कभी मयूर पिच्छी, कभी सल्लेखना को लेकर अदालत में अब दिगंबर संतों के सार्वजनिक विहार पर प्रश्नचिह्न

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24 अप्रैल 2026 /बैसाख शुक्ल अष्टमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/

ऐसा क्यों हैं कि अदालत में बात कोई होती है, उसे घुमा-फिराकर दिगम्बर जैन संस्कृति के सामने लेकर खड़ा कर दिया जता है। कुछ समय पहले कर्नाटक में स्कूलों में बुर्का पहनने पर रोक लगाने की बात हुई, तो आवाज उठा दी कि पहले बाहुबली मूर्ति को चड्डी पहनाओ।

मयूर पंखों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिशें तो दिगंबर संतों के अहिंसा सुरक्षा उपकरण पर सीधा हमला हुआ, फिर राजस्थान हाईकोर्ट में सल्लेखना को आत्महत्या मानने के बारे में याचिका डाल दी गई, जिस पर 2015 से स्टे चल रहा है। ऐसे ही मुंबई-उज्जैन आदि में दिगंबर जिनालय तोड़े गये। शिखरजी, पावागढ़, गिरनार, पालीताणा आदि तीर्थों के विवाद किसी से छिपे नहीं है। महावीर स्वामी की जन्मभूमि बासोकुंड पर प्राचीन प्राकृत संस्थान को बंद करने की बिहार सरकार की कोशिशें जारी हैं।

ऐसे में 16 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच के सामने चल रही धार्मिक प्रथाओं पर बहस में फिर दिगंबर जैन संस्कृति को घसीटा गया।

त्रावणकोट देवस्कोम बोर्ड (टीडीबी) के अधिवक्ता ने अपनी दलील पेश करते हुए कहा कि अगर अदालत यह कहती है कि ‘सार्वजनिक नैतिकता’ के आधार पर किसी धार्मिक परम्परा को बदला जा सकता है, तो क्या कल को अदालत दिगंबर जैन साधुओं या नागा साधुओं के सार्वजनिक रूप से नग्न रहने पर प्रतिबंध लगा देगी? क्योंकि सामान्य कानून में सार्वजनिक नग्नता ‘अश्लीलता’ मानी जा सकती है।
यह माना कि सिंघवी का कहना है कि जैसे समाज और कानून इन साधुओं की नग्नता को अश्लीलता नहीं, बल्कि ‘आध्यात्मिक त्याग’ और अपरिग्रह की श्रेणी में मानता है। उसी तर्क पर कहा कि वैसे ही सबरीमाला की परम्परा को भी ‘लिंग भेद’ की बजाय देवता की विशिष्टता के रूप में देखा जाना चाहिए।

दलील यह भी है कि हालांकि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के अधीन हैं, लेकिन क्या अदालत तय कर सकती है कि कोई धार्मिक प्रथा कितनी आवश्यक है।

हां, अभी नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने एक अभूतपूर्व निर्णय दिया कि पशुपतिनाथ मंदिर में नागा साधुओं के प्रवेश पर रोक लगाने वाली याचिका को इस तर्क के साथ खारिज कर दिया कि यह सदियों पुरानी परम्परा है, और इस पर रोक लगाना धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा।

इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3689 में देखी जा सकती है।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन – निश्चय ही यह चर्चा धार्मिक परम्पराओं में अदालतों की दखलंदाजी से संबंधित हो, पर जैन समाज के लिये यह गंभीर चिंता का विषय हो कि बार-बार राजनीतिक-प्रशासनिक गलियारों के साथ अब अदालतों में इस भारत की प्राचीन सनातनी ‘जैन परम्पराओं’ को किसी न किसी बहाने लाया जाता है। नग्नता और दिगम्बरत्व के विशाल अंतर को गौण करने की कोशिशें की जाती हैं। सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश न देने की परम्परा के लिये अनेक उदाहरण हो सकते हैं, पर दिगंबर मुनिराजों के विहार पर ही प्रश्न क्यों खड़ा किया गया? इस बारे में गंभीर चिंतन आवश्यक है, वैसे इतना और बता दें एल.एम. सिंघवी खुद एक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं, जो जन्म से जैन हैं।