॰ पांचवीं टोंक के बाद चौथी टोंक पर भी कुत्सित षड्यंत्र
॰ पुरातत्व विभाग, प्रशासन, सत्ता चुप
॰ एक झण्डा फहराने पर ऋकफ तुरंत हो जाती है, पर प्राचीन भारतीय संस्कृति को मिटाने-बदलने पर चुप्पी

29 जून 2026 / जयेष्ठ शुक्ल पूर्णिमा /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
क्या कोई इतना कुकृत्य कर सकता है जो हजार वर्ष से भी ज्यादा प्राचीन भारतीय संस्कृति से छेड़छाड़ कर विद्रूप कर दे। आज सान्ध्य महालक्ष्मी उन विवादों को एक तरफ रखकर कि गिरनार की चौथी टोंक श्री प्रद्युम्न स्वामी की मोक्ष स्थली या अघोड़ बाबा की तप स्थली है, इस विवाद पर भी चुप्पी रखते हैं कि वहां चरण पादुका नहीं, चरण उकेरे हुए हैं और जैन तीर्थंकर, भगवान जहां-जहां से भी मोक्ष गये हैं, वहां चरण ही उकेरे गये हैं, चाहे वो 20 तीर्थंकरों की सिद्धभूमि शिखरजी हो, राम-हनुमान-सुग्रीव की मांगीतुंगी हो, महावीर स्वामी की पावापुरी हो, वासुपूज्य स्वामी की मंदारगिरि हो, गुरुदत्त स्वामी की द्रोणगिरि हो, लव-कुश की पावागढ़ हो, ऋषभदेव का अष्टापद हो, युधिष्ठर-भीम-अर्जुन का पालीताना हो, इन्द्रजीत-कुंभकर्ण का बड़वानी हो, जसरथ राजा के 500 पुत्रों की कोटि शिला हो, कुलभूषण-देशभूषण की कुंथुगिरि हो, नंग-अनंग स्वामी की सोनागिरि हो, ऐसे सभी सिद्ध क्षेत्रों पर ‘चरण’ होंगे, पहचान यह जैन सिद्धभूमि है। ऊपर कुछ नामों को पढ़कर आप चौंक भी जाएंगे कि ये तो हिंदू धर्म के भगवान-अवतार-शत्रु हैं। जी हां, दोनों सनातन धर्म एक-दूसरे के पूरक हैं, उनके जीवन को एक धर्म अनुयायियों ने ज्यादा अंगीकार किया, वहीं दूसरे ने उनके अंतिम समय को वंदनीय कहा।

श्रमण और वैष्णव परम्परा एक साथ बढ़ती रही, जो समय के साथ जैन और हिंदू में पहचान बनाने लगी। आज गिरनार उसी रूप में दोनों पूज रहे हैं, पर किसी को कैसे पूजना, मानना अलग है, किंतु उस प्राचीन संस्कृति से छेड़छाड़ करना, विद्रूप करना, बदलने की कोशिश करना, बिल्कुल अलग। यह प्राचीन भारतीय संस्कृति पर गहरी चोट है।
हमारे प्रधानमंत्री भी कहते हैं कि किसी देश की समृद्धि-विकास की पहचान उसकी प्राचीन संस्कृति से होती है। ऐसे में सान्ध्य महालक्ष्मी का यही प्रश्न है, जो भारतीय प्राचीन धरोहरों से छेड़छाड़ करता है, वह न जैन हो सकता है, न हिन्दू, वह न ही श्रमण को मानने वाला, न ही वैष्णव धर्म का अनुयायी हो सकता है, वह तो धार्मिक या भारतीय भी नहीं हो सकता।

चौथी टोंक पर वहां उकेरी दिगंबर स्वरूप प्रतिमा जो इन पवित्र पावन पर्वत श्रृंखला को भगवानों की तपस्थली इंगित करती है, सिद्धभूमि है, उस मूल चट्टान से उकेरी प्रतिमा किसी एक धर्म की नहीं, पूरे देश की अनमोल संस्कृति है। कोई उसे तीर्थंकर के रूप में पूजे या कहे वहां के चरण श्रीकृष्णजी पुत्र प्रद्युम्न स्वामी के हैं या वह कहे अघोड़ बाबा जी के हैं, वो अलग विवाद का विषय है, आज उस पर नहीं, पर उस भारतीय संस्कृति से छेड़छाड़ का प्रश्न है। और उस पर पुरातत्व विभाग की चुप्पी, पुलिस का मौन, प्रशासन की अनदेखी कुछ अलग ही बयान करती है।

