भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के त्याग, तप और विजय की गौरव-गाथा – आस्था का सवा सौ साल पुराना पहरा और मौन साधना की अनकही कहानी… भाग- 1

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‘भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी’ अपने गौरवमयी 125वें वर्ष (शतकोत्तर रजत महोत्सव) की ओर बढ़ रही है। 124 वर्षों से हमारे सिद्ध, कल्याणक और अतिशय क्षेत्रों की ढाल बनी इस संस्था पर अक्सर उंगलियां उठती हैं कि— ‘कुछ अदालती मुकदमों के सिवा इन्होंने किया ही क्या है?’
इसी निस्वार्थ तपस्या के उन सुनहरे पन्नों को खोलने, जिन्हें न कभी सुना गया, न पढ़ा गया… ‘चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी’ लेकर आया है एक विशेष साप्ताहिक श्रृंखला। प्रस्तुत है आज पहली भावपूर्ण कड़ी:

4 जून 2026 / जयेष्ठ शुक्ल एकादशी/चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/

22 अक्टूबर 2026 का सूर्य केवल एक नई सुबह लेकर नहीं आएगा, बल्कि संपूर्ण जैन समाज के भाल पर गौरव, संकल्प और अक्षुण्ण विजय का एक अमर तिलक लगाने आया है। यह दिन केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि हमारी अगाध श्रद्धा का एक महा-उत्सव होगा। हमारी अपनी ‘तीर्थक्षेत्र कमेटी’ आज अपनी साधना के, तीर्थ सुरक्षा के सवा सौ साल यानी 125 स्वर्णिम वर्ष पूर्ण कर रही है। यह यात्रा केवल इतिहास नहीं, बल्कि उन दुर्गम कांटों भरे रास्तों की कहानी है, जिन पर चलकर हमारे महापुरुषों ने अनादिकालीन तीर्थों की पवित्रता और अस्मिता को बचाए रखा।

संघर्ष की अग्नि से कुंदन बनकर निखरा ‘संरक्षण’
कमेटी का यह सफर फूलों की सेज नहीं, बल्कि अंगारों पर चलने जैसा था। हमारे पावन तीर्थों को सुरक्षित रखने के लिए कमेटी को भीतर और बाहर, दोनों मोर्चों पर एक साथ धर्म-युद्ध लड़ना पड़ा।
अदालतों में गूंजती आस्था: शाश्वत सिद्धक्षेत्र श्री सम्मेद शिखरजी की पवित्रता को अक्षुण्ण रखने के लिए एक लंबा कानूनी महासंग्राम लड़ा गया। सिर्फ शिखरजी ही नहीं, बल्कि राजगिरि, पावापुरी, शौरीपुर और अंतरिक्षजी जैसी पवित्र धराओं की सुरक्षा और अधिकारों के लिए कमेटी ने अदालतों की चौखटों पर बरसों तक न्याय की अलख जगाए रखी।

भीतर का मौन सुधार:
संघर्ष केवल बाहरी ताकतों से नहीं था, समाज के भीतर की व्यवस्थाओं को सुधारना और भी कठिन था। उन प्रबंधकों और भट्टारकों से प्रेम और दृढ़ता के साथ मोर्चा लिया गया, जिनकी शिथिलता के कारण हमारे तीर्थ उपेक्षित हो रहे थे।

समाज के वात्सल्य का संबल:
इस महायज्ञ में लाखों-करोड़ों रुपयों की आहुति लगी, लेकिन धन कभी आड़े नहीं आया। जब-जब तीर्थों ने पुकारा, जैन समाज ने अपनी अटूट श्रद्धा और उदारता के द्वार खोल दिए। यह समाज के नि:स्वार्थ सहयोग की ही जीत है।

एक युगांतरकारी परिवर्तन:
अतीत के अंधेरे से वर्तमान के उजाले तक शुरूआती दशकों के अनथक प्रयासों से तीर्थों की माटी ने जो अंगड़ाई ली, उसका साक्षात् चमत्कार आज हमारी आँखें देख रही हैं। एक समय था जब हमारे तीर्थ उपेक्षा के आंसू रो रहे थे और आज वे वैभव से मुस्कुरा रहे हैं।

पारदर्शिता की शुचिता:
कल तक जहाँ व्यवस्थाओं और हिसाब-किताब पर धुंध की चादर थी, आज वहाँ आईने जैसी शुचिता है, हर क्षेत्र का एक-एक पैसा पूरी पारदर्शिता के साथ समाज के सामने रखा जाता है।
आँखों में वात्सल्य की छाँव: कल तक जहाँ दूर-दूर से आए थके-हारे यात्रियों के लिए सिर छुपाने का कोई ठिकाना न था, आज वहाँ वात्सल्य से सराबोर आधुनिक धर्मशालाएँ, बाहें फैलाए श्रावकों का स्वागत करती हैं।

