गणित पुस्तक से मूडबद्री का नाम हटाने के बाद संस्कृत पाठ्य पुस्तक से आई खुशखबरी

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॰ NCERT की नवीं कक्षा में संस्कृत की शारदा पुस्तक में ‘णमो अरिहंताणं’
॰ अब होगी पहचान जैन संस्कृत की ऋषभदेव से
20 अप्रैल 2026 /बैसाख शुक्ल चतुर्थी/चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/
यह तो सभी का मालूम है कि गणित की पाठ्य पुस्तक से हजार की संख्या को समझाने के लिए हजार खम्भों के मूडबद्री जिनालय को हटाकर अयोध्या के श्रीराम मंदिर को जोड़ दिया गया, जिससे जैन समाज में काफी रोष था।

अब उसी एनसीआईआरटी से एक खुशखबरी मिली है, जो पहले से 22वें तीर्थंकर को मिथक कहने वालों को करारा जवाब देगी। नवीं की संस्कृत की पाठशाला ‘शारदा’ में 10वें पाठ का नाम है ‘णमो अरिहंताणं’। यह जैन दर्शन, प्राकृत भाषा के संरक्षण और नैतिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में सहायक होगा। इस पाठ का उद्देश्य छात्रों को जैन धर्म के मूलमंत्र और प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ के जीवन आदर्शों से परिचित कराएगा।

वैसे तो णमोकार महामंत्र प्राकृत भाषा में है, पर यह पाठ संस्कृत में है। जहां अब तक इतिहासकार, जैन धर्म के पहले 22 तीर्थंकरों को मिथक मानते हैं, वहीं सरकार भी जैन संस्कृति को मात्र 2650 वर्ष प्राचीन बताती है और इस प्रचीन सनातनी संस्कृति पर यह बहुत बड़ा कुठाराघात है। अब संस्कृत का यह पाठ ऋषभनाथजी के जीवन आदर्शों से अवगत करायेगा। यह जैनों की संस्कृति की गलत अवधारणा को दूर करने में बहुत बड़ा संबल बनेगी।

अभी पुस्तक प्रकाशन में है और मई में आने की संभावना है, जो इस सत्र से ही लागू हो जायेगी। इस 10वें पाठ में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ के जीवन को दर्शाते हुए यह बताया जायेगा कि उन्होंने कैसे भोगभूमि के समाप्त होने के बाद कर्मभूमि की शुरूआत में असि, मसि, कृषि आदि मानव को जीने की कला सिखाई और फिर आत्म कल्याण के लिये तपस्या का मार्ग चुन निर्वाण प्रापत किया।
सूत्रों की मानें, तो इस पाठ को शामिल करने का मुख्य उद्देश्य छात्रों को यह बताना है कि भारत की भाषाई विरासत केवल संस्कृत तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राकृत भाषा व ब्राह्मी लिपि का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस बारे में पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3681 से प्राप्त कर सकते हैं।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन: जैनों के इतिहास को मात्र 2650 वर्ष तक मानने वाले तथा पहले 22 तीर्थंकरों को मिथक कहकर नकारने वालों पर यह बहुत बड़ा प्रमाणिक आधार बनकर कई रूपों में सामने आयेगा, जिनमें प्रमुख है जैन संस्कृति की शुरूआत प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से है, न कि अंतिम तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी या उनसे पहले पारसनाथजी से। दूसरा संस्कृत को प्राचीन भाषाओं में मानने वालों के सामने अब प्राकृत की प्राचीनता प्रमाणित होगी, तो साथ में ब्राह्मी लिपि की भी। तीसरा, मानव जाति को सुरक्षा के लिये तलवार, भोजन के लिये कृषि, व्यापार, शिल्प, आदि 72 कलाओं की जानकारी देने वाले ऋषभनाथ जी थे। उन्हीं के ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती को पहचान मिलने में भी सहायक होगा।

अब महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या अब सरकार संसद में लिखा शिलालेख कि जैन संस्कृति मात्र 2650 वर्ष पहले महावीर स्वामी से हुई, उसको सही करेगी कि ऋषभनाथ जी द्वारा करोड़ों वर्ष पहले शुरू की गई। क्या सरकार इस सच्चाई को प्रकाशित कर जैन सनातन धर्म को सही पहचान देगी, है तो मुश्किल, शायद उसके लिये इतंजार करना होगा।