कुछ समय पूर्व उसी स्थान पर, जनवरी के अंतिम सप्ताह में आचार्य श्री सुनील सागरजी ने वहां ध्यान-तप किया था और उन्होंने जोर देकर कहा था कि आप किसी भी धर्म के अनुयायी हों, दूसरे धर्म का भी आदर करें, अपना-अपना कहने वाले लोगों को दूसरे को भी अपनी मान्यता से पूजने-वंदना करने का अधिकार दें। वहां उकेरी प्रतिमा पर संभवत: जून के दूसरे सप्ताह में भगवा रंग पोत दिया, मूल चट्टान से उकेरी, चट्टानी रंग की, व ह दिगंबर ध्यानरत पदमासन प्रतिमा हमारी प्राचीन संस्कृति का प्रतीक रही है, पर अब उसमें छेड़छाड़, लीपा-पोती क्या संकेत कर रही है।
जैसे झण्डा फहराने पर वहां के बाबाओं ने आंदोलन किया, कलेक्टर कार्यालय का घेराव किया, आज वे बाबा लोग कहां हैं, कहां हैं जो जैन अनुयायी हैं, सबको मिलकर विरोध करना चाहिए। प्रशासन की जवाबदेही है, पुलिस की चुप्पी एक प्रश्न खड़ा करती है और पुरातत्व विभाग की लापरवाही दर्शाती है।

इस गिरनार पर वैसे प्राचीन संस्कृति से छेड़छाड़, वनक्षेत्र पर अनधिकृत कब्जों की कहानी तो पिछले 20-22 वर्षों से स्पष्ट देखी जा रही है, किसकी शह पर? कौन है इसके पीछे, जिसने दोषियों की बजाय कार्यवाही करने वालों के हाथ बांध दिये हैं।

यह कहना गलत न होगा, यहां हाईकोर्ट के आदेशों को भी ताक पर रखा जाता है। दोनों धर्मों के अनुयायियों को पांचवीं टोंक पर अपनी-अपनी परम्परा से पूजा करने का अधिकार दिया अदालत ने 17 फरवरी 2005 के निर्णय में, पर पिछले एक दशक में उसको भी तार-तार किया। जैनों के बड़े पर्व आषाढ़ शुक्ल सप्तमी (इस बार 20 जुलाई) को, पर उन्हें अपनी परम्परानुसार निर्वाण लाडू तक चढ़ाने से रोका गया, हाथ से छीनी पूजा की सामग्री को जमीन पर फेंक कर, उनकी श्रद्धा-आस्था को तार-तार किया। आतंकवादियों की तरह एक समुदाय के अनुयायियों की तलाशी का काला इतिहास गत वर्ष ही यहां रचा गया।
इस बार भी उनके खिलाफ दूसरे सम्प्रदाय के खड़े होने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाना, अल्पसंख्यक समाज पर दबाव डालना, ऐसी बातों को पुलिस-प्रशासन कैसे अनुमति दे सकता है।
इस बारे में पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3748 में देख सकते हैं।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन : प्राचीन भारतीय संस्कृति से छेड़छाड़ करने वाले, उसे मिटाने वालों पर तुरंत कार्यवाही हो, पुरातत्व विभाग क्यों लापरवाह हो जाता है, जिसके कंधों पर भारतीय प्राचीन संस्कृति की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। वन विभाग अपने क्षेत्र में अतिक्रमण पर क्यों आंख मूंद लेता है। पुलिस को उचित कार्यवाही करने से पहले ही कौन उसके हाथ बांध देता है, निष्पक्ष जांच केबाद त्वरित कार्यवाही हो, वरना प्राचीन संस्कृति इसी तरह नष्ट करने वाले लोग, लगातार हावी होते जाएंगे।



















