‘भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी’ के गौरवमयी 125 वर्ष के इतिहास की अनकही गौरव गाथा की परतें खोलते हुए एक-एक करके सान्ध्य महालक्ष्मी आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही है। भाग-6 में आपने पढ़ा – कैसे झुका पालगंज राजघराना जिनशासन के चरणों में, जैन समाज एकजुट होकर लड़ा वायसराय की सत्ता से, दिगंबर समाज ने आस्था की बड़ी आहुति देते हुए 50 हजार रुपये की विशाल राशि सरकारी खजाने में जमा कराई और 166 एकड़ जमीन खरीदकर बीसपंथी कोठी के सुपुर्द कर दी। प्रस्तुत है यहां 7वीं भावपूर्ण कड़ी :-
19 अगस्त 2026 /श्रावण शुक्ल सप्तमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन EXCLUSIVE/
हजारीबाग से लंदन तक गूँजी सत्य की हुंकार, कलम के देवदूतों और पूर्वजों के त्याग की गाथा

22 अक्टूबर 2026 की यह पावन बेला, ‘भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी’ के 125वें स्वर्णिम वर्ष (शतकोत्तर रजत महोत्सव) के पावन मंच पर हमारे पूर्वजों के पराक्रम को साष्टांग दंडवत करने का क्षण है। हमारी इस विशेष शृंखला की इस कड़ी में आइए, जानें कि कैसे अकेले हमारे प्राणप्रिय तीर्थराज सम्मेद शिखरजी की पवित्रता को बचाने के लिए कमेटी ने अदालतों के मैदानों में युगों-युगों तक चलने वाले धर्मयुद्ध लड़े।

मुकदमों की वो लंबी फेहरिस्त, जहाँ हर पन्ना संघर्ष का गवाह है!
वह कोई एक लड़ाई नहीं थी, बल्कि साजिÞशों के चक्रव्यूह थे, जिनसे अकेले शिखरजी को बचाने के लिए कमेटी ने न्याय का शंखनाद किया।
इतिहास के वो महा-मुकदमे: चाहे वह सीढ़ी केस हो, प्रतिष्ठा केस हो, पर्वतराज की शुचिता को खंडित करने का प्रयास करने वाला पिगरी (ढ्रॅॅी१८) केस हो, चढ़ावा केस हो या फिर कंगला शाला केस—कमेटी हर जगह मर्यादा की रक्षा के लिए चट्टान बनकर खड़ी रही।
अधिकारों का महासंग्राम:
पर्वत के स्वामित्व और हमारी प्राचीन आम्नाय की रक्षा के लिए पट्टा केस, पूजा केस, मंसूखी बैनामा केस, नवागढ़ केस और इंजंक्शन केस जैसे दर्जनों बड़े और सैकड़ों छोटे-मोटे मामलों की पैरवी कमेटी ने पूरी मुस्तैदी और शेर जैसी दहाड़ के साथ की।
हजारीबाग की माटी से सात समंदर पार…लंदन की ‘प्रिवी काउंसिल’ तक सफर
न्याय की यह पुकार केवल देश की स्थानीय अदालतों तक सीमित नहीं रही। जब-जब हमारी आस्था को बांधने की कोशिश हुई, हमारे पूर्वज सीमाओं को लांघ गए:
वैश्विक न्याय-युद्ध: कंगला शाला केस, पूजा केस और इंजंक्शन केस जैसी जटिल कानूनी लड़ाइयों को निचली अदालतों और हाई कोर्ट से खींचकर, सात समंदर पार विलायत (लंदन) की सर्वोच्च अदालत ‘प्रिवी काउंसिल’ तक लड़ा गया।
इसी प्रकार हमारे अधिकारों के दस्तावेज यानी पट्टा केस की गूँज भी लंदन की प्रिवी काउंसिल की चौखट तक पहुँची, जहाँ सत्य के आगे साम्राज्यवादी ताकतों को भी झुकना पड़ा।
कलम के धनी, त्याग के ध्रुवतारे: हमारे कानूनी महायोद्धा
अदालतों के ये मैदान केवल तिजोरियों के बल पर नहीं जीते गए, बल्कि इन्हें जीता उन महापुरुषों ने, जिन्होंने अपनी सुख-सुविधाओं और पैतृक संपत्तियों को तीर्थ-भक्ति के चरणों में न्योछावर कर दिया।

स्व. बाबू चम्पतराय जी बैरिस्टर (त्याग की प्रतिमूर्ति):
वह अद्भुत आत्मा, जिन्होंने तीर्थों की वकालत के लिए अपने निजी खर्च पर बार-बार विलायत (लंदन) की यात्राएं कीं। उन्होंने हजारीबाग, रांची और पटना के अदालती मोर्चों पर महीनों प्रवास कर दिन-रात एक कर दिए।
स्व. बाबू अजितप्रसाद जी एडवोकेट (लखनऊ के गौरव): बरसों-बरसों तक लखनऊ का अपना ऐश्वर्य छोड़कर हजारीबाग और पटना की तंग गलियों में रहे। उन्होंने इस महायज्ञ के लिए समाज से एक पाई भी फीस नहीं ली; बस आँखों में शिखरजी की भक्ति का जल लेकर मुकदमों की नि:शुल्क और अखंड पैरवी की।
समाज की आँखों में कृतज्ञता के अश्रु और अमित ऋण
इन ऐतिहासिक लड़ाइयों में जैन समाज का लाखों-करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा। आज 2026 की इस आधुनिक सुबह में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हमारा मस्तक कृतज्ञता से झुक जाता है। यदि बाबू चम्पतराय जी और बाबू अजितप्रसाद जी जैसे निस्वार्थ महामानवों का संबल न मिला होता, तो समाज वित्तीय भार के नीचे दब गया होता। उन्होंने अपनी कलम से हमारे अधिकारों का अमर कवच तैयार किया।

‘तीर्थक्षेत्र कमेटी के ये 125 वर्ष इस बात के साक्षात गवाह हैं कि जब-जब हमारी श्रद्धा पर संकट के काले बादल छाए, हमारे पूर्वजों ने कानून को अचूक ढाल बनाकर अपनी अगाध आस्था को बचा लिया।’
चलो मथुरा! अपनी विरासत के इतिहास को जीने…
आइए, पूर्वजों के इस अद्भुत शौर्य, निस्वार्थ त्याग और अदालती संघर्षों की गाथा को करीब से महसूस करने के लिए मथुरा में आयोजित होने वाले ‘शतकोत्तर रजत महोत्सव’ के महाकुंभ का हिस्सा बनें। अपनी गरिमामयी उपस्थिति से इस पावन इतिहास को नमन करें!















