विशुद्ध सागर को गोली मार दूंगा और फिर क्या होगा?

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04 नवंबर 2026 / कार्तिक कृष्ण दशमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
क्या कोई यह बोल भी सकता है, पर यह 100 % सच है और वो भी एक जैन द्वारा, क्या आप सोच सकते हैं, पर ऐसा ही हुआ। आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी के साथ नागपुर चातुर्मास से पहले। क्या हुआ ये सान्ध्य महालक्ष्मी नहीं, सीधे आचार्य श्री के मुख से उन्हीं के शब्दों में –
‘जैसे ही हम लोग पहुंचे, नागपुर में समाज उमड़ पड़ी, तभी एक व्यक्ति ने बोल दिया कि विशुद्धसागर हमारे मोहल्ले में आए, तो गोली मार दूंगा।’ मैंने कहा, मित्र, मैं तो शुद्ध दिगम्बर जैन हूं। ऋषभदेव से महावीर तक, महावीर से ऋषभदेव तक ही नहीं, अनंतानंत चौबीसियों का भक्त हूं और भगवान ने जो कहा है, वह असत्य होगा तो गोली मुझे लगेगी, और सत्य होगा… तो गोली फूल बनेगी।

बात हैरानगी भरी थी, फिर आचार्य श्री ने कहा – प्रभु की वाणी झूठी हो ही नहीं सकती। परघात नामकर्म का उदय होगा, तो गोली मुझे लगेगी, और परघात का उदय नहीं होगा, तो गोली फूल बनेगी। लोगों ने लाख मना किया कि महाराज मत जाइए।

पर उन्होंने कहा, भाई, पर की बातों से काम का निर्णय नहीं लेना चाहिए, अपनी योग्यता का निर्णय करना चाहिए। नागपुर में हमने चातुर्मास किया, तो नागपुर में लोग उलटा श्रीफल चढ़ाने आए मुझे, आप आओ मत। मैंने स्वयं से कहा कि, महात्मा जी, शांतिसागर महाराज जी गए थे। यदि वह नहीं जाते, तो नगर में मुनियों का विचरण बंद हो जाता।
मना करने वाला कोई एक अभागा होगा, वह भी भगवान आत्मा है। उसकी कषाय बोल रही है। समता है, ऐसे अपनी समता मत हटाइए, नहीं तो मुनियों का विहार बंद हो जाएगा। ये व्यक्तिगत साधु को बुलाएंगे, नमो सव्वसाहूणं, सब भूल जाएंगे।

मित्र मैं गया, ऐसा चातुर्मास हुआ नागपुर में… रोडों पर लोग, रोडें भरी होती थीं प्रवचन में। मैं उस गांव में गया, जहां गोली लगनी थी। बिल्कुल भगवान के नाम ले रहा, प्रभु! आज… कर्म सिद्धांत की परीक्षा है। लगती तब भी मैं खुश हूं, और नहीं लगती तब भी खुश हूं। जैसे मैंने प्रवेश किया तो उस मोहल्ले में, सबसे पहले वही घर मिला, जहां से आवाज आई थी। नीचे थाल और कलश भरा जल रखा हुआ था। मैं देख रहा था, यहां तो गोली-वोली दिखाई ही नहीं दे रही है। पाद प्रक्षालन करके पुष्प-वृष्टि की। मैंने मित्र, सत्य यह है, गोली.. गोली मनुष्य को नहीं, परघात नामकर्म को लगती है। पुण्य की क्षीणता को लगती है। पुण्यात्मा मित्र, शत्रु के घर में पुष्पमाला पहनता है और पुण्य-क्षीण अपने घर के फंदे पर टंग जाता है।

यह है आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी का प्रताप। आजकल दिल्ली के विभिन्न मंदिरों में विहार हो रहा है, जहां भी जायें, वहां श्रद्धालु उस जगह को छोटा कर देते हैं। चैनल महालक्ष्मी के ऐपिसोड नं. 3879 में इसकी पूरी जानकारी देख सकते हैं।