॰ सोनगढ़ में आचार्य श्री ही नहीं, जिनवाणी का अपमान, अविनय, अवर्णावाद
॰ हर कोई जिन्हें देखकर होता नतमस्तक, पर सोनगढ़ में न आवास, न नमोस्तु न आदर
08 जनवरी 2026 / माघ कृष्ण षष्ठी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
‘‘बहन श्री के तलवे चाटने से अगर मोक्ष हो जाता है, तो निरंतर पद विहार करने वाले मुनिराजों के चरण छूने से किसी को मोक्ष नहीं होगा क्या? सब तरफ, सब तरह के लोग होते हैं, कम से कम स्वामी जी ने इनको सिखाया, थोड़ा-थोड़ा सा उपचार, थोड़ा-सा व्यवहार भी सिखा देते, तो कम से कम साग भाजी वाले भी, राह चलते झाड़ू लगाने वालों के भी हाथ जुड़ जाते हैं, ये पढ़े-लिखे अध्यात्मी जीव की, अहो, कैसा अहित हो रहा है जीवों का, धर्म के नाम पर कैसे ठगे जा रहे हैं। अध्यात्म बहुत जरूरी है, बिना तत्व ज्ञान के, बिना निश्चय ज्ञान के, बिना आत्मानुभूति के जीव का कल्याण नहीं होता। समयसार केवल सुनने वाले, केवल जीभ से बोलने वाले को, तो अनुभव हो गया, जो जी रहे हैं इन मुनिराजों का क्या? इतना दिगंबर मुद्रा का अवर्णावाद, इतना जिनवाणी का ऐसा अवर्णावाद, ऐसा अपमान। कुंदकुंद देव कह रहे हैं संयम काल के आखिरी समय तक मुनिराज होंगे, ये सब उसे झुठलाने में क्यों तुले हुए हैं। फिर कहते हैं बाजार में खोटे सिक्के मिलते हैं, हम कैसे लें लेवे, हम कह रहे हैं बाजार में निकलो, अगर बाजार में खोटे सिक्के हैं, तो असली सिक्के भी जरूर मिलेंगे। अगर खोटे सिक्के मार्किट में हैं, तो अच्छे भी है, बुरे हैं तो अच्छे भी। क्यों जनता को ठग रहे हैं, क्यों मार्ग को भ्रष्ट कर रहे हैं? इतने घने जंगल में 400 किमी और घोघा से माने तो 50 किमी की यात्रा के बाद एक तो जिनालय मिला और वहां पर ऐसे लोग मिले कि दर्शन भी ठीक से न करवा पावें, विश्राम भी ठीक से न करवा पावे। इतनी व्यवहारिकता तो श्वेताम्बर बंधुओं में भरपूर पाई जाती है। ’’ यह सब मंच से कहा आचार्य श्री सुनील सागरजी ने, क्यों?

संकीर्ण पंथवादी मतवादी दिगंबर जैनियों द्वारा आचार्य श्री सुनील सागरजी ससंघ के प्रति अविनय और अकर्मठता पूर्ण व्यवहार हुआ, जब वे घोघा से विहार करने सोनगढ़ पहुंचे। घोघा में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव पूर्ण करवाकर पालीताना से पहले वहां पहुंचे। सोनगढ़ में विशाल दिगंबर जैन मंदिर है। समुचित आवास भवन हैं, समृद्ध कमेटियां हैं, पर किसी ने भी आचार्य श्री के आगमन पर ठहरने की व्यवस्था या किसी भी प्रकार के सेवा प्रबंध तनिक भी रुचि न दिखाते हुए आचार्य श्री संघ के सेवा व्यवस्थाओं को मना तक बोल दिया।
यहां तक कि आचार्य श्री सोनगढ़ के एक जिनालय में दर्शन हेतु गये भी, उसके प्रांगण में 150 से अधिक शिविरार्थी मौजूद थे। किंतु संकीर्ण पंथवाद का परिचय देते हुए आये हुए आचार्य श्री संघ में किसी को विनय नहीं किया, न ही नमोस्तु किया, न ही उनके सम्मान में खड़े हुए। सोनगढ़ दिगंबर जैन समाज, दिगंबर जैन संस्था और शिविर में मौजूद उनके अनुयायी इस तरह की कट्टर क्रूर मानसिकता से ग्रसित हैं, जिनमें जिनवाणी ने नहीं, अपितु विष वाणी परोसी जा चुकी है। ऐसी सोच?
आज देश में जहा भी दिगंबर मुनिराज विहार करते हैं, वहां उनको यदि कोई छोटा-बड़ा, गरीब, आदिवासी भी, हिंदू भाई या सिख भी, यानि कोई अजैन भी क्यों न हो, वो भी एक बार तो दिगंबर मुनिराज को देखकर झुक जाते हैं, हाथ जुड़ जाते हैं, विनय अवश्य करते हैं, साथ ही पूरा समर्पण भी दिखाते हैं। स्पष्ट है कि वे श्रद्धा से नतमस्तक होकर उनकी सेवा सुश्रुषा पर पुण्य संचय करता है।
लेकिन सोनगढ़ में यह घटना निश्चित ही जैन धर्म व समाज को क्षति पहुंचाने वाली, जैन संगठन को कुठाराघात करने वाली, बहुत ही शर्मसार करने वाली और अति दुखद व पीड़ादायक है। कहते हैं न, हमें तो अपनो ने ही लूटा, गैरों में कहां दम था, अपनी कश्ती तो वहां डूबी, जहां पानी भी कम था।
संकीर्ण पंथवादी मतवादी दिगंबर जैन बंधुओं द्वारा संयम भूषण दिगंबराचार्यों, संघ के प्रति अविनय और अकर्मठता पूर्ण व्यवहार, इस कलिकाल में तीर्थंकर के लघुनंदन, उनके द्वारा प्रशस्त मोक्ष मार्ग पर गमन कर रहे, प्रभु वर्धमान के प्रतिबिंब हमारे समस्त दिगंबर साधु भगवंत हैं।
इसकी पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के ऐपिसोड नं. 3585 में देख सकते हैं।
चैनल महालक्ष्मी चिंतन : जहां राह-राह पर हमारे श्वेताम्बर समाज व श्वेताम्बर भगवंतों ने अनेकों श्वेताम्बर उपाश्रय व तीर्थों पर आचार्य श्री ससंघ के लिए सहृदय अपनत्व, साधर्मिक स्नेह, स्वागत सत्कार, साधन योग्य कुशल व्यवस्था व विनययुक्त व्यवहार किया गया, जो पूरे अहिंसामय विश्व जैन धर्म के लिए अत्यंत शुभ प्रेरणा है। वहीं सोनगढ़ में शिविरार्थियों द्वारा असम्मान, अविनय पूरी जिनवाणी का अपमान है। यह कट्टर क्रूर मानसिकता पूरे जैन समाज को शर्मसार करने वाली घटना है। हमारी एकता व समर्पण पर कुठाराघात है, दुखद है, पीड़ादायक है।















