विवेक विहार इमारत बनी लाक्षागृह, एक ही चिता पर सो गया पूरा परिवार, 9 जिंदा जले

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06 मई 2026 / जयेष्ठ कृष्ण चतुर्थी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/

रविवार 03 मई को सूर्य ने अंगड़ाई भी नहीं ली थी, जब पूरी दिल्ली गहरी नींद में सो रही थी, तब तड़के 3.38 पर विवेक विहार की एक इमारत लाक्षागृह में तब्दील होते देर नहीं लगी। 12 फायर टैंकर धड़ाधड़ दौड़े, पानी की बौछार हुई, ऊंची सीढ़ी लगाई, 15 को बचा भी लिया, पर 6 झुलसे और 9 की वह चिता ही बन गई।
नौ मासूमों की जिंदगियां थम गई

800 गज में दोनों तरफ 400-400 गज में चार-चार फ्लैट बने थे, पीछे की तरफ के, दूसरी, तीसरी, मंजिल पर जैन परिवार रहते थे। गहरे मीठे सपने इतने गहरे हो गये, कि बिस्तर से उठा भी नहीं गया और नींद सदा के लिये सुला गई। बी-13 इमारत में दूसरी मंजिल पर परिवार प्रमुख अरविंद जैन, उनकी पत्नी अनीता जैन, बड़ा पुत्र निशांत जैन, उसकी बहू आंचल जैन और डेढ़ साल का पोता आकाश जैन, तीसरी मंजिल पर परिवार प्रमुख नितिन जैन, पत्नी शैली जैन, 25 वर्षीय पुत्र सम्यक जैन, पहली मंजिल पर रह रही 45 वर्षीय शिखा जैन, इस हादसे में सदा के लिये चली गई।
नींद सदा के लिये ठहर गई

हादसा इतना अचानक और भयावह था कि लोगों को संभलने का मौका भी नहीं मिला। दूसरी मंजिल पर एसी कम्प्रेशर में एकाएक धमाका हुआ, जिसने खुशियों के आशियाने को आग की दरिया में बदल दिया। अरविंद जैन को जुड़वा पोते का जन्म दिन मनाने एक दिन पहले ही मानेसर जाना था। छोटा बेटा, पत्नी व बेटों के साथ जा चुका था, पर अरविन्द जी स्वयं किसी काम से रुक गये – कहा कि रविवार को पहुंच जाएंगे, इसलिए पत्नी, बड़ा बेटा, बहू, एक और पोता रुक गये थे और सभी अगली सुबह नहीं देख पाये। आग की लपटें इतनी विकराल थी कि दूसरी के साथ तीसरी-चौथी मंजिल पर भी धुएं का गुबार ने फेफड़ों से आक्सीजन छीन ली। जो लोग अपने को बचाने के लिये दौड़ें वो पीछे जाल, छत पर ताले और गेट के आटोमेटिक लॉक के कारण धुएं, आग के जाल में फंस कर रहे गये।

एक ही चिता पर सो गया पूरा परिवार
इस अग्निकांड की सबसे दर्दनाक तस्वीर दूसरी मंजिल से आई, जहां अरविंद जैन जी का पूरा संसार (5 लोग) बसता था। आग की लपटों ने न उम्र देखी, न रिश्ता। स्वयं, पत्नी, बड़ा बेटा, निशांत, बहू आंचल ने तड़पते-तड़पते दम तोड़ दिया। लेकिन कलेजा तब फट जाता है, जब डेढ़ साल का मासूम आकाश जैन का जिक्र आता है। वह नन्हा फरिश्ता जिसने अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा, इस क्रूर आग की भेंट चढ़ गया, जिस घर में उसकी किलकारियां गूंजनी थी, वहां अब सिर्फ सन्नाटा और राख का ढेर बचा था।

बंद दरवाजे से खत्म आखिरी उम्मीद
इमारत की तीसरी मंजिल पर रहने वाले नितिन जैन, उनकी पत्नी शैली जैन बेटे सम्यक की मौत छत पर गेट के पास मिली लाशों से अलग ही कहानी कह रही है। दमकल विभाग को ऊपर गुमटी के पास तीनों के शव मिले। संभवत: आखिरी पलों में, जब लोग जान बचाने के लिये ऊपर की ओर भाग रहे होंगे, लेकिन छत के दरवाजे पर ताला मिला, बस मौत का दरवाजा उन्हें बाहर निकलने से रोके रहा और धुएं के बीच दरवाजा पीटते बेगुनाहों की बेबसी की ही गवाह बन गई।

अस्पताल में लड़ते जिंदगी के जंग के मुख से वो दर्दनाक हादसा
पहली मंजिल पर रह रहे नवीन जैन इस समय सफदरजंग अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। अलवर के जाने-माने वकील खिल्ली मल जैन जी ने इस बारे में सान्ध्य महालक्ष्मी को बताया कि वह उनके साले हैं और उन्होंने बताया जैसे ही आग फैली वे और उनकी पत्नी बाहर निकल आये, आग फैलने लगी तो पत्नी शिखा ने धुएं के बीच जाकर सास और ससुर को बाहर निकालने में मदद की। दोनों बेटियों रक्षिता (22) और प्रियल (15) को उन्होंने कहा कि बेटियों यहीं से कूद जाओ, नीचे जाने का रास्ता नहीं है, आग से बच नहीं पाओगी, वैसे पैर टूट जायेंगे पर बच जाओगी। पिता की बात मानकर वे कूद गई, नीचे लोगों ने गद्दे लगा रखे थे। दोनों को कूदने से कुछ चोटें जरूर आई। उधर पत्नी शिखा फिर आग में बढ़ गई, पति ने तभी बुदबुदाया कि अब वो नहीं बचेगी, फिर भी उनके पीछे दौड़े। आग ने शिखा को लील लिया और पीछे भागे नवीन का हाथ और मुंह पूरी तरह झुलस गया, जिनका सफदरजंग में इलाज चल रहा है।

इसकी पूरी रिपोर्ट चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3706 में देख सकते हैं।

सान्ध्य महालक्ष्मी चिंतन: दमकल की 12 गाड़ियों ने घंटों की मशक्कत के बाद आग पर काबू तो पा लिया, लेकिन विवेक विहार की उन गलियों में पसरी खामोश चीखें अब भी सुनाई दे रही हैं। क्या यह सिर्फ एक हादसा था? या फिर सुरक्षा मानकों की अनदेखी ने नौ लोगों की बलि ले ली? पुलिस और दमकल विभाग अभी जांच कर रहे हैं कि क्या इमारत में आग से निबटने के इंतजाम थे या नहीं।
पर सच तो यह है कि जांच की रिपोर्ट आती रहेगी, मुआवजे के ऐलान होंगे, लेकिन वह डेढ़ साल का आकाश और हंसते खेलते परिवार कभी लौटकर नहीं आयेंगे। विवेक विहार के उस बी-13 इमारत की जली हुई दीवारें आज चीख-चीख कर कह रही हैं कि लापरवाही की कीमत कितनी बड़ी हो सकती है।