1000 साल पुरानी ‘मोक्ष यात्रा’ पगडंडी

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8 जून 2026 / जयेष्ठ कृष्ण अष्टमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/
जामगढ़ के जंगलों में मिले 800 मीटर तक हजार वर्ष प्राचीन जैन मुनि के पदचिन्ह, प्रमाण में मिला वहीं शिलालेख भी

रायसेन। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित जामगढ़ के घने और रहस्यमयी जंगलों से इतिहास का एक ऐसा विस्मयकारी और अनूठा पन्ना सामने आया है, जिसने पुरातत्वविदों को भी हैरान कर दिया है। यहाँ पथरीले इलाकों के बीच लगभग 800 मीटर के दायरे में, ठोस प्राकृतिक चट्टानों पर उकेरे गए इंसानी पैरों के निशानों (पदचिह्नों) की एक बेहद लंबी और ऐतिहासिक पगडंडी मिली है।

इस खोज को सबसे प्रामाणिक और जीवंत बनाने का काम वहाँ मिला दो पंक्तियों का एक प्राचीन शिलालेख करता है, जो पहले प्रमुख पदचिह्न के ठीक बगल में खुदा हुआ है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व पुरालेख निदेशक रवि शंकर ने पुष्टि की है कि यह शिलालेख 10वीं-11वीं शताब्दी के ‘परमार राजवंश’ काल का है, जिसे शुरूआती नागरी लिपि में लिखा गया है। इस पावन शिलालेख पर ‘श्री’, ‘सिद्ध’, ‘पद’, ‘पंडित’ और ‘कृत’ जैसे अलौकिक शब्द उकेरे गए हैं।

इतिहासकारों और जैन संस्कृति के विशेषज्ञों का मानना है कि यह मार्ग किसी उच्च आध्यात्मिक स्तर के परम ज्ञानी जैन संत (मुनि) की अंतिम यात्रा यानी ‘मोक्ष समाधि’ का सजीव साक्ष्य है। ये कदम पत्थरों पर आगे बढ़ते हुए प्राचीन पहाड़ी गुफाओं से लगभग 600 मीटर पहले अचानक समाप्त हो जाते हैं। जैन परंपरा में ‘सिद्ध’ का अर्थ मुक्त आत्मा और ‘पंडित’ का अर्थ उनकी उच्च विद्वता और आत्मज्ञान के स्तर को दशार्ता है।

यह खोज बेहद असाधारण है, क्योंकि आमतौर पर पूजनीय चरण मंदिरों के अंदर मिलते हैं, लेकिन खुले आसमान के नीचे प्राकृतिक चट्टानों पर उकेरा गया ऐसा लंबा रास्ता पूरे देश में बेहद दुर्लभ और अद्वितीय है। ‘इंटेक’ भोपाल की पुरातत्वविद नैन्सी शर्मा, मिलनाथ पेटले, इतिहासकार रमेश यादव और अरविंद जैन द्वारा खोजी गई यह धरोहर भारत के गौरवशाली अतीत का एक अनमोल मोती है। (चै.म.)