सौंदर्यीकरण के नाम पर संस्कृति का ध्वस्तीकरण क्यों ?

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21 जनवरी 2026 / माघ शुक्ल तृतीया/चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
आज सरकार सौंदर्यीकरण, चौड़ीकरण आदि के लिए टॉप गियर में है, सैकड़ों करोड़ के बजटों के साथ इसके लिये संस्कृति, धार्मिक स्थलों को भी मिटा कर, तोड़कर नया बनाने में देर नहीं लगती। अभी काशी में मणिकर्णिका घाट पर सौंदर्यीकरण के लिये तोड़ाफोड़ी की गई। इस घाट स्थान के बारे में कहा जाता है कि पार्वतीजी की कान की बाली (मणिकर्णिका) गंगा में खो गई, जिससे उन्होंने गुस्से में आकर कह दिया कि इस स्थान पर शवों का अंतिम संस्कार किया जाएगा और आज वहां रोजाना 150 से 200 शवों का संस्कार किया जाता है, कहा यह भी जाता है यहां संस्कार के समय शिवजी द्वारा तारक मंत्र सुनाया जाता है, जिससे उसे मुक्ति मिलती है। इसी तरह हरीशचन्द्र घाट भी है।

अहिल्याबाई होल्कर की यहां 1771 में प्रतिमा स्थापित की गई। यहां विवाद तब शुरू हुआ, जब घाट पर सौंदर्यीकरण और पुनर्विकास कार्यों के लिये बुलडोजर चलाया गया। सन् 2023 में इसके सौन्दर्यीकरण कार्य का शुभारम्भ प्रधानमंत्री द्वारा किया गया।

आज चैनल महालक्ष्मी इस बात पर चर्चा नहीं कर रहा कि प्रतिमा टूटी या नहीं। एआई से भ्रांति फैलाई गई या नहीं। मुद्दा यह है कि इस सौंदर्यीकरण पर राजनीति क्यों तेज हो गई। क्या घाट पर बुलडोजर पहली बार चला? काशी के एक घाट से पूरे देश में हलचल हो गई, विपक्ष विरोध में, पक्ष सफाई में लग गया। इतना हो-हल्ला, इस बात पर था कि सदियों पुरानी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को ध्वस्त करना क्या सही है? प्रधानमंत्री जी ने एक बार कहा था कि किसी देश के विकास की गाथा, उसकी संस्कृति से पहचानी जाती है। सुंदरता के नाम पर, विकास के नाम पर, प्राचीन संस्कृति मिटाना क्या सही है?

इतना हो-हल्ला, पक्ष-विपक्ष, देश भर में विरोध तब क्यों नहीं हुआ, जब उज्जैन में 400 साल प्राचीन दिगम्बर जैन मंदिर को तोड़ा गया, बुलडोजर से। अरे हां, जैन समाज पर इतना दबाव कि विरोध की बजाय, उन्होंने स्वयं तोड़ दिया। कोई शोर तक नहीं किया, वहीं बहुसंख्यक समाज के मंदिर को बीच सड़क में होने के बावजूद सुंदर चौराहे का रूप दे दिया। दादा गुरु आचार्य ज्ञानसागरजी की स्थली पर सड़क चौड़ीकरण के कारण ऐसी बात हुई। ऐसी कई गाथायें हैं, पर हो-हल्ला केवल वोट बैंक के लिए होता है, यह क्या उचित न्याय है?

चैनल महालक्ष्मी चिंतन : वह विकास और वह सौन्दर्य किस काम का, जहां धार्मिक स्थलों को, प्राचीन विरासतों को तोड़ा जाये, मिटाया जाये, ऐसे औरंगजेबी कदम क्या ठीक कहे जायें? बहुसंख्यक के लिये विरोध-सफाई सबकुछ, अति अल्पसंख्यक जैन समाज के लिये एक गहरी चुप्पी, यह भेदभाव क्यों?