जैन सामूहिक क्षमावाणी : कुछ बड़ी बात, कुछ शर्मसार- पूरी दुनिया के सामने, महावीर छवि का उपहास, क्योंकि जैन बने AI के दास

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06 अक्टूबर 2026 / अश्विन कृष्ण एकादशी/चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
॰ महावीर स्वामी प्रतिमा का मंच पर अनादर
॰ विज्ञान भवन में नौ बार गूंजा महामंत्र णमोकार, आचार्य श्री संक्षिप्त प्रवचन में तालियां 21 बार
॰ उपराष्ट्रपति जी ने माना – मेरे तमिलनाडू की संस्कृति, इतिहास, विरासत है जैनों की देन
॰ राज्यपाल ने की बड़ी भूल, जैनों को 2600 वर्ष प्राचीन बताया
॰ क्षमा किसी से मत मांगना, बड़ी बात कह दी आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी ने, पूरे हाल में सन्नाटा
॰ सरकार ही नहीं, दुनिया को बताया कि तिरुकुरल जैन आचार्य द्वारा लिखित
॰ परम्पराओं को निभायें, छीना-झपटी नहीं – आचार्य श्री का बड़ा संदेश

दिन रविवार, 04 अक्टूबर, स्थान – मौलाना आजाद रोड पर विज्ञान भवन और अवसर था सामूहिक जैन समाज के ‘महापर्व क्षमापना समारोह’ का। वैसे देश तो क्या, दिल्ली में ही सैकड़ों जगह क्षमावाणी पर्व मनाया जा चुका, पर तब भी यह इसलिये महत्वपूर्ण था कि यह एक विशिष्ट सरकारी भवन में, भारत के माननीय उपराष्ट्रपति तथा पंजाब के राज्यपाल की उपस्थिति में दोनों सम्प्रदायों द्वारा सामूहिक रूप से मनाया गया।

श्वेताम्बर समुदाय के तीनों पंथ – तेरापंथ से आचार्य श्री महाश्रमण जी के आज्ञानुवर्ती मुनि श्री उदित कुमार जी, स्थानकवासी में आचार्य श्री शिवमुनि जी के आज्ञानुवर्ती उपाध्याय प्रवर श्री रवीन्द्र मुनि जी और मूर्तिपूजक में आचार्य श्री कलापूर्ण सूरी जी समुदाय के आचार्य तीर्थ भद्र सूरी जी के सुशिष्य मुनि श्री तीर्थ निर्वाण विजय जी, वहीं दिगंबर सम्प्रदाय तेरापंथ-बीसपंथ-कांजीस्वामी तीनों का प्रतिनिधित्व किया आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी ने, कारण भी था, क्योंकि वे ये पंथवाद को नहीं मानते, उनके लिए सब समान हैं और शायद आयोजकों ने इसीलिए तीनों श्वेताम्बर सम्प्रदाय के संतों के नामों का उल्लेख नीले और लाल रंग के मिश्रण में लिखा और दिगंबर संत का नाम काले रंग में। हां, दिगम्बरत्व, जैनों की रीढ़ को, पूरा सम्मान भी दिया इस कार्यक्रम में।

नौ बार गूंजा णमोकार महामंत्र

हां, इस विज्ञान भवन को 11 बजे से 2 बजे के बीच एक-दो नहीं, नौ बार णमोकार महामंत्र से गुंजायमान किया गया, जिसको आवाज दी सोनू निगम, अनूप जलोटा, जसविंदर नरुला, कैलाश खेर आदि कई प्रख्यात सिने गीतकारों ने।

महावीर स्वामी प्रतिमा का हुआ अनादर
मंच के बायीं और श्वेताम्बर रूप में महावीर स्वामी की प्रतिमा विराजित की गई, जिसके पास सम्मानित अतिथियों को छोड़, अधिकांश जूते लेकर चले, खड़े रहे।

तीर्थंकर महावीर छवि का उपहास, क्योंकि जैन बन गये AI के दास
महावीर स्वामी उपदेशों को 6 चित्रों के साथ, 10-15 बार बड़ी स्क्रीन पर प्रदर्शित किया गया। इन चित्रों से महावीर स्वामी दिगम्बरत्व का मानो जैन समुदाय द्वारा ही उपहास उड़ाया गया, इससे बुरे, शर्मनाक, अनादर करते दृश्य शायद कभी जैन कार्यक्रम में इस स्तर पर नहीं देखे होंगे।

