600 वर्ष प्राचीन अतिशय तीर्थ भूमि कैसे बची मुस्लिम कब्जे से ॰ जटवाड़ा तीर्थक्षेत्र की 4800 वर्ग फीट भूमि पर नीयत डोली

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॰ रहस्यमयी गुफा से निकले 21 भगवान, अभी भी छिपे हैं बहुत से राज
॰ चैनल महालक्ष्मी टीम ने किया वहां का दौरा
11 फरवरी 2026 / फाल्गुन कृष्ण नवमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
संभाजी नगर से 17 किमी की दूरी पर है श्री संकटहरण पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, जैनगिरी, जटवाड़ा, जहां 1987 में 21 प्रतिमायें भूगर्भ से निकली और अब भव्य पंचकल्याणक की तैयारी है। मंगलवार 03 फरवरी को जब उस 4800 वर्गफीट जगह की रजिस्ट्री की कार्यवाही शुरू हुई तो, जिस मुस्लिम व्यक्ति से 25 लाख रुपये देकर यह जमीन ली, उसने उसके कागज अपने भाई के नाम पर करने की बात कह कर झकझोर दिया।

जटवाड़ा तीर्थ के मंत्री प्रमोद पाण्डेय व यहां के ट्रस्टी महावीर पाटनी से चैनल महालक्ष्मी ने तुरंत घटनाक्रम को जाना, क्योंकि गत 12 जनवरी को ही चैनल महालक्ष्मी उस रहस्यमयी गुफा के दर्शन करने गई थी। जब आप जटवाड़ा जाते हैं, तो सड़क से ही, दूर पहाड़ पर आदिनाथ, भरत, बाहुबली की तीन खड्गासन मूर्तियां किसी का भी ध्यान खींच लेती हैं, अभी उधर जाने का सुगम रास्ता नहीं है। सड़क के बायीं ओर 600 वर्ष प्राचीन तीर्थ हैं, जहां पर भूगर्भ से निकली 21 प्रतिमाओं में से एक 2 फीट की श्याम पदमासन पारस प्रभु की प्रतिमा सभी को आकर्षित करती मन मोह लेती है। भूतल में भूगर्भ से निकली ऐसी 5 प्रतिमायें हैं तथा प्रथम तल पर 16 प्रतिमायें रखी हई हैं। दोनों तरफ दो नई वेदियों का निर्माण पूरा हो चुका है, बस पंचकल्याणक की तैयारी है। वहां इन सब पर 18वीं सदी के विभिन्न वर्षों की प्रशस्ति लिखी हुई है, कुछ पर अस्पष्ट है।

प्रमोद पाण्डेय जी ने तब चैनल महालक्ष्मी को बताया कि यहां पहले भूयार में प्रतिमायें थीं, जिनमें से दो यहां आदिनाथ व महावीर स्वामी की, लगभग 600 वर्ष प्राचीन हैं, उन पर कोई लांछन नहीं है। स्पष्ट है कि यह तीर्थ 600 वर्ष से भी प्राचीन और उस समय काफी भव्य रहा होगा।

फिर प्रमोद जी हमें उस रहस्यमयी गुफा की ओर ले चले, जिनालय के बायीं तरफ लगभग 150 फीट पर एक खाली प्लाट हैं, जिसको मंदिर समिति ने अभी एक माह पहले 25 लाख में खरीदा था, एक मुस्लिम भाई से। तब हमने कहा था कि इसकी पक्की बाऊण्ड्री करा लें, क्योंकि वह जैनों के लिए काफी ऐतिहासिक है। तीनों तरफ मुस्लिम समाज बहुलता में है। इस प्लाट से आगे 29Ÿ27 फीट जगह पहले ही मंदिर के नाम है।

