच्छी पर करे, चाहे कमंडल पर करे, पर दिगंबर मुनि के हाथ में पिच्छी रहेगी ही रहेगी।
गणधराचार्य की आंखों में आंसू क्यों?
आचार्य श्री ने अपने जीवन का एक प्रसंग बताया कि जब वे कुंथुगिरि गये तो गणधराचार्य की आंखों में आंसू आ गये। हैरत की बात 25 मुनियों का मंच देखकर आंखें गीली हो गई। इन मुनियों को देखकर पानी आ गया। मैंने अचरज भरी नजरों से पूछा – आपकी आंखों में पानी क्यों? वो धीरे से बोले, विशुद्ध सागरजी, जब मेरी दीक्षा हुई थीं, तब पूरे देश में मात्र 25 मुनि थे, महावीर कीर्ति जी से दीक्षा ली थी तब। आज तुम्हारे साथ 25 नौजवान मुनि हैं, सचमुच धर्म बढ़ा है, बस इसी खुशी में आंखें भीग गई।

शौचालय में बैठकर भी जाप
चौंक तो जायेंगे सुनकर, पर आचार्य श्री ने स्पष्ट कहा कि संडास में बैठकर भी आप जाप कर सकते हो। आप कहोगे बीजाक्षर मंत्र शौचालय में बैठकर, जब वहां आप बैठकर इधर-उधर का ध्यान रखते हो तो उसमें भी बीजाक्षर तो होंगे ही। दूसरी बातों में ध्यान लगाने की बजाय, भगवान में ध्यान लगाओ, मुख से बोलिए नहीं, पर मन में तो चिंतन कर सकते हो, मंगल पाठ में रोज पढ़ते भी हो। यदि आपको कहीं और भगवान का नाम लेने का समय नहीं मिले, तो कम से कम संडास में तो ले ही लिया करो। अगर तुम वहां भी नहीं ले पा रहे, तो तुमसे बड़ा अभागा कोई दुनिया में होगा नहीं।

वंश नहीं करना खत्म
आचार्य श्री कहते हैं कि एक छोटी चिड़िया घोंसले में अंडे देकर अपने बच्चों का पालन-पोषण करती है। उसे पता होता है कि पंख आते ही बच्चे उड़ जाएंगे, फिर भी वह उनका पालन करती है ताकि उसका वंश आगे बढ़े। यदि किसी के बेटे या बहुएं बात न मानते हों या दूर रहना चाहते हों, तो भी उनसे झगड़ना नहीं चाहिए और न ही उनका अहित सोचना चाहिए। भले ही वे दूर रहें, लेकिन जब भी नाम लिखेंगे, तो आपका ही नाम चलेगा, इसलिए अपने वंश की रक्षा करें।
सुधारने की कोशिश एक सीमा तक
आचार्य श्री सलाह देते हैं कि घर में सभी को समझाकर रखना चाहिए, लेकिन अतिसुधारने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। उतना ही समझाएं जितने से स्थिति बिगड़े नहीं। समय और परिस्थिति को देखकर काम करें और अत्यधिक समझाने का प्रयास न करें।

अपने ही बैरी बनते हैं
दुुनिया में कोई स्थाई शत्रु नहीं होता। जो अपने सगे सम्बंधी होते हैं, जब हम उनके अनुकूल नहीं चल पाते तो, वे ही विरोधी बन जाते हैं। ज्ञानी पुरुष को अपने घर के सदस्यों से सबसे ेअधिक संभलकर रहना चाहिए क्योंकि उन्हें आपकी हर पल की जानकारी होती है।
बच्चों के पुण्यवर्धक हो नाम
श्रेष्ठ नाम पुण्य आत्माओं को ही मिलते हैं। बच्चों के नाम निरर्थक या उल्टे-सीधे जैसे पिंकी, टिंकी आदि नहीं रखने चाहिए, बल्कि तीर्थंकर भगवान के नाम पर या अर्थपूर्ण रखने चाहिए। यदि मृत्यु के समय भी बच्चे का नाम पुकारा जाए, तो मुख से भगवान का ही नाम निकलेगा। आचार्य श्री अपनी दीक्षा का संस्मरण सुनाते हुए बताते हैं कि जब उनकी दीक्षा श्रेयांसगिरि में हो रही थी, तब लोग ‘श्रेयांस सागर’ नाम रखने का शोर मचा रहे थे। परंतु मेरे मन में विचार आ रहा था कि श्रेयांसगिरि में मेरा नाम ‘विशुद्ध सागर’ रखा जाए। जब गुरुदेव ने नामकरण किया, तो उन्होंने नाम ‘विशुद्ध सागर’ ही रखा। आचार्य श्री कहते हैं कि श्रेष्ठ नाम मिलने के बाद व्यक्ति को अपने आचरण में भी विशुद्धता रखनी चाहिए और संभलकर जीना चाहिए। तब से मैं वही कर रहा हूं। सच है आचार्य श्री की चर्या विशुद्ध, तन विशुद्ध, वचन विशुद्ध, आहार विशुद्ध, विहार विशुद्ध, ध्यान विशुद्ध।

