06 मई 2026 / जयेष्ठ कृष्ण चतुर्थी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/
उदयपुर। दिन वैशाख पूर्णिमा का, इस दिन जैन बंधु प्रथम तीर्थंकर को मानने वाले नहीं दिखते और दूसरे संप्रदाय वहां की गरिमा को, शुद्धता को तार तार करते, चारों तरफ दिख जाते हैं, यह कैसे जयकारे? यह कैसा जमघट? हो सकता है उनके भक्ति हो पर जैन मंदिर में अन्य संप्रदाय? यह कैसा संयोग है या फिर कोई मजबूरी। इस शोर के बीच एक मौन पीड़ा भी है—एक ऐसी पीड़ा जो राजस्थान के प्राचीन ‘केसरियाजी धाम’ की दीवारों में सदियों से दफन है। यह पीड़ा है उस जैन समाज की, जिसने अपने आराध्य की मर्यादा और मंदिर की पवित्रता के लिए दशकों तक कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ी है।
विडंबना देखिए, साल 2007 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि यह एक ‘जैन मंदिर’ है। लेकिन आज भी इस मंदिर की चाबियाँ और प्रबंधन सरकार के ‘देवस्थान विभाग’ के पास हैं। जैन समाज के लिए यह केवल ईंट-पत्थरों या प्रबंधन का विवाद नहीं है, बल्कि यह ‘शुद्धि और मर्यादा’ का प्रश्न है।

चूंकि श्वेतांबर और दिगंबर समुदायों के बीच मंदिर के प्रबंधन और पूजा पद्धति (अभिषेक, शृंगार आदि) को लेकर दशकों से विवाद चल रहा है, इसलिए अदालत ने इसके प्रबंधन को राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग के अधीन रखा है।हिंदू और अन्य समुदायों का प्रवेश क्यों होता है? स्थानीय भील, मीणा और अन्य हिंदू समुदाय भगवान ऋषभदेव को अपनी कुल-परंपरा का हिस्सा मानते आए हैं। वे उन्हें ‘काला जी’ के रूप में पूजते हैं।

सरकार इसे एक “सार्वजनिक” या “सर्व-धर्म” स्थल के रूप में देखती है, ताकि क्षेत्र में सांप्रदायिक सद्भाव बना रहे।
वैशाख पूर्णिमा जैसे अवसरों पर भारी भीड़ उमड़ती है। इसमें जैनियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में अन्य समुदायों के लोग भी शामिल होते हैं।

जैन समाज के लिए यह केवल प्रवेश का मुद्दा नहीं है, बल्कि मर्यादा और शुद्धि का विषय है:
जैन धर्म में भगवान की पूजा के कड़े नियम (शुद्धि, वस्त्र, अभिषेक विधि) होते हैं। अन्य समुदायों के प्रवेश और उनकी अलग पूजा पद्धति से जैन समाज को लगता है कि मंदिर की ‘जैन गरिमा’ और ‘शुद्धता’ प्रभावित हो रही है।

डर है कि यदि अन्य समुदायों का वर्चस्व बढ़ा, तो भविष्य में इस मंदिर की शुद्ध जैन पहचान धुंधली पड़ सकती है। श्वेतांबर और दिगंबर विवाद के कारण मंदिर का प्रबंधन जैनों के हाथ में नहीं आ पा रहा है, जिसका लाभ सरकार और अन्य तत्व उठा रहे हैं।
विवाद का वर्तमान स्वरूप यह मामला “त्रिकोणीय” हो गया है: श्वेतांबर बनाम दिगंबर: दोनों संप्रदाय मंदिर पर अपने-अपने अधिकारों का दावा करते हैं।जैन समाज चाहता है कि सरकार (देवस्थान विभाग) मंदिर खाली करे और इसे जैनों को सौंपे।स्थानीय समुदाय बनाम जैन: स्थानीय लोग अपने पारंपरिक पूजा के अधिकार को छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
यह कहना कि यह “जैनों के खिलाफ” है, जैन समाज के एक बड़े वर्ग की भावना है। जैनों का मानना है कि चूंकि यह उनके तीर्थंकर का मंदिर है, इसलिए यहाँ की व्यवस्था पूरी तरह से जैन आगमों (शास्त्रों) के अनुसार होनी चाहिए।

जैन धर्म के अनुसार, तीर्थ केवल दर्शन की जगह नहीं, बल्कि आत्म-साधना का केंद्र होता है जहाँ पल-पल मर्यादा का पालन अनिवार्य है। लेकिन ‘लोक-आस्था’ के नाम पर यहाँ जो भीड़ उमड़ती है, उसमें जैन धर्म की उन सूक्ष्म क्रियाओं और पवित्रता के नियमों का दम घुटने लगता है, जो भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) के सिद्धांतों का मूल हैं। स्थानीय भील और अन्य समुदायों की श्रद्धा का सम्मान करना जैन संस्कृति का हिस्सा रहा है, लेकिन उस श्रद्धा के नाम पर मंदिर की मूल जैन पहचान और पूजा पद्धति के साथ समझौता करना, जैन समाज को अपनी ही आत्मा पर प्रहार जैसा लगता है।
इस बारे में पूरी विस्तृत रिपोर्ट चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3707 में देख सकते हैं।
चैनल महालक्ष्मी चिंतन : जब सरकार इसे ‘सर्व-धर्म’ स्थल कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है, तब एक सवाल हर जैन अनुयायी के मन में कौंधता है—”क्या संवैधानिक जीत के बाद भी हमें अपनी ही विरासत को जैन पद्धति से सहेजने का अधिकार नहीं?” आज वैशाख पूर्णिमा पर चढ़ती हुई हर ‘केसर’ के साथ जैन समाज की यह प्रार्थना भी है कि आदिनाथ की इस पावन धरा पर ‘मर्यादा’ का पुनर्जन्म हो, ताकि यह केवल एक पर्यटन या भीड़ का केंद्र न रहकर, पुनः एक शुद्ध ‘जैन तीर्थ’ के रूप में अपनी आभा बिखेर सके।
जब तक श्वेतांबर और दिगंबर समुदाय आपसी सहमति से एक प्रबंधन बोर्ड नहीं बना लेते, तब तक मंदिर देवस्थान विभाग के पास ही रहेगा। जैन समाज की एकजुटता ही इस तीर्थ की मूल पहचान और मर्यादा को वापस दिलाने का एकमात्र रास्ता है।
धर्मावलंबियों की यही पुकार है: आस्था का सम्मान हो, पर मर्यादा की बलि न चढ़े।


