4800 वर्ग फीट का यह वही प्लाट था, जिस पर मुस्लिम भाई ने 25 लाख में बेचे जाने के बावजूद अपने भाई के नाम रजिस्ट्री लिखने की बात कहकर दबाव बनाया था। उसके पास यह प्लाट था। 40 वर्ष पहले वह नींव के लिये खुदाई कर रहा था, तभी वहां पड़ा एक पत्थर गिरा और तेजी से आवाज हुई। स्पष्ट संकेत था कि वो पत्थर जहां गिरा, वो खोखली जगह थी। उसको देख हर कोई हैरान रह गया। वह एक गुफा थी, लगभग 21 फीट की, जिस पर कई आलय व वेदी स्थान थे, वहां से 21 प्रतिमायें 1987 में निकली थीं। उसको जैसे किसी शक्ति ने कहा कि यह देवों का स्थान है, निर्माण मत करो। तब से यह प्लाट यूं ही पड़ा था, जिसे एक माह पहले मंदिर ने 25 लाख रुपये में खरीद लिया था।

चैनल महालक्ष्मी ने उस गुफा में देखा कि उसकी दीवारें मजबूत पाषाण की थी, और उसका सम्बंध 150 फीट दूर मंदिर के साथ तब रहा होगा, अब बन गये ऊपर मकानों से दबा दिया गया। कल्पना ही कर सकते हैं, आज 600 वर्ष पहले यह पूरा कितना बड़ा जिनालय रहा होगा। मुस्लिम आक्रमणकारियों के समय इसे बंद कर दिया होगा और मंदिर के एक बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया होगा, जिस पर बस्ती बस गई होगी।

अब मंगलवार को जैसे ही प्रशासन में रजिस्ट्री होने लगी तो बेचने वाले मुस्लिम भाई ने कहा कि क्योंकि यह उसकी प्राचीन जमीन है, यह मंदिर के लिये ही रहेगा, पर रजिस्ट्री में नाम उसके भाई का ही होना चाहिये। मंत्री प्रमोद जी ने तुरंत एक्शन लेते हुए शिकायत सभी प्रमाणों के साथ थाने में कर दी। भली बात यह रही, उन पर दबाव बनाया गया कि एक राशि कागजों में, शेष अलग से दे दें, पर मंदिर कमेटी ने कहा कि हम पूरी राशि कागजों में ही देंगे। (यानि आप समझ गये, जिसे एक अलग भाषा में ब्लैक मनी कहते हैं)। बेचने के बाद ऐसा दबाव, बड़े एक्शन की तैयारी होने लगी, पुलिस को हकीकत बता उचित कार्यवाही को कहा गया। बस बाजी पलट गई, उसके 48 घंटे में ही वह 30-40 लोगों को लेकर प्रमोद जी से मिलने मंदिर आया और माफी मांगकर जल्द रजिस्ट्री कराने व शिकायत वापस लेने की बात कहने लगा।

प्रमोद जी ने चैनल महालक्ष्मी को बताया कि हमने अपनी शिकायत अभी वापस नहीं ली, पहले रजिस्ट्री होगी, तभी उस पर बात होगी। इसकी पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3621 में देख सकते हैं।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन – जटवाड़ा कमेटी ने त्वरित एक्शन लेकर पुलिस को सारे प्रमाण देकर इस तीर्थ की अतिशयकारी भूमि को बचा लिया। पूरी राशि कागजों में देकर पक्का सौदा किया। इसीलिये यह अतिशयकारी तीर्थ बच गया। इसके साथ वह 26 फीट की गुफा का रहस्य अभी बाकी है। आगे से बंद हो चुकी है, उसका 150 फीट दूरी पर बने प्राचीन जिनालय से जरूर कोई संबंध रहा होगा। हो सकता है, दो जिनालय हों या फिर एक विशाल जिनालय। यह जिनालय काफी नष्ट हो चुका था, जिसका जीर्णोद्धार लगभग 40 साल पहले हुआ। स्पष्ट है कि अपने तीर्थों का संरक्षण, पूरे दस्तावेज रखना, बाउण्ड्री कराना आदि आज कमेटियों की बड़ी जिम्मेदारी है।