अहिंसा की खामोश चीख: 100 से अधिक शहरों में जैन समाज ‘मौन जुलूस’, PM और HM तक पहुँची दर्द की गूंज

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27 मई 2026 / जयेष्ठ शुक्ल एकादशी/चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/

रीवा/दिल्ली। आँखों में आँसू, होठों पर सन्नाटा और हाथों में अपनी आस्था को बचाने की गुहार… जब हमेशा शांत और ‘जियो और जीने दो’ के मार्ग पर चलने वाला पूरा समुदाय सड़कों पर उतर आए, तो समझ लीजिए कि दर्द बहुत गहरा है। अपने तीर्थों की पवित्रता और पूजनीय संतों की सुरक्षा को लेकर आज पूरे देश का जैन समाज मर्माहत है। इतिहास में शायद यह पहली बार है जब बिना किसी नारेबाजी और हंगामे के, देश के 100 से अधिक स्थानों पर जैन समाज ने एक साथ ‘मौन जुलूस’ निकालकर ऐसी खामोश क्रांति की है, जिसने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है।

इस विशाल और शांतिपूर्ण मार्च में हजारों की तादाद में बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएँ श्वेत वस्त्र धारण कर शामिल हुए। समाज के प्रतिनिधियों ने अत्यंत अनुशासित तरीके से देश के विभिन्न हिस्सों में जिला प्रमुखों (कलेक्टरों) को अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपा।

रीवा SP संदीप मिश्रा ने बैठाई रकळ जांच इस मौन आक्रोश का तात्कालिक असर मध्य प्रदेश के रीवा में देखने को मिला। जैन संतों और संस्कृति से जुड़े मामले की गंभीरता को देखते हुए रीवा के पुलिस अधीक्षक (SP) संदीप मिश्रा ने तत्परता दिखाई है। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष और गहराई से जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन कर दिया है, जिससे पीड़ित समाज को न्याय की एक बड़ी उम्मीद जगी है।

दिल्ली में गूंजी खामोश पुकार

PM, HM और सड़क मंत्री को सौंपे पत्र वहीं देश की राजधानी दिल्ली में ‘जैन धर्म संरक्षण महासंघ’ ने इस दर्द को सीधे सत्ता के शीर्ष गलियारों तक पहुँचाया है। महासंघ की ओर से सांध्य महालक्ष्मी (शरद जैन) ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), गृह मंत्री (HM) और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री के कार्यालयों में जाकर औपचारिक पत्र सौंपे हैं। इस भावुक पत्र में जैन संतों के देशव्यापी विहार (पदयात्रा) के दौरान उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने और जैन धरोहरों को संरक्षित करने की मार्मिक अपील की गई है। सड़क परिवहन मंत्री को पत्र सौंपने के पीछे मुख्य उद्देश्य संतों की पदयात्रा के दौरान होने वाले हादसों को रोकना है।

यह मौन जुलूस महज एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि देश के सबसे शांतिप्रिय समाज की वह करुण पुकार है, जो सरकारों से पूछ रही है कि क्या उनकी आस्था और संतों का जीवन सुरक्षित हाथों में है?