10 अक्टूबर 2025 / कर्तिक कृष्ण चतुर्थी /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
संघ के समस्त साधुओं द्वारा श्रवण गौरव, पुरुषार्थी के पुरुषोत्तम, गुण गौरव, संस्कार प्रणेता, ग्राम मन्दिर उद्धारक, इटावा गौरव, करुणा सागर, अहिंसा तीर्थ प्रणेता, राष्ट्र संत, प्रभावना दिवाकर, श्रमण धर्म प्रभाकर जैसी विभिन्न उपाधियां अग्रणी संतों और समाज से, 55 हजार किमी से ज्यादा की पदयात्रायें करने वाले आचार्य श्री प्रमुख सागरजी, आज जैन समाज ही नहीं, राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं। उनके अलौकिक जीवन के रजत संयम दिवस पर सान्ध्य महालक्ष्मी – चैनल महालक्ष्मी परिवार कालचक्र के पहिये को कुछ पीछे घुमाकर हृदय पुलकित घटनाओं में से चंद को पुन: स्मरित करने का प्रयास कर रहा है।
दो तिहाई भारत को अपने पगों से एक नहीं दो-तीन बार नापने वाले आचार्य श्री प्रमुख सागरजी अहिंसा प्रवचन माला 2005 में महाराष्ट्र में शिरडी, श्रीरामपुर, कोपरगांव, बीड, धुलिया की आज भी भुलाई नहीं जा सकती।

तमिलनाडु-कनार्टक की पदयात्रायें वेल्लूर के बाद मैसूर, पैलेस से ब्लड डोनेशन की प्रेरणा देते, धर्मस्थल, श्रवणबेलगोल, बेंगलूरु विधानसभा, अब कहलाये जा रहे तेलांगना के हैदराबाद के चिड़ियाघर में जंगली पशुओं को 2008 में आशीर्वाद देते पांडेचरी में 2009 का चातुर्मास। फिर 2011 में पुष्पगिरि में पूरे संघ के बीच बिताये क्षण, 2013 की बिल्कुल उत्तर के हिमाचल-उत्तराखण्ड के शिखरों की छूते मसूरी, शिमला, बद्रीनाथ, ऋषिकेश, हरिद्वार की ठण्ड में भी पदयात्रा, उससे पूर्व गुलाबी नगरी जयपुर, पदमपुरा से बढ़े तथा दिगंबर जैनों से अछूता रहने वाला पंजाब, जहां से फिरोजपुर हुसैनी बार्डर पर सैनिकों को आशीर्वाद से अमृतसर, जालंधर आदि के बाद 2013 का ऐतिहासिक चातुर्मास, जिसमें क्रांतिकारी संत श्री तरुणसागरजी द्वारा किया गया आपका केशलोंच, फिर सभी प्रमुख संतों को एक मंच पर लाकर ऐतिहासिक सम्मेलन कौन भूल सकता है।

वहां से हरियाणा में बढ़ते महाभारत की धरा कुरुक्षेत्र को पार कर अंबाला में पारसप्रभु की विशाल प्रतिमा की स्थापना, चंडीगढ़ से होते फिर दक्षिण की पुन: यात्रा 2016 में हैदराबाद से फिर गोवा 2018 तक, उस बीच गोम्मटेश बाहुबली आदि के दर्शन, 2018 में महाराष्ट्र के नंदगिरि, मांगीतुंगी के बाद धर्मस्थल महामस्तकाभिषेक और 2019 की बुंदेलखंड यात्रा में विभिन्न तीर्थों के दर्शन, अयोध्या और इटावा में नवग्रह तीर्थ निर्माण के बाद 2022 के श्री सम्मेदशिखरजी के चातुर्मास के बाद पूर्वोत्तर की ओर कदम बढ़ा दिये। 2023 -24 में असम-नागालैण्ड आदि उन क्षेत्रों में जहां लोग दिगंबर आचार्यों के दर्शन को प्यासे रहते हैं, उनमें एक क्रांति ला दी और फिर अब कोलकाता बेलगछिया में चल रहे चातुर्मास में रोज करायें एक दिन का चातुर्मास आदि के साथ अब संकल्प प्राचीन तीर्थों के जीर्णोद्धार के लिये प्रबुद्ध जैन समाज को जोड़ना – जागृति लाने का।

