प्राचीन तीर्थों की सुरक्षा में सफलता-विफलता के 125 वर्ष ॰ गिरनार की चूक का खामियाजा आज भी भुगत रहा समाज

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॰ पहले सेठों ने संस्कृति को बचाया, पर फिर दूरी बन गई सामान्य श्रावकों से
॰ संतों से पहले दूरी, अब निकटता
॰ पहली बार तीर्थों का जागरूकता के लिए साल भर महोत्सव
॰ सभी तीर्थों को संभाला और फिर वहां कमेटी बनाकर सौंप दिये तीर्थ
॰ मंदिर-मंदिर गुल्लक से जन-जन को पुण्यार्जन का अवसर
॰ वर्षायोग स्थापना में तीर्थ सुरक्षा कलश से जागरूकता
॰ गत दो वर्ष संतों के साथ, लगभग 60 बार तीर्थों की सुरक्षा के प्रति जागरूकता
॰ शिखरजी-गिरनारजी की चल रही सुनवाई काफी समय बाद

किसी भी संस्कृति का जीता जागता स्मारक, उसके प्राचीन तीर्थ और स्थापत्य अवशेष होते हैं, जिनके संरक्षण में 22 अक्टूबर 1902 से सतत प्रयास कर रही, दिगम्बर संस्थाओं में अटूट सबसे लम्बी उम्र की संस्था – भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी अपने जीवन का 125वां वर्ष तीर्थ सुरक्षा जागरूकता पर पूर्णत: समर्पित कर रही है, जिसका जयघोष 22 अक्टूबर 2026 को, अन्तिम केवली की मोक्ष स्थली मथुरा चौरासी से स्थविराचार्य श्री सुरत्न सागरजी ससंघ के सान्निध्य में होगा, यह वहीं तीर्थ स्थल, जहां इसकी स्थापना हुई थी।

ध्यान रखना होगा तीर्थरक्षा व तीर्थसेवा का कार्य सरल नहीं, बाहर व भीतर से लगातार हमलों के बीच, अपने ही सवाल उठाते हैं, तीर्थक्षेत्र कमेटी करती क्या है? और यह सवाल अधिकांश उन्हीं की ओर से उठता है, जिन्होंने तीर्थं के संरक्षण, संवर्धन में अपनी यथाशक्ति कभी सहयोग ही नहीं किया और कुछ वो भी, जिन्हें अपनी आकांक्षाओं में केवल नकारात्मकता ही दिखाई देती है। तीर्थों की रक्षा के लिये अहर्निश दूरदर्शिता के साथ चिंता रखते हुए आने वाली विपत्तियों से तीर्थों को बचाना पड़ता है। इसके लिए अपनी संस्कृति के प्रति अविचल श्रद्धा हर व्यक्ति में होना अति आवश्यक है। आज भी अगर हर कोई इस सुरक्षा यज्ञ में अपनी आहुति दे, तो कोई भी तीर्थ असुरक्षित नहीं रह सकता।

कैेसे शुरू हुए भाई-भाई के झगड़े
सान्ध्य महालक्ष्मी ने इतिहास के पन्ने पलटे तो पाया कि पूजनीय-वंदनीय तीर्थों पर प्राचीन समय में कई शताब्दियों तक किसी भी प्रकार के झगड़े नहीं थे। प्राचीन समय में तीर्थों पर तीर्थंकरों या सिद्धों के चरणों की पूजा होती थी। दिगंबर व श्वेताम्बर सभी समान रूप से चरण पूजक थे।

परन्तु फिर काल दोषोत्पन्न कारणों से प्रभावना अंग का ह्रास होता गया और धीरे-धीरे जैन धर्म की उपासना विधि में अंतर पड़ता गया और वो बढ़ता गया। इसका परिणाम बहुत ही बुरा हुआ। श्वेताम्बर बंधु वीतराग प्रतिमाओं को भूषणादि पहनाने लगे। इससे सामप्रदायिकता का विष अविभाज्य जैन समाज में फैलता गया। दोनों के बीच मीठे सबंधों पर कुठाराघात हुआ, जो अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रहा।

