जैन मंदिर में भोजन पार्टी, पहले विवाद में 4 बार कर्फ्यू, 8-8 दिन रतलाम रह चुका बंद

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॰ जैन मंदिर की पवित्रता तार-तार, मर्यादाओं का उल्लंघन
॰ जैन क्यों अपने ही मंदिर में ही हुआ मजबूर
27 फरवरी 2026 / फाल्गुन शुक्ल एकादशी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन

रतलाम का 400 साल पुराना देरासर श्री शांतिनाथ जैन मंदिर, जो थावरिया बाजार, बांगड़ो का मौहल्ला में जिसे ‘यति अगरजी’ का जिनालय भी कहा जाता है। कहा जाता है यह मंदिर यति अगरजी द्वारा लाया गया था। गत सप्ताह इस मंदिर में बहुसंख्यक समाज के सैकड़ों लोगों ने रात में यहां भोजन खाया, जिसमें आलू चिप्स जमीकंद भी। सवाल उठा कि मंदिर प्रांगण में ‘भण्डारे’ के नाम पर बिना किसी अनुमति के जमीकंद उपयोग किया गया और रात में भोजन पार्टी। जैन संस्कृति तार-तार, पवित्रता अपावन हो गई, कौन रोके? प्रबंधन पर सवाल उठ गये, समाज का दिन-रात का चैन उड़ गया। आज यहां, कल कहीं और, परसों कहीं और शोर उठा कि जिनालय की गरिमा की जिम्मेदारी प्रबंधकों, ट्रस्टियों की है। आवाज यह भी आई कि कहां थी कमेटी उस समय। मंदिर जैनों का और क्या कब्जा दूसरों का। सावल थे, पर जवाब किसी के पास नहीं।

मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र खाबिया से चैनल महालक्ष्मी ने सम्पर्क किया और पूरी जानकारी ली, जिसने जरूर हैरान कर दिया। अध्यक्ष ने बताया कि यहां विरोध करना आसान नहीं है, जैनों के मंदिर, पर बहुसंख्यक समाज ने विवाद कर रखा है। इस विवाद में रतलाम में 4 बार कर्फ्यू लग चुका है। आठ-आठ दिन रतलाम बंद रह चुका है। विवाद सुप्रीम कोर्ट तक गया, पर उसने म.प्र. हाइकोर्ट को रैफर कर दिया, जो इन्दौर बेंच देख रही है, सातवीं बार इसी सोमवार 23 फरवरी को सुनवाई थी।

उन्होंने सारे घटनाक्रम का असली कारण बताते हुए कहा कि इस तरह वे हमें उकसाना चाहते हैं और इस विवाद में पार्टी बनने की हर बार कोशिश रहती है, जबकि हमारा सीधा विवाद म.प्र. शासन से है। यहां पर एक लाकर में उस समुदाय की कुछ धातु की प्रतिमायें हैं, जिनकी चाबी कलेक्टर के पास रहती है, साल में दो बार उस चाबी से कलेक्टर खोलते हैं और वो अपनी पूजा करते हैं। पर ऐसा कुकृत्य पहली बार हुआ है। उस दिन 400-500 लोग आये।

इस देरासर में 22 जिनालय हैं और वह आठ हजार फीट में हैं। वि.सं. 1901 में समस्त श्रीसंघ ने तपगच्छ आचार्य श्री जिनेन्द्रसूरि जी के पावन सान्निध्य में तीर्थंकर श्री शांतिनाथ जी की प्रतिष्ठा करवाई थी।
इस बारे में पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3632 में देख सकते हैं।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन : एक तो विवाद और उसके चलते चार बार कर्फ्यू और 8-8 दिन बंद। हिंदू भाई भी अपने मदिरों में खाना नहीं खाते, फिर यहां क्यों? स्पष्ट रूप से जैनों को उकसाने की, भड़काने की कोशिश और विवाद को नया रूप देने की कोशिशें। अगर ऐसे किसी अन्य सम्प्रदाय में होता, तो जहां वह समाज ही एक आंदोलन खड़ा कर देता, वहीं प्रशासन भी साथ में खड़ा होता। पर अल्पसंख्यक में भी अतिअल्पसंख्यक जैन, न साथ देने वाला समाज, न प्रशासन। बिखरा समाज, नेतृत्व की कमी, राजनीतिक प्रभाव में लगभग शून्यता और यह आने वाले खतरों का सीधा संकेत दे रहा है।