वर्तमान चातुर्मास के दौरान आचार्य श्री से कुछ वर्तमान मुद्दों पर गंभीर चर्या हुई, जिनमें से कुछ है:-
सवाल – जवाब (प्रमुख सागर महाराज जी)
॰ चैनल महालक्ष्मी- 500 करोड़ चातुर्मास का खर्च कितना सदुपयोग, कितना दुरुपयोग?
आ. श्री प्रमुख सागर जी – आज लोग नाम के लिये पैसा खर्च करते हैं, काम के लिया नहीं करते। बड़ी – बड़ी बोलियां केवल नाम के लिये ले रहा है। अगर उस व्यक्ति से कहा जाये कि यह पैसा स्कूल में लगाना है तो नहीं आयेगा। आज स्थिति यह है कि हम पूजन की बोली लगा कर पैसा इकट्ठा कर रहे हैं, पर उस पैसे का दुरुपयोग ना करके शिक्षा, चिकित्सा में लगाएं, तो चातुर्मास सार्थक हो जाता है। मैं यही कहूंगा कि बोलियों के माध्यम से पैसा इकट्ठा तो करो, लेकिन उस पैसे को शिक्षा एवं चिकित्सा में लगाया जाए।

हाँ, जो आपका कहना है कि फालतू का टेंट, फालतू का जो दिखावे में जो खर्च हो रहा है, वह दिखावे में काम से कम खर्च करें और अच्छे काम का प्रचार करें, क्योंकि जैसे जंगल में मोर नाचा, किसने देखा।
मैंने भी कोलकाता में शिक्षा के लिए लोगों को आह्वान किया और कहां कि मैं यहां पर शिक्षा का एक बड़ा हब चालू कर सकता हूं, लेकिन सुनने वाले बहुत मिले, वापस कोई नहीं आया। आज भगवान के माध्यम से पैसा इकट्ठा करके अच्छे कार्य में लगाना चाहिए।

2. चैनल महालक्ष्मी- तीर्थ सुरक्षा के लिए क्या सबसे जरूरी है?
आ. श्री प्रमुख सागर जी – हमारे मंदिरों का जीर्णोद्धार एवं उनकी संस्कृति को बचाने के लिये मंदिर में इधर-उधर के पुजारी न रख कर जैन लोगों को यह सौभाग्य देना चाहिये। ऐसे जैन परिवार बहुत हैं, जिनके घर में खाने के लिये भी पैसा नहीं है। उन्हें पैसा देकर तीर्थ पर बसाने का कार्य करें, बड़े-बड़े तीर्थों पर उद्योगपतियों द्वारा उद्योग चालू करवाना चाहिए, जो आसपास जैन लोग रहते हैं, उनको उनसे जोड़ना चाहिए। उनके अंदर जैन धर्म के संस्कार पहुंचेंगे। वहां पर शिक्षा के केंद्र एवं गुरुकुल चालू करने चाहिए।

॰ चैनल महालक्ष्मी- कमेटियां बहुत सारी, फिर क्यों तीर्थ की सुरक्षा खतरे में?
आ. श्री प्रमुख सागरजी – तीर्थ रक्षा कमेटियां, समितियाँ इतनी सारी बन गई हैं। सभी कमेटियों को एक साथ बैठना चाहिए और यह निर्णय लेना चाहिए कि कौन सी कमेटी कहां पर क्या काम करेगी और अपना अपना कार्य करके भारतवर्षीय तीर्थक्षेत्र कमेटी को अपनी-अपनी रिपोर्ट पहुंचाएं कि हमने यहां पर यह कार्य किया है, आप इसकी सराहना करें और हर कोई सदस्य बनने के लिए तैयार हो जाएगा और एक बहुत अच्छी लिंक बनेगी।
तीर्थक्षेत्र कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जम्बू प्रसाद जी हैं, जिनका हमारा बहुत पुराना संबंध है। जिस समय हमारा दिल्ली के अंदर चातुर्मास हुआ था, वो अपने गाजियाबाद में चातुर्मास कराने का प्रयास कर रहे थे। जम्बू प्रसादजी बहुत अच्छे व्यकित्व हैं। वो कद में छोटे जरूर हैं, लेकिन पद और जीवन उनका बहुत ऊंचा है। वह इस मार्ग में बढ़े हैं और मैं कहूंगा कि इतना अच्छा तीर्थक्षेत्र कमेटी को व्यक्तित्व मिला है, वह सबको जोड़कर पंथवाद – संतवाद – मंदिर से हटकर उन्हें प्योर जैन धर्म की प्रभावना दिखती है, तो उससे सबको जुड़ना चाहिये और वो हर संस्था को भी जोड़ें।