जिन तीर्थक्षेत्रों की वंदना जीवन को साफल्य-क्षितिज के निकटतर ला देती है,उन्हें पूजनीय क्षेत्रों – सम्मेदशिखरजी, पावापुरी, राजगिरि, तारंगा, अंतरिक्ष पार्श्वनाथ, मक्सी पार्श्वनाथ, शौरीपर, कुंभोज, गिरनार, श्री महावीरजी, केसरिया जी आदि क्षेत्रों में विवादों के कारण, दोनों समाज का करोड़ों रुपया खर्च हो चुका है।

सच तो यह है तीर्थ जहां थे, वहीं स्थिर हैं और सदा रहेंगे। किंतु साम्प्रदायिकता के कारण, कब्जे करने की कोशिशें, इसने हमारे प्रेम-उपवन को तहस-नहस कर डाला है और मात्सर्य भाव ने फूट को जन्म दिया, जो निरन्तर बढ़ती गई और यहां तक कि दिगंबर समाज के अपने मूलभूत मंदिरों पर कुत्सित प्रहार होने लगा। और सबसे बड़ी बात, इसमें पूरा श्वेताम्बर सम्प्रदाय नहीं है, तीन में से एक यानि न स्थानक, न तेरापंथ। इन तीर्थों पर विवाद मूर्तिपूजक श्वेतामार सम्प्रदाय जिसमें भी कुछ संत, कुछ कमेटियां इनको विवादित करने में आगे रहती हैं।

अब भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी ने 125 वर्षों में कुछ किया भी है, सान्ध्य महालक्ष्मी उसमें से कुछ को समाज के सामने ला रही है:-

श्री सम्मेदशिखरजी पर वंदना के लिये सीढ़िया (सीढ़ी केस): चढ़ाई का रास्ता, कंकरी का, बहुत खराब, तीर्थक्षेत्र कमेटी ने शुरू में 500 सीढ़ियां बनाई, रातों रात श्वेताम्बर भाइयों ने तोड़ी, मुकदमा किया और जीता और फिर निर्माण हुआ।
शुरू से लोअर कोर्ट, हाईकोर्ट, प्रिवही काउंसिल में कई तीर्थक्षेत्रों के सम्बंध में केस लड़े और आज भी सुप्रीम कोर्ट तक लड़े जा रहे हैं।

शिखरजी पूजन केस (1912) श्वेताम्बर (मूर्तिपूजक) की ओर से दावा कि दिगंबरों को मंदिरों में पूजन का अधिकार नहीं, न ही धर्मशालाओं पर कोईअधिकार है। 31.10.1916 को हजारी बाग कोर्ट से अपने हक में फैसला पाया, 21 टोंकों पर पूजन का अधिकार मिला।

शिखरजी इंजेक्शन केस नं. 256/1920- श्वेताम्बरों द्वारा प्राचीन चरणों को उखाड़ नये लगाना, पहाड़ पर मकान बनाने, फाटक लगा कर दिगंबर भाइयों को रोकने जैसी हरकतें, इस पर 21.11.1922 को निर्णय कि दिगम्बर यात्रियों को न रोका जाये।

बीसपंथी कोठी व्यवस्था – भट्टारक सतेन्द्र भूषण जी के स्वर्गस्थ होने के बाद बीसपंथी कोठी की व्यवस्था व हिसाब-किताब में शिकायतें मिलने पर तीर्थक्षेत्र कमेटी ने 1903 में एक ट्रस्ट बोर्ड स्थापित कराया, नये मंदिर, नई धर्मशाला का निर्माण करवाया, फिर बाद में उसका प्रबंधन अलग ट्रस्ट को सौंप दिया।

॰ शिखरजी तेरहपंथी कोठी – पहले 13-20 का भेद नहीं था, पर बाद में तेरहपंथी कोठी की प्रबंधन दशा खराब हुई, हिसाब-किताब बिगड़ गया, अदालत के सहयोग से प्रबंधन सही किया और 1915 में अलग कमेटी बना कर, उसे जिम्मेदारी सौंप दी।