कुशल प्रबंधन का संबल:
कल तक जहाँ बदइंतजामी और अव्यवस्था का साम्राज्य था, आज वहाँ सुगठित ‘प्रबंधक कमेटियों’ के पहरे में सुचारू और अनुशासित व्यवस्थाएं सांस ले रही हैं।
गौरवमयी नवनिर्माण: कल तक जो पूजनीय संपत्तियां गुमनामी के अंधेरे में खोई थीं, आज वहां भव्य, दिव्य और नयनाभिराम नवीन भवनों की कीर्ति-पताका फहरा रही है।

कृतज्ञता के पुष्प: महामना सेठ माणिकचन्द जी जवेरी
इस भगीरथ प्रयास और स्वर्णिम इतिहास के पीछे एक ऐसी दूरदर्शी आत्मा का संकल्प था, जिसका नाम लेते ही हृदय श्रद्धा से झुक जाता है— परम उपकारी स्वर्गीय सेठ श्री माणिकचन्द जी जवेरी (बम्बई), जो विक्रम संवत् 1956 (सन् 1899) में इस पुण्य कार्य की ओर गतिशील हुये। सर्वप्रथम उन्होंने बम्बई दिगम्बर जैन प्रान्तिक सभा के खातों में ‘तीर्थरक्षा विभाग’ की स्थापना की। विक्रम संवत् 1959 (सन् 1902) के कार्तिक मास में महासभा के अधिवेशन स्थान जम्बूस्वामी, चौरासी मथुरा के अवसर पर पुन: बम्बई प्रांतिक सभा के नेतागण सर्वश्री स्व. सेठ माणिकचन्दजी जवेरी, स्व. वादिगजकेशरी न्याययाचस्पति, स्व. पं. गोपालदास वरैया, स्व. पं. धन्नालालजी, स्व. सेठ श्री सुखानन्दजी आदि महानुभाव वहां पधारे। तीर्थक्षेत्रों की वर्तमान अव्यवस्था और बदइत्तजामी से घिरे हुए संकटों का दिग्दर्शन कराया तथा उनकी सुव्यवस्था और सुरक्षा के लिये भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी स्थापित करने पर प्रस्ताव निर्विरोध पास हुआ। यह निश्चित हुआ कि यह कमेटी स्वतंत्र नियमावली बनाकर अपने शुभकार्यों का श्रीगणेश करे। कमेटी के संचालन के लिये 31 सदस्यों की एक नामवलि उपस्थित की जो सभी ने सहर्ष मंजूर की।

उन्होंने अपने संकल्पों के पसीने से इस संस्था के बीज को सींचा था, जो आज एक विशाल वटवृक्ष बनकर हम सबको अपनी छांव दे रहा है। जैन समाज युगों-युगों तक उनके इस उपकार का ऋणी रहेगा। ‘आज हमारा मस्तक गर्व से ऊंचा है, क्योंकि दिगंबर जैन समाज के अधिकारों की रक्षा का दीया पूरी प्रखरता से जल रहा है। हमारे तीर्थ सुरक्षित हैं, क्योंकि हमारी नींव किसी स्वार्थ पर नहीं, बल्कि सत्य, समर्पण और अटूट संघर्ष पर टिकी है।’ आइए, इस शतकोत्तर रजत स्थापना वर्ष के पावन क्षण में, हम सब अपनी आत्मा को साक्षी मानकर अपने इन पावन और सिद्ध तीर्थों की सेवा, सुरक्षा और संवर्धन का एक नया, जीवंत संकल्प अपने हृदयों में धारण करें। तीर्थ सुरक्षित रहेंगे, तो हमारा अस्तित्व सुरक्षित रहेगा!
(संदर्भ : भा.दि. जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी की ‘सिद्धियों के छप्पन साल’ से)

पुकारती है तीर्थों की माटी… 22 अक्टूबर – मथुरा चलो

तीर्थों के संरक्षण, विकास और सुरक्षा के संकल्प के साथ, आइए गवाह बनें एक ऐतिहासिक पल का।
22 अक्टूबर 2026 को मथुरा की पावन धरा पर, मरसलगंज गौरव परम्पराचार्य श्री सौभाग्य सागर जी
एवं स्थविर संत सुरत्न सागराचार्य जी महाराज ससंघ के मंगल सानिध्य में, भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र
कमेटी के 125वें स्वर्णिम वर्ष (शतकोत्तर रजत महोत्सव) का शंखनाद होने जा रहा है।
गुरुओं का आशीष, तीर्थों का वैभव… अवश्य पधारें!