॰ चैनल महालक्ष्मी- प्राचीन तीर्थों का उद्धार कैसे तैयार?
आ. श्री प्रमुख सागर जी– इसमें पहल हमारे अंतर्मना प्रसन्न सागर जी महाराज कर रहें हैं, जहां उनका चातुर्मास होता है, उस तीर्थ, उस मंदिर की कायाकल्प बदल जाती है। वास्तव में वो इस जीर्णोद्धार में बहुत श्रेष्ठ कार्य कर रहे हैं। सुधा सागर जी महाराज भी इस कार्य में लगे हुये हैं। मेरी सोच में यह आया है कि जितने भी साधु हैं लगभग 1500 हैं, जो जिस क्षेत्र में है, वहां की कमेटी उनके पास जाए और मंदिरों को साधुओं के हाथ में दे दें और बोलें कि महाराज जी इन मंदिरों का रखरखाव और जीर्णोद्धार आपको ही देखना है। हर साधु तो बोलते नहीं हैं, वह अपने साधना करके चुपचाप चले जाते हैं। उन्हें छेड़ना नहीं चाहिए। साधक को दो चीजों का ख्याल करना हैं (साधक और प्रभावक) साधक को साधना करने दो और उनको इन कार्यों में मत लगाओ उनकी अनुकूलता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए और दूसरे वो हैं प्रभावक, प्रभावक भी साधक हैं, लेकिन प्रभाव होना उनके लिए मुख्य है, जिनसे हो सकती है प्रभावना। उनको एक-एक तीर्थ की जिम्मेदारी सौंप दी जाये कि महाराज इनको आपको देखना है। उनकी मानसिकताओं से तीर्थ की व्यवस्था बनी रहे, लेकिन होता क्या है तीर्थ तो महाराज को सौंप दिया और व्यवस्थाएं हमारी चलेंगी, महाराज आप सिर्फ पैसा लाके दें और बाकि का हम काम करेंगे। ऐसा नहीं, यह भी जरूरी है कि महाराज भी उसके लिए समर्पित रहे, जिससे हमारे तीर्थ का उद्धार जरूर होगा।

॰ चैनल महालक्ष्मी- दीक्षा दिवस मनायें तो कुछ ऐसे मनायें कैसे?
आ. श्री प्रमुख सागर जी– हमारा 25वां रजत दीक्षा जयंती है, मेरे गुरुदेव आचार्य पुष्पदंत सागर जी की बड़ी अनुकम्पा है। बहुत ज्यादा माइक, माला, टेंट में ज्यादा खर्च न कर 25वें साल में प्रवेश कर रहा हूं। दीक्षा के काल में तो 25 मंदिरों का जीर्णोद्धार हो, ऐसे 25 श्रेष्ठी श्रावक मैं उसमें संभावित तैयार करूंगा, जो 25 मंदिरों को गोद ले लें। हमारे ऐसे बड़े बुजुर्ग जो 50 साल से, 80 साल से मंदिरों में पूजा कर रहे हैं, उन 25 लोगों का सम्मान करना चाहता हूं। ऐसे 25 लोग चाहते हैं जो शुद्र जल का त्याग किये बैठें हैं, उनको भी लाना चाहता हूं।


