॰ राजगृही तीर्थ – पंच पहाड़ी पर श्वेताम्बरों से केस लड़ा। कारण दिगंबरों की दिलचस्पी ने होने पर श्वेताम्बरों ने केवल अपना नाम दर्ज करवाकर, मंदिर व धर्मशाला पर अपना अधिकार जता दिया। दिगंबरों को ठहरने से रोका गया, तब तीर्थक्षेत्र कमेटी ने अलग धर्मशाला निर्माण करा दी तो 1923 में दिगंबरों को मंदिरों से बेदखल का केस दर्ज, कमेटी लड़ी और 1927 में दोनों समुदायों ने मंदिरों-टोंकों का बंटवारा कर लिया। बाद में अलग कमेटी स्थापित कर दी।

॰ पावापुरी तीर्थक्षेत्र – जलमंदिर पर चरण तक जाने का पुल दिगंबरों द्वारा निर्माण कराया। 1925 तक श्वेताम्बर अपनी मूर्ति कार्तिक अमावस को लाते, फिर ले जाते पर 1925 में वहीं स्थायी रूप से विराजित कर दी, दिगंबरों की सुरक्षा के लिये 1926 में केस लड़ा, 18-08-1930 को अदालती आदेश में वह मूर्ति हटी, दिगंबर समाज को कभी भी आकर दर्शन की अनुमति मिली। फिर भी 2-4 दिन में मूर्ति लाने लगे, हाईकोर्ट में जाकर फैसला पाया, पर अपनी पूर्व की भूलों के कारण दर्शन तो मिले, पर प्रबंधन उनके हाथ गया, बाद में अलग कमेटी को दायित्व सौंप दिया।

॰ कुंडलपुर (बिहार) तीर्थक्षेत्र – यहां एक मंदिर – एक धर्मशाला और 7 दिगंबर व 3 श्वेताम्बर मूर्तियां थी, पावापुरी-राजगृही की तरह दिगंबरों के ढीलेपन से प्रबंधन श्वेताम्बर देखने लगे, और वैसे ही दोनों समाज के तीर्थ पर अपना नाम लिखवा लिया, मूलनायक प्रतिमा का रूप बदल दिया। दिगंबरों को ठहरने-दर्शन में रोक होने पर तीर्थक्षेत्र कमेटी आगे आई, नई धर्मशाला व मंदिर बनवाया, फिर व्यवस्था बिहार तीर्थक्षेत्र कमेटी को सौंप दी।

॰ श्री कमलदहजी (पटना) तीर्थक्षेत्र – सेठ सुदर्शन जी की मोक्षस्थली पर व्यवस्था असंतोषजनक होने पर तीर्थक्षेत्र कमेटी ने प्रबंधन अपने हाथ लिया। मंदिर व धर्मशाला का निर्माण किया और बाद में बिहार तीर्थक्षेत्र केटी को प्रबंधन सौंप दिया।

॰ श्री मंदारगिरि तीर्थक्षेत्र – संबलपुर के जमींदारों के अंतर्गत यहां की व्यवस्थायें खराब व अव्यवस्थित थी, तब तीर्थक्षेत्र कमेटी ने उनसे लिखा-पढ़ी कर 20-10-1911 को तीर्थक्षेत्र कमेटी ने पहाड़ी के, नीचे के मंदिर अपने नाम करा लिए, यहां अपनी एक शाखा स्थापित की। पर तब भी पहाड़ी के मंदिर पर वैष्णव बाबा कब्जे जमाये बैठे थे, हटे नहीं, झगड़े बढ़े, मारपीट हुई। केस किया, उन्हें जेल भिजवाया, तब शांति हुई।

॰ अंतरिक्ष (बरार) तीर्थक्षेत्र – सभी दिगम्बर तीर्थ, मूर्तियां होने के बावजूद दिगंबरों की उदारता से श्वेताम्बर व्यापारियों को पहले दर्शन सुविधा दी, फिर पैर फैलाये, 1909 में एक-दो मूर्ति मूलनायक के पास रख दी। दिगंबर भाइयों ने रोका, तलवार-बंदूक तान दी, 7 मरते-मरते बचे। फौजदारी केस चला, 120 पकड़े गये। तीर्थक्षेत्र कमेटी पूरी तरह साथ रही। मूलनयाक पर श्वेताम्बर का दावा, तब 3-3 घंटे का नियम बना। 1959 में प्रतिमा का पुराना लेप हटने पर दिगंबरत्व सामने आ गया। पर तब श्वेताम्बर मूर्तिपजकों ने मुख्यमंत्री के साथ मिलकर पुन: लेप का आर्डर ले लिया। झगड़े रहे, ताला लग गया, चार वर्ष पहले इस केस की सुनवाई में ताले खुले, पर अन्तरिम आदेश में प्रबंधन श्वेताम्बरों को मिला।

