अहिंसक समाज के साथ अमानवीय व्यवहार क्यों?

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15 जुलाई 2026 /आषाढ़ शुक्ल एकम /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
आगामी 20 जुलाई (आषाढ़ शुक्ल सप्तमी) का दिन जैन समाज के लिए एक अत्यंत पवित्र और श्रद्धापूर्ण अवसर है। यही वह पावन दिन है जब जैन समाज के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक मना रहा है इस बार। इस पावन अवसर पर देश-दुनिया से हजारों जैन श्रद्धालु दर्शन करने और श्रद्धा-सुमन के रूप में ‘निर्वाण लाडू’ चढ़ाने के लिए गिरनार महातीर्थ की पांचवीं टोंक पर पहुँचते हैं। लेकिन, वर्षों से चली आ रही आस्था की इस राह में आज जैन समाज खुद को प्रताड़ित, उपेक्षित और असहाय महसूस कर रहा है। यह एक विचारणीय और गंभीर प्रश्न है कि जिस देश के संविधान ने हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता दी है, वहाँ एक परम अहिंसक समाज को अपने ही तीर्थंकर के मोक्ष कल्याणक पर अमानवीय व्यवहार का सामना क्यों करना पड़ता है?

ऐतिहासिक सत्य और 17 फरवरी 2005 का ऐतिहासिक अदालती आदेश
सन् 2016 तक 5वीं टोंक पर जैन समाज के लोग बिना किसी भय और रुकावट के दर्शन, विधिवत पूजा-अर्चना और निर्वाण लाडू समर्पित कर पाते थे। उधर चरणों के पास दत्तात्रेय मूर्ति स्थापित करने के बाद यह मामला कानून की चौखट पर पहुँचा। गुजरात उच्च न्यायालय (माननीय न्यायमूर्ति जयंत पटेल जी की अदालत) द्वारा 17 फरवरी 2005 को ‘बंडीलालजी दिगंबर जैन कारखाना बनाम गुजरात राज्य’ (रस्रीू्रं’ उ्र५्र’ अस्रस्र’्रूं३्रङ्मल्ल ठङ्म. 6428 ङ्मा 2004) के मामले में एक स्पष्ट अंतरिम आदेश जारी किया गया था। अदालत ने अपने अंतिम आदेश के क्रमांक 8, 9, 10, और 11 में स्पष्ट रूप से कानून और व्यवस्था बनाए रखने तथा सभी को समान अधिकार देने की बात कही थी।

आदेश क्रमांक 8 व 9 (समान अधिकार और सुरक्षा):
अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। यहाँ किसी भी नागरिक या श्रद्धालु को (चाहे वह भगवान दत्तात्रेय का अनुयायी हो या तीर्थंकर नेमिनाथ का) दर्शन और पूजा करने से रोका नहीं जा सकता।
राज्य सरकार और प्रशासन का यह परम कर्तव्य है कि वह हर श्रद्धालु और पर्यटक को एक सुरक्षित, सहज और आरामदायक माहौल प्रदान करे। मारपीट या प्रताड़ना की शिकायतों को देखते हुए अदालत ने आवाजाही को नियमित करने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए चेक-पोस्ट और पास की व्यवस्था करने की बात कही थी।
आदेश क्रमांक 10 (यथास्थिति और सौहार्द):
अदालत ने माना कि दोनों पक्षों की आस्था जुड़ी होने के कारण ऐसी व्यवस्था बनी रहनी चाहिए, जिससे दोनों धर्मों (हिंदू और जैन) के अनुयायियों की आस्था का सम्मान हो और कोई विवाद न उपजे।

आदेश क्रमांक 11 (प्रशासनिक निर्देश):
अदालत ने जिला कलेक्टर/ जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश दिए थे कि वे चौथी और पांचवीं टोंक के बीच पर्याप्त पुलिस बल तैनात करें। साथ ही, किसी भी अप्रिय घटना या शिकायत पर 12 घंटे के भीतर पुलिस अधीक्षक (रढ) को रिपोर्ट कर कानूनी कार्रवाई करने और एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने का आदेश दिया था।

विडंबना: प्रशासन का मौन और श्रद्धालुओं के साथ अमानवीय व्यवहार
अदालत के इतने स्पष्ट आदेशों के बावजूद, आज धरातल पर सच्चाई इसके ठीक उलट और बेहद दर्दनाक है। 5वीं टोंक पर तैनात पंडे और असामाजिक तत्व जैन समाज के श्रद्धालुओं के साथ घोर दुर्व्यवहार करते हैं।
जैन बंधुओं को वहाँ न तो जयकारा लगाने दिया जाता है और ना ही पवित्र णमोकार मंत्र का जाप करने दिया जाता है।
श्रद्धालुओं को अर्घ्य चढ़ाने और निर्वाण लाडू चढ़ाने में बलपूर्वक रोका जाता है।
इतना ही नहीं, आस्था के साथ आने वाले इन मासूम श्रद्धालुओं को गालियाँ दी जाती हैं, उनके साथ मारपीट की जाती है, और उन्हें डराने के लिए डंडे व चिमटे तक उठाए जाते हैं।

सबसे बड़ा अफसोस और विडंबना यह है कि वहाँ सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस बल मूकदर्शक बनकर यह सब देखता रहता है। वे अपराधियों को रोकने के बजाय, उल्टे जैन श्रद्धालुओं को ही वहाँ से तुरंत भाग जाने या निकल जाने को कहते हैं।

यह स्थिति तब और भी ज्यादा आहत करने वाली हो जाती है, जब इतिहास के पन्ने हमें याद दिलाते हैं कि वर्ष 2009 में जब जैन समाज के आचार्य मेरु भूषण महाराज जी ने गिरनार तीर्थ की सुरक्षा को लेकर आमरण अनशन किया था, तब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी जी ने गृहमंत्री अमित शाह को विशेष दूत बनाकर भेजा था और जैन समाज को यह ठोस आश्वासन दिया था कि ‘गिरनार पर जैनियों के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और उन्हें पूजा-पाठ में कोई तकलीफ नहीं होगी।’ लेकिन आज भी प्रशासनिक मौन के कारण वह आश्वासन जमीन पर उतरता नहीं दिख रहा है।


एक विनम्र और भ्रातृपूर्ण अनुरोध
हम पूरे जैन समाज की ओर से प्रशासन, सरकार और वहाँ के स्थानीय पुरोहितों व पंडे समाज से अत्यंत विनय और हाथ जोड़कर अनुरोध करते हैं कि जैन धर्म भी इसी पावन सनातन परंपरा का एक अभिन्न अंग है। सदियों से जैनों और हिंदुओं के बीच रोटी-बेटी और सांस्कृतिक रूप से भाई-चारे का संबंध रहा है।

जैन समाज को पराया या शत्रु न समझें, बल्कि उन्हें अपना सगा भाई समझकर गले लगाएँ। अदालत के आदेशों का सम्मान करते हुए और भारतीय संस्कृति की ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को जीवित रखते हुए, इस 20 जुलाई को जैन श्रद्धालुओं को उनकी प्राचीन परंपरा के अनुसार शांतिपूर्वक दर्शन, पूजा-अर्चना और निर्वाण लाडू चढ़ाने का अधिकार व सहयोग दें।

आइए, इस मोक्ष कल्याणक पर गिरनार महातीर्थ की पवित्रता और आपसी सौहार्द की एक नई मिसाल पेश करें।