जब न्याय की चौखट पर झुका कपट… और अमर हुआ हमारा शिखरजी ‘वंदना का अधिकार’

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आस्था का सवा सौ साल पुराना पहरा और मौन साधना की अनकही कहानी… भाग- 4

‘भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी’ के गौरवमयी 125 वर्ष के इतिहास की अनकही गौरव गाथा की परतें खोलते हुए एक-एक करके सान्ध्य महालक्ष्मी आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही है। भाग-3 में आपने पढ़ा भक्ति, आस्था की 500 सीढ़ियों को अधर्मियों ने रातों-रात तोड़ डाला। पर्वत रक्षा एवं अपने अधिकारों के लिये लंदन की प्रिवी काउंसिल में गूंजी आवाज और श्रेष्ठी वर्ग ने फकीरों जैसी तपस्या कर तीर्थों के लिये सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।। प्रस्तुत है यहां चौथी भावपूर्ण कड़ी:

09 जुलाई 2026 /आषाढ़ कृष्ण नवमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन

शिखरजी पूजा केस: आस्था के स्वाभिमान और 11 वर्षों के धर्मयुद्ध की शौर्य-गाथा
22 अक्टूबर 2026 की यह पावन तिथि, ‘भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी’ के 125वें स्वर्णिम वर्ष (शतकोत्तर रजत महोत्सव) के महा-आकाश पर गौरव का एक दीप्तिमान नक्षत्र है। हमारी इस विशेष शृंखला की चौथी भावपूर्ण कड़ी में, आइए आज इतिहास के उस पन्ने को पलटें, जिसने हमारे प्राणप्रिय शाश्वत सिद्धक्षेत्र श्री सम्मेद शिखरजी में हमारे पूजन के अधिकार को हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया। यह गाथा केवल एक मुकदमे की नहीं, बल्कि न्याय की दहलीज पर पूरे 11 वर्षों तक लड़े गए एक महा-सत्याग्रह की है।

जब हमारी ‘श्रद्धा’ को बंधक बनाने का प्रयास हुआ!
सन् 1912 में हजारीबाग की अदालत में एक ऐसा मुकदमा दायर किया गया, जिसने समूचे दिगंबर जैन समाज के हृदय को झकझोर कर रख दिया। वह एक ऐसा अंधड़ था, जिसने हमारी अनादि परंपरा और अस्तित्व पर ही प्रहार कर दिया था। श्वेतांबर पक्ष की ओर से यह दावा किया गया कि:

स्वामित्व का अहंकार: पावन पारसनाथ पर्वत के समस्त मंदिर, कण-कण और धर्मशालाएं केवल और केवल उनके मालिकाना हक (खेवट) में हैं।

पूजा पर पहरा: दिगंबर समाज को वहाँ के पवित्र मंदिरों में स्वतंत्र रूप से, अपनी प्राचीन आम्नाय और दिगंबर रीति के अनुसार पूजन करने का कोई अधिकार नहीं है।
शरण के लिए याचना: पर्वत की धर्मशालाओं में थके-हारे यात्रियों को सिर छुपाने और ठहरने के लिए भी दूसरों की आज्ञा की बैसाखी थामनी होगी।

31 अक्टूबर 1916 की वो न्याय-पुनीत सुबह जब सत्य का अभिषेक हुआ
बरसों की तीखी बहसों, साक्ष्यों की अग्निपरीक्षा और गहन कानूनी मंथन के बाद, एडिशनल सब-जज की कलम ने एक युगांतरकारी और निष्पक्ष फैसला सुनाया, जिसने न्याय के मंदिर में सत्य का शंखनाद कर दिया:
साझा विरासत, साझी आस्था: अदालत ने उद्घोषणा की कि पर्वतराज की पावन टोंकें जिन जैन देवों को समर्पित हैं, वे किसी एक की जागीर नहीं, बल्कि दोनों सम्प्रदायों की अनमोल और साझा थाती हैं।
पूजन की असीम स्वतंत्रता: न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि कोई भी पक्ष दूसरे संप्रदाय को अपनी-अपनी धार्मिक रीति से प्रभु-भक्ति और अर्चना करने से रोक नहीं सकता। प्रभु के द्वार सबके लिए खुले हैं।
टोंकों पर मिली विजय की गूँज: भगवान अजितनाथ से लेकर विमलनाथ जी तक (दूसरे से 11वें तीर्थंकर), और 13वें से 21वें, 23वें तीर्थंकर तथा गणधर गौतम स्वामी की पावन टोंकों पर दिगंबर समाज का समान और संप्रभु अधिकार घोषित किया गया। (केवल 4 टोंकों और व्यवस्थाओं को अपवाद माना गया)।

सात समंदर पार… लंदन की ‘प्रिवी काउंसिल’ में भी गूँजी ‘सत्यमेव जयते’ की हुंकार!
इस ऐतिहासिक न्याय से विचलित होकर मामला पटना उच्च न्यायालय पहुँचा, जिसने निचली अदालत के न्यायोचित फैसले पर अपनी मुहर लगा दी। अंतत:, जब विरोधियों ने सात समंदर पार लंदन की सर्वोच्च ‘प्रिवी काउंसिल’ का दरवाजा खटखटाया, तो वहाँ की सबसे बड़ी अदालत ने भी दिगंबर समाज की सत्यता के आगे शीश झुकाया और उस अपील को खारिज (ऊ्र२े्र२२) कर दिया।

11 वर्षों का अखंड तप और पूर्वजों का ऋण
सोचिए! 11 वर्षों तक, तीन-तीन अदालतों में हमारी तीर्थक्षेत्र कमेटी के कर्णधारों ने अपनी रातों की नींद और दिन का चैन होम कर दिया। आज 125 साल बाद, जब हम बहुत गर्व से, निर्भय होकर शिखरजी की वंदना करते हैं और प्रासुक द्रव्यों से प्रभु का अभिषेक करते हैं, तो हमारे भीतर कृतज्ञता की एक लहर उठनी चाहिए। यह उन महापुरुषों की दूरदर्शिता और कमेटी के अनथक संकल्पों का ही फल है कि हमारी प्राचीन परंपरा आज साख के साथ सांस ले रही है।
तीर्थ हमारी आत्मा हैं, विरासत हमारा स्वाभिमान है, और
इनका संरक्षण-संवर्धन ही हमारा परम धर्म है।
पुकारती है मथुरा की माटी… अवश्य पधारें!

आइए, पूर्वजों के इस भगीरथ उपकार के प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करने और इस गौरवशाली इतिहास पर गर्व करने के लिए मथुरा के इस ऐतिहासिक महाधिवेशन के साक्षी बनें।
इस श्रृंखला के अगले भाग में पढ़िए: कैसे बदली हमारे पावन तीर्थों की सूरत और क्या हैं भविष्य के स्वर्णिम संकल्प! (जारी)