॰ गिरनार जी तीर्थक्षेत्र – यहां भी हिसाब-किताब सही नहीं था। 1908 में तीर्थक्षेत्र कमेटी ने एक मुनीम यहां रखकर व्यवस्था, हिसाब-किताब देखना शुरू करने से यात्रियों को संतोष मिला। लेकिन स्थानीय प्रबंधकों ने उसे पाने के लिये ब्राह्मण व श्वेताम्बरों से फौजदारी कर दी, कमेटी ने व्यवस्थाओं के लिये मुकदमा किया, बाद में आपसी सहमति से 11 की कमेटी बनवाई। इस बीच दत्तात्रेय नाम से 5वीं टोंक का रजिस्ट्रेशन हो गया, तीर्थक्षेत्र कमेटी को पता नहीं चला, 2004 में वहां निर्माण व मूर्ति स्थापित करने की शुरूआत, तब 2005 में केस किया। 17 फरवरी 2005 को अन्तरिम आदेश में स्थिति जस की तस का रखने का आदेश, पर बदलाव चलता रहा, 2016 से निर्वाण लाडू भी चढ़ाने नहीं दिया जा रहा। अब इस केस की सुनवाई अंतिम चरण में है तथा तीर्थक्षेत्र कमेटी ने स्वयं एक समझौत पत्र अदालत में जमा किया है, जिसपर दत्तात्रेय कमेटी व सरकार के जवाब का इंतजार है।

॰ आबू जी तीर्थ – दिलवाड़े के श्वेताम्बर मंदिरों के बीच एक दिगंबर मंदिर भी था, जिसका पता चला, तब तीर्थक्षेत्रकमेटी के सहयोग से उस पर अधिकार मिला।

॰ श्री गजपंथा जी तीर्थक्षेत्र – शोलापुर के सेठ द्वारा इस निर्मित क्षेत्र की 100 वर्ष बाद व्यवस्थायें खराब होने पर तीर्थक्षेत्र कमेटी ने इसका नियंत्रण लिया। बाद में व्यवस्थायें ठीक कर स्वतंत्र कमेटी को कार्यभार सौंपा।

॰ श्री मक्सी जी अतिशय क्षेत्र – दोनों समुदायों में कई मुकदमें हुए। 1558 में दिगंबर प्रतिमा प्रतिष्ठित, 1960 में चक्षु चढ़ा दिये। कई वर्ष केस चले, कोर्ट से पूजन का समय बांटा गया। तीर्थक्षेत्र कमेटी ने यहां समाज को पूरा सहयोग दिया।

॰ देवगढ़ तीर्थ – यह पुरातत्व विभाग के अंतर्गत था, तब तीर्थक्षेत्र कमेटी ने लिखा-पढ़ी की, तब यह तीर्थ दिगम्बर समाज के हाथ आया, फिर यहां अलग कमेटी स्थापित की।

॰ श्री महावीरजी क्षेत्र – यहां व्यवस्थायें खराब थीं, तब दिल्ली – जयपुर वालों के बीच खिंचाव चलता रहा। भट्टारक का भी विवाद था। तब 1923 में तीर्थक्षेत्र कमेटी आगे आई, जीर्णोद्धार भी कराया, फिर अलग कमेटी की व्यवस्था की। 1973 में श्वेताम्बरों ने दावे शुरू किये, खारिज हुये, अब सुप्रीम कोर्ट में अंतिम फैसला सुरक्षित कर लिया है।

॰ मांगीतुंगी तीर्थक्षेत्र – इस सिद्धक्षेत्र को दिगंबरों के लिये लाने में तीर्थक्षेत्र कमेटी को ही पूरा श्रेय जाता है। भीलों के कब्जे में था, दान का कोई रखरखाव नहीं, तीर्थक्षेत्र कमेटी ने उनसे लिया, पर बाद में श्वेताम्बरों ने भी नवअंगी पूजा करने की कोशिश की, चक्षु भी लगाये, फिर तीर्थक्षेत्र कमेटी ने इस कृत्य को रोका। बाद में क्षेत्र की व्यवस्था के लिये अलग कमेटी का निर्माण किया।

