॰ महालक्ष्मी मंदिर को 1400 करोड़ का फंड
॰ मिली प्राचीन सीढ़ियां, क्या खुलेगा नया राज
॰ हिंदू समिति ने की FIR की मांग, पुरातत्व ने रोका काम, जांच शुरू

22 अप्रैल 2026 /बैसाख शुक्ल षष्ठी/चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/
हजार वर्ष प्राचीन महाराष्ट्र के कोल्हापुर का ऐतिहासिक महालक्ष्मी मंदिर, जिसे स्थानीय लोग अंबाबाई और जैन उसे जैन मंदिर कहते हैं, वहअब वहां चल रहे संरक्षण और मरम्मत कार्य के दौरान तीर्थंकर प्रतिमाओं के चेहरे मिटाने और कुछ अंग टूटने के कारण विवादों में आ गया है।
घटनाक्रम :
॰ 06 से 10 अप्रैल के बीच हिंदू संगठनों ने महालक्ष्मी मंदिर में चल रहे संवर्धन कार्य में ‘सेंड ब्लास्टिंग’ का उपयोग करने से विरोध शुरू कर कलेक्टर और देवस्थान समिति का घेराव किया।
॰ 11 अप्रैल : प्रशासन ने विवादित हिस्सों में काम रोकने का मौखिक आदेश दिया।
॰ 13-14 अप्रैल : पुरातत्व विभाग की एक टीम द्वारा मूर्तियों का सूक्ष्म निरीक्षण शुरू किया और काम रोक, जांच के आदेश दे दिये।

तीर्थंकर प्रतिमायें नष्ट होने की ओर, हिंदुत्वादी संगठन कह रहे देवी-देवताओं की मूर्तियों के हिस्से टूटे
इसी महालक्ष्मी मंदिर में तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागरजी, फिर गणधराचार्य श्री कुंथुसागरजी और उसके बाद आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी ने वहां जाकर द्वार के ऊपर कतारों में खड्गासन-पदमासन प्रतिमाों को स्पष्ट पहचानते हुये तीर्थंकर जिनालय एक स्वर से स्वीकार किया, जिसे 9वीं-10वीं सदी के आसपास बदल दिया गया। आज भी यहां ऐसी 61 प्रतिमायें, वो प्राचीन प्रमाण आज भी देखे जा सकते है। अब संवर्धन कार्य के दौरान लापरवाही से इन मूर्तियों के ऊपरी हिस्से घिस गये, कुछ हिस्से टूट गये।

जहां पर इस बारीक कार्य के लिए नाजुक औजारों की आवश्यकता थी, वहां ठेकेदारों ने कठोर मशीनों और हथौड़ों का इस्तेमाल किया, जिससे प्राचीन पत्थर चटक गये। यहां रसायनिक संरक्षण और क्षतिग्रस्त पत्थरों को बदलने तथा मंदिर के पत्थरों की सफाई के लिये सैंड ब्लास्टिंग तकनीक का उपयोग किया जा रहा था। इस तकनीक की वजह से प्राचीन और नाजुक नक्काशी घिस गई। कई मूर्तियों के चेहरे के भाव अब स्पष्ट नहीं दिख रहे। इस मंदिर से, जिसे हिंदू देवी देवता कह रहे हैं, उन तीर्थंकर मूर्तियों की पहचान मिटने के कागार पर है। इस पर जैन कोई भी आवाज उठाने की बजाय चुप हैं।
हिंदू जन जागृति समिति और अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं ने मंदिर परिसर का दौरा कर इन क्षतिग्रस्त मूर्तियों के वीडियो – फोटो बनाकर सबूत इकट्ठे कर प्रशासन को सौंपे और मांग की कि इस लापरवाही के लिये जिम्मेदार ठेकेदार पर आपराधिक मामला दर्ज किया जाये और आगे काम किसी विशेषज्ञ की देखरेख में कराया जाये।

संरक्षण के दौरान ऐतिहासिक खोज – मिली प्राचीन पत्थर की सीढ़ियां:
इस महालक्ष्मी मंदिर में गरुढ़ मंडल के पास खुदाई में प्राचीन पत्थरों की सीढ़ियां मिली हैं, जो सदियों से जमीन के नीचे दबी हुई थी। इन चार सीढ़ियों में से दो सीढ़ियों पर बेहद बारीक और सुदंर नक्काशी की गई है। यह नक्काशी प्राचीन काल की ‘हेपाइपंथी’ स्थापत्य शैली की याद दिला देती है। ये सीढ़ियां मंदिर के गरुड़ मंडप के ठीक नीचे पाई गई हैं।

इस मंदिर के विकास के लिए लगाई गई ‘नॉन हीटिंग’ टाइल्स को हटाया जा रहा था। इन टाइल्स की जगह अब पारंपरिक 9-10 इंच मोटे पत्थर बिछाए जाने हैं, ताकि मंदिर का मूल स्वरूप बना रहे। पश्चिम महाराष्ट्र देवस्थान समिति द्वारा मंदिर के संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। सोमवार 13 अप्रैल को जब गरुड़ मंडल के पास की फर्श की टाइलें हटाई गई, तो प्राचीन सीढ़ियां मिल गई। अब मांग है कि इन सीढ़ियों को 2-3 फीट और गहरा खोदा जाये, ताकि मंदिर के मूल आधार को समझा जा सके। यह सब 1400 करोड़ रुपये के महालक्ष्मी मंदिर विकास मास्टर प्लान के तहत हो रहा है। अभी पहले चरण में 144 करोड़ के कार्य प्रगति पर हैं।
इस बारे में पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड ननं. 3686 में देख सकते हैं।
चैनल महालक्ष्मी चिंतन : एक और विरासत से जैनत्व की पहचान मिटाई जा रही है, जिसे दूसरे लोग देवी-देवता कह रहे हैं, वास्तव में वो दीवारों पर उकेरी खड्गासन-पदमासन तीर्थंकर मूर्तियां हैं – वो भी 61, पुरातत्व विभाग के अंतर्गत जीर्णोद्धार के नाम पर। क्या ऐसे में जैन समाज को इस बात को नहीं उठाना चाहिए। हिंदू संगठन प्राथमिकी की मांग कर रहे और जैन चुप हैं। जैसे बदल दिया, तो हमें मतलब नहीं। गंभीरता से हर विरासत जो बदल दी गई हो, उस पर भी आवाज तो उठानी चाहिए, प्रयास तो करना ही चाहिए। वैसे श्री कृष्ण जी ने कहा भी कि कर्म तो कर, फल क्या मिलेगा, इसकी चिंता तू मत कर, बस कर्म कर, अपनी विरासतों को बचाने का प्रयास तो कर। शिखरजी, गिरनारजी, पालीताणा, पावागढ़, कई जगह स्थिति विकट हो चुकी, उज्जैन-मुंबई में मंदिर तोड़े गये और जैन समाज की ऐसी आवाज अब नहीं उठ रही, जैन समाज की रक्षा करने कोई दूसरा क्यों आयेगा, जब वह खुद ही खड़ा होना नहीं चाहता।