पहले चित्र में हाथ में कटोरा, दोनों कलाइयों पर कड़े, माथे पर तिलक, सिर के ऊपर धातु का शूल, शरीर पर अंगवस्त्र।

दूसरे चित्र में माथे पर तिलक, शरीर पर वस्त्र, दायां हाथ घुटने पर।

तीसरे चित्र में माथे पर तिलक।

चौथा चित्र थोड़ा ठीक, पर श्रीवत्स सही नहीं और त्रिलोकीनाथ के ऊपर एक छत्र। एक छत्र तो आजकल अंधभक्त मुनिराजों पर भी लगाने लगे हैं, जबकि वह भी गलत है।

पांचवां चित्र, चौथे की तरह भी वैसा ही, पर एक और गलती चिह्न सिंह की बजाय स्वस्तिक का।

छठे चित्र में गलत श्रीवत्स, माथे पर तिलक, बौद्ध रूप में धागे।

सभी 6 चित्र दिगम्बरत्व स्वरूप के दिखाये गये, कारण सभी में नासा दृष्टि दिगम्बरत्व रूप। इससे ज्यादा शर्मसार जैन मंच पर कभी नहीं देखा होगा। गुलाम हो गये आज हम एआई के, क्या संदेश दे रहे हैं पूरी दुनिया को।

जो मोदी जी ने नहीं बताया, वो आचार्य श्री ने दुनिया को बताया
तमिलनाडु से जुड़े उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन को संकेत करते हुए आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी ने भारत सरकार, विशेष कर प्रधानमंत्री और मीडिया, जो पूरा सच नहीं कह पाया, वह पूरी दुनिया को बता दिया जब ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान रूस के राष्ट्रपति पुतिन जी को प्रधानमंत्री द्वारा तिरुक्कुरल ग्रंथ भेंट किया था, वह एक जैनाचार्य थिरुवल्लुवर (1333 कुरल) द्वारा 2000 वर्ष पहले लिखा गया, जिसमें अहिंसा के साथ, प्रथम तीर्थंकर व क्षमा को बखूबी निरूपित किया गया। तमिलनाडु व्याकरण भी जैनों की ही देन है।

उपराष्ट्रपति ने माना कि तमिलनाडु में जैनों का महत्वपूर्ण योगदान
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन जी ने आचार्य श्री की बात को ही आगे करते हुए अंग्रेजी में अपने भाषण में कहा कि तमिलनाडु के इतिहास, संस्कृति, विरासत में जैन धर्म का अनमोल योगदान दिया है। एक समय यहां हर 3 तमिल में से दो जैन धर्म को ही मानते थे। इलगो अडगिल के सिलापधिकमि, उदन कुमार काव्यम्, पेरुकंधै में जैन सिद्धांतों की झलक, महान जैन कवि कनियन् पूंगुन्ड्रनार, उलोचनार, गणिमेधावियार आदि, तोंडैनाडू, नडुनाडु जैन संस्कृति क्षेत्र, जिनकांची, दुन्रुमलाई, तिरुमलाई, विजयामंगलम, चीनापुरम, मन्नारगुडी आदि प्रचीन जैन तीर्थों को भी याद किया।
उन्होंने कहा कि महावीर स्वामी की शिक्षायें न केवल बीत कल और आज के लिये ही नहीं, भविष्य के लिये भी हैं। आज दुनिया में द्वंद, द्वेष बढ़ रहा है, ऐसे में महावीर की अहिंसा का अलग ही महत्व है। क्षमावाणी हमें शांति का संदेश देती, यह दिलों में, भीतर भी शांति का प्रतीक है।

