25 अक्टूबर 2026 / अश्विन शुक्ल चतुर्दशी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
जहां धर्म की ज्योति जले, हर दिल में विश्वास जगे,
मथुरा चौरासी की पावन माटी, तीर्थ सुरक्षा जयघोष से
शतकोत्तर रजत का यह उत्सव, गाता है गौरव गाथा नई
अहिंसा – संयम की धारा, युग-युग तक बहती रही।

भारतीय संस्कृति और उसमें दिगंबर जैन परम्परा हो, तो उसके इतिहास में कुछ आयोजन मात्र उत्सव नहीं होते, बल्कि वे आने वाले युगों की दशा तय करने वाले मील के पत्थर रूप में स्थापित हो जाते हैं। दशमी-एकादशी, आश्विन के शुक्ल पक्ष की, धरा अंतिम श्रुत केवली की सिद्ध भूमि मथुरा चौरासी और उस पर भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के 124 वर्ष की अनवरत यात्रा के रूप में आयोजित ‘शतकोत्तर रजत महामहोत्सव’ पूरे जाने समाज के लिए धार्मिक, विधिक,प्रशासनिक और संगठनिक भविष्य के लिए एक स्मरणीय अत्यंत महत्वपूर्ण महाधिवेशन के रूप में चिर अंकित हो गया। इस कार्यक्रम में देशभर से पधारे तीर्थक्षेत्र कमेटी के प्रमुख पदाधिकारियों सहित तीर्थ सुरक्षा के लिए संकल्पित हजारों प्रहरियों ने लगभग 100 तीर्थ चक्रवर्तियों की उपस्थिति में आचार्य श्री सुरत्न सागरजी ससंघ के पावन सान्निध्य में से अभूतपूर्व बल दिया।

इस भव्य आयोजन का मुख्य उद्देश्य धूम-धड़ाका, पार्टी उत्सव नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन परम्पराओं को स्मरण करते हुए, वर्तमान समय में तीर्थक्षेत्रों की सुरक्षा, समाज के विभिन्न अंगों के बीच समन्वय और आपसी कानूनी व प्रशासनिक चुनौतियों का ठोस समाधान खोजना भी था।
जरूरत है दिगंबर-श्वेताम्बर समाज के बीच संवाद व वैचारिक मंथन की

मतभेद की दीवारों को अब मिलकर गिराना होगा,
अहंकार त्यागकर, समझौते का दीप जलाना होगा।
जीत हार की इस रेस में, अब सबकुछ खोने की बारी है,
झुकना पड़े तो झुक जायें, क्योंकि अस्तित्व बचाने की तैयारी है।
सान्ध्य महालक्ष्मी की यह टिप्पणी कई को कठोर लग सकती है, पर आज समय सब खोने का नहीं, आपस में बांटकर बचाने का है और यही बात तीर्थक्षेत्र कमेटी के इस मंच से सबसे प्रखर होकर उभरी, जिसमें समाज के आंतरिक पक्षों, विशेषकर दिगंबर और श्वेताम्बर सम्प्रदायों के बीच चल रहे मुकदमों और मतभेदों पर खुलकर चर्चा की गई। सान्ध्य महालक्ष्मी द्वारा इस अवसर पर निकाले गये विशेष परिष्टि में प्रकाशित लेखों से भी स्पष्ट था कि आज आपस में अनेक तीर्थों पर लड़ाई हो चुकी है और कई पर अब भी जारी है।
प्रशासनिक और विधिक रणनीति में अधिकार और संवाद के साथ नई रूपरेखा
कानून के पन्नों पर जब इक बात लिखी जाएगी,
प्रशासन की चौखट पर, न्याय की लौ जगमगाएगी।
अकेला राहगीर तो थक जाता है, कारवां जब बनता है साथ,
तब सरकारें झुकती हैं, जब उठते हैं, लाखों हाथ।।

यह सच है आज के जमाने में खोपड़ियां गिनी जाती हैं? खोपड़ियों में क्या है, उसको तो चूस कर छोड़ दिया जाता है, यह जैनों से ज्यादा और कौन, भली भांति जानता होगा।
वर्तमान में तीर्थक्षेत्रों व संस्थाओं की सुरक्षा के लिए केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं है, (यह सान्ध्य महालक्ष्मी – चैनल महालक्ष्मी ने स्वयं अनुभव किया है) इसके लिए एक सुदृढ़ विधेयक और प्रशासनिक रणनीति की आवश्यकता है, इस पर जोर दिया गया।
अकेले प्रयास नहीं, सामूहिक उठें हाथ
प्रस्तुत प्रसेटेंशन में कहा कि जब कोई अकेला व्यक्ति या प्रतिनिधि प्रशासनिक अधिकारियों से मिलने जाता है, तो आपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। और वहीं जब, समाज की सभी प्रमुख कमेटियां एक मंच पर आकर, संयुक्त प्रतिनिधि मंडल के रूप में शासन-प्रशासन के सामने अपनी बात रखें, तो सरकार और प्रशासन को उनकी बात गंभीरता से सुननी पड़ती है।
केन्द्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का सदुपयोग
मंच से यह आवाज प्रमुखता से उठी कि समाज ने अब तक केन्द्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और संबंधित आयोगों की क्षमाताओं का पूरी तरह उपयोग नहीं किया है। (राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के इतिहास में केवल एक बार 2024 में सान्ध्य महालक्ष्मी – चैनल महालक्ष्मी की पहल पर जैन समाज के लिये तीर्थक्षेत्र कमेटी ने एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की थी।)।
यदि सही कार्य योजना बनाकर इन विभागों का उपयोग किया जाए, तो तीर्थों की सुरक्षा और उनके संरक्षण के कानूनी मार्ग और अधिक प्रशस्त हो सकते हैं।
स्थानीय स्तरों पर जिला प्रशासन से समन्वय
जिला प्रशासन के साथ पुरात्तव विभाग के साथ नियमित संवाद स्थापित करना होगा, जिससे किसी भी विवादित या संवेदनशील मुद्दे का समय रहते प्रशासनिक स्तर पर ही समाधान निकाला जा सके।



