सोनागिरि तीर्थक्षेत्र – यहां व्यवस्थायें बहुत खराब थी, हर धर्मशाला का अलग पुजारी, अलग भण्डार, यात्रियों से वसूली, भट्टारक भी चंदा वसूली करते। न हिसाब-किताब, न पहाड़ के मंदिरों पर पूजा प्रक्षाल व्यवस्था, न कोई मरम्मत। पण्डे अलग परेशान करते, मूर्तियां खंडित करते। तब तीर्थक्षेत्र कमेटी आगे आई, शुरू में उनसे झगड़ा-मारपीट भी हुई।फिर वहां फौजदारी केस करने पड़े, सफलता मिली। उसके पश्चात् यहां अलग कमेटी की व्यवस्था करा दी।

॰ शत्रुंजय (पालीताना) क्षेत्र – श्वेताम्बरों के कब्जे में था पर पूरा तीर्थक्षेत्र। शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में तीर्थक्षेत्र कमेटी ने एक मुनीम को वहां रखा, उसे मार भगाया, दूसरा भेजा, उससे भी झगड़ा। तब तीर्थक्षेत्र कमेटी ने राजा जी से जमीन लेकर शहर में एक मंदिर का निर्माण कराया, धर्मशाला भी। फिर वायसराय से श्वेताम्बरों ने पूरा पहाड़ लिया, तब तीर्थक्षेत्र कमेटी ने कल्याण जी आनंद पेढ़ी से अपने नाम शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर करवा लिया।

॰ अयोध्या जी तीर्थक्षेत्र – लखनऊ के सरदारों के अंतर्गत प्रबंधन खराब था, तीर्थक्षेत्र कमेटी ने एक मुनीम की नियुक्ति कराई, फैजाबाद से कार्यकर्ता बनाये। बाद में एक स्वतंत्र कमेटी बनाकर प्रबंधन सौंप दिया।

॰ श्री केसरिया जी तीर्थक्षेत्र – 850 साल पूर्व निर्मित यह दिगंबरी तीर्थ था, पहले व्यवस्था भट्टारकों के हाथ में थी। 200 दिगंबर घर शुरू से हैं। प्रतिमा का चमत्कार देख श्वेताम्बर भाई आने लगे, फिर बस गये। चमत्कार देख गरीब दिगंबरों को लुभाना शुरू किया, कूटनीति से पंडों को मिलाया। तब तीर्थक्षेत्र कमेटी ने विरोध शुरू किया। बदलाव की कोशिश, दिगंबरों पर बंदूक कुन्दे व लाठियों से प्रहार किये। कई मारे गये, गर्भवती महिला भी। अमानुषिक हत्याकांड के बाद कमेटी महाराणा जी से उदयपुर में मिली। फैसला हक में आया, पर फिर पंडों ने शिखर की मूर्तियां तोड़ दी। लेकिन उसके बाद विवाद बढ़ गया, अब दो की जगह तीन दावेदार हो गये हैं।

गोमटस्वामी श्रवणबेलगोल तीर्थक्षेत्र – खराब व्यवस्था के चलते तीर्थक्षेत्र कमेटी आगे आई, 1910 में महामस्तकाभिषेक शानदार कराया, फिर 1925 में मैसूर गवर्नमेंट को लालच आया। प्रत्येक यात्री पर टैक्स और कलश- अजैनों को, तीर्थक्षेत्र कमेटी किस तरह सत्ता से लड़ी, लिखा नहीं जा सकता। फिर वहां अपनी शाखा स्थापित की। जीर्णोद्धार कराये, धर्मशालायें बनवाई। सबसे पहली सीढ़ियां बनवाई। एक अलग कमेटी निर्मित कर दी।

यह थोड़ा ही है, क्या अब भी कहेंगे तीर्थक्षेत्र कमेटी करती क्या है, क्या किया अब तक?

नोट:- आपको यह जानकारी कैसी लगी, और जन-जन तक कैसे पहुंचायें, इस पर आपके सुझाव व्हाट्स अप नं. 9910690825 पर भेजिए।