किसी से क्षमावाणी पर क्षमा मत मांगिये – यह क्या कह दिया आचार्य श्री ने, पूरे हाल में छा गया सन्नाटा
आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी ने बड़ी बात कह दी कि क्षमावाणी पर्व कह रहा है कि किसी से क्षमा मत मांगिये। यह सुनते ही विज्ञान भवन में सन्नाटा छा गया। आचार्य श्री ने ही प्रश्न खड़ा करते हुए कहा कि मेहमानों को बुला रखा है, सालों से चल रही परम्परा के साधु-संत भी आये हैं, और कहा क्षमा किसी से मत मांगिये? फिर स्पष्ट किया कि क्षमा किसी से नहीं मांगना चाहिये। तुम क्षमा मांग रहे हो, इसका मतलब तुम कमजोर आदमी हो। कमजोर हो, हमने गलती की, इसलिये क्षमा मांग रहे हो। क्षमा किसी अन्य से नहीं मांगनी चाहिए, यदि क्षमा स्वयं से ही मांगने लग जाओ तो दूसरे से क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

परम्पराओं का निर्वाह करो, छीना-छपटी नहीं,
तभी अखंड, खुशहाली – आचार्य श्री का सभी को कड़ा स्पष्ट संदेश

आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी ने सीमित समय में तीन बड़ी बात कह दी। वर्तमान में दिगंबर तीर्थों पर विवाद, बदलाव की कोशिशों को सभी सम्प्रदायों को कड़ा संदेश श्री उदित महाराज श्री को इंगित करते हुए कहा कि महाराज सारे सम्प्रदायों को बोलिए – अपनी-अपनी परम्पराओं का निर्वाह करो। किसी की छीना-झपटी कर के विकल्प खड़े मत करो। क्योंकि हम अखंडता में जी सकते हैं, तभी भाव अखंड होंगे। सम्पूर्ण राष्ट्र खुशहाली मनायेगा और यह कहेंगे कि यह अनेकांत-स्याद्वाद वाला जैन दर्शन, सम्पूर्ण प्रश्नों का समाधान करने वाला है।

राज्यपाल जी, पहले आप श्रावक, वही पहचान बताइये – आचार्य श्री की दो बड़ी बातें
आचार्यश्री की हर बात से संदेश दूर तक जा रहा था। उनके संक्षिप्त प्रवचन में 21 बार सदन तालियों से गुंजायमान हुआ। उन्होंने राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया जी से प्रश्न किया कि राज्यपाल जी आप पहले श्रावक बने या राज्यपाल। वे बोले – पहले श्रावक। बस आचार्यश्री मुस्करा कर बोले – अब आप जब भी पानी पीयें, तो पानी छानकर पीजिए, जिससे साथ वाले समझ जायें कि वे एक जैन श्रावक के पास बैठे हैं। उनको संकेत करते यह संदेश हर जैन के लिए था। यही नहीं, उन्होंने स्पष्ट कहा कि जैन धर्म सनातन है। (लोग आज सनातन से हिंदू धर्म समझने लगते हैं, जबकि सनातन का अर्थ अति प्राचीन है)।

इस अवसर पर मुनिश्री तीर्थ निर्वाण विजय जी ने बिना माइक के इतनी बड़ी सभा को क्षमावाणी पर सम्बोधित करते हुए संदेश दे दिया कि उनका गुरु संघ इलैक्ट्रानिक उपकरण का भी प्रयोग नहीं करते। उपाध्याय प्रवर श्री रवीन्द्र मुनि जी तथा मुनि श्री उदित कुमार जी ने भी क्षमावाणी के महत्व पर प्रकाश डाला।

क्षमावाणी पर संकुचित मत करो, इसका विस्तार करो: राज्यपाल
पंजाब के राज्यपाल श्री गुलाब चन्द्र कटारिया जी ने भी क्षमावाणी को मात्र जैन की सीमाओं से सभी में इसके महत्व पर प्रकाश डालने की बात कही। उन्होंने कहा कि इसे केवल जैन समाज ही पर्व के रूप में मत बांधिये, सभी समाजों को इसकी महत्ता से अवगत कराइये। पर उन्होंने एक बड़ी भूल कर दी और जैन धर्म का इतिहास संस्कृति मात्र 2600 वर्ष प्राचीन बताया, जो निश्चय ही जैन समाज को राजनीतिक गलियारों के द्वारा बार-बार छोटा बताने की ओर जरूर संकेत करता है।