भगवान बिना काम के बनते हैं
भगवान तीर्थंकर कुछ भी काम नहीं करते। गृहस्थ अवस्था से ही, उनका भोजन स्वर्ग से आता है, जब तक मुनि नहीं बनते। वस्त्र-आभूषण स्वर्ग से आते हैं, जब तक मुनि नहीं बनते। मां के आंचल का दुग्ध-पान नहीं करते। उनके अंगुष्ठ में अमृत की स्थापना करके जाता है सौधर्म इन्द्र। आज ये बच्चे नाखून चूसते हैं ना, ये नई बातें नहीं है, पुरानी बातें हैं। भगवान बिना काम के बन जाते हैं।
आचार्य श्री कहते हैं – आया था बीच में दिल्ली, हर मोहल्ले में बुंदेलखंड दिखाई दे रहा था मुझे। जैसे चम्मच में एक चावल टटोल लेते हैं, मैं टटोल के चला गया था कि लोग कहते हैं दिल्ली में कोई कुएं का पानी भरने वाला नहीं मिलेगा, मित्र। यहां मंदिर-मंदिर में कुएं की व्यवस्था हो चुकी है।
भैया, 25 मुनिराज हैं। एक भाई मेरे से कह रहा था, महाराज जी, दिल्ली में तुम बांट देना मंदिर-मंदिर में साधुओं को, इकट्ठे साधु कैसे रह पाएंगे? तो ऐसा है क्या? नहीं है ना? मित्र! जब जाएंगे तो सब चलेंगे, और नहीं तो एक भी नहीं जाएगा।
चातुर्मास दिल्ली में नहीं होना चाहिए
चातुर्मास दिल्ली में नहीं होना चाहिए था। ये बोले आचार्य श्री। तो कहां? किसी नगर में नहीं। मैं उन मुनियों की आराधना करता हूं और भावना भाता हूं – भगवान बनने के पूर्व, सीधे भगवान बनने की मेरी इच्छा नहीं है। एक बार ऐसी तपश्चर्या हो, जैसा आगम सूत्र में लिखा है। यानि ग्रीष्मकाल में दिल्ली के भवनों के पंखों के नीचे नहीं, सूर्य तप रहा हो और पर्वत की चोटी पर खड़े होकर ध्यान करें। चट्टाने चट-चट ग्रीष्मकाल की तपन से, पर मुनि का धैर्य नहीं टूटता है और कर्म टूट जाते हैं।
ऐसे ग्रीष्मकाल में कहां? ग्रीष्मकाल में किसी वृक्ष के नीचे भी नहीं, कोई छतरी के नीचे नहीं, गुफाओं में भी नहीं, तो कहां? जहां सीधा सूर्य की किरणें चेहरे पर पड़ रही हों, पर्वत की चोटी पर। हे सूर्य, तू शरमा करके शाम को विश्राम ले ले, पर योगी विश्राम नहीं लेंगे, वे अविराम खड़े रहेंगे।
ऐसी साधना करेंगे, तब विशुद्ध होंगे।

जो दान नहीं देता वो हत्यारा होता है, क्यों?
जो आप दान दे रहे थे ना, वह भी अहिंसा है। शास्त्रों का ज्ञान न हो, तो विद्वान जी से पूछना कि विशुद्ध सागर सही बोल रहे हैं क्या? जो दान नहीं देता, वह हत्यारा होता है। बोले, किस प्रमाण से? ऐसा प्रश्न किया करो।
कुछ ऐसे लोभी बैठे रहते हैं कि कोई बात नहीं है, तिलक लग जाए थोड़ा सा, तो इतना मोटा तिलक लगा है ना, वह हम छुड़ा लेंगे, घर में जा के रख लेंगे। यह जैन प्रतीक गले में पड़ा हुआ है ना, उसको भी लोग सुरक्षित रख लेंगे कि भैया अपन कहां से खरीदने जाएंगे, अपने यहां कोई आए तो उसका सम्मान अपन कर देंगे। किसी ने तो कितनी माला घर में रख ली हैं?
जैन समाज क्यों है धनपति?
यह जैन समाज देश में धनपति क्यों है? इनके साधुओं ने सब छोड़ दिया, भगवान ने छोड़ दिया, पर इन्होंने भगवान को बहुमूल्य द्रव्य चढ़ाना नहीं छोड़ा। ये श्री जी को बहुमूल्य द्रव्य चढ़ाते हैं। और चढ़ाने के बाद फिर कुछ भी नहीं कहते। कई तो भगवान को चढ़ाने के बाद उठाकर आपस में अपने बांट लेंगे, पर ये बांटते भी नहीं है उसको, निर्माल्य हो गया छोड़ दिया। उठाते भी नहीं हैं दोबारा, जैसे पेट का निकला मल छोड़ने के बाद उसे उठाने जायेंगे क्या? ऐसे दान बोलने के बाद कभी उठाने का मन नहीं करना। और यही उनके धनपति बनने का कारण है।














