मेरी स्मृतियां, मेरे शब्दों में – गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी

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03 अक्टूबर 2025 / आश्विन शुक्ल एकादशी/चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /

अध्यात्म, व्याकरण, न्याय, सिद्धांत, साहित्य, चारों अनुयोग के साथ अनेकानेक विधानों से देश के कोने-कोने में जिनेन्द्र भक्ति की धारा प्रवाहित करने वाली, तीर्थंकरों की कल्याणक भूमियों के विकास, संस्कृति का संरक्षण, संवर्धन, विकास करते 92वां अवतरण दिवस एवं 74वां महासंयम दिवस, ऐसे में आज सान्ध्य महालक्ष्मी निशब्द है। ऐसे अनुपम अवसर पर हमारी कलम से नहीं, पूजनीय माताजी के मुख, उन्हीं के शब्दों में, उन्हीं की अनमोल स्मृतियां, विशेष रूप से दीक्षा पूर्व के मैना के रूप में 41 स्मृतियां….

1. प्रौढ़ महिलाओं के बराबर बचपन का कद
सात-आठ वर्ष की थी मैं, सभी लड़कियां खेलती, पर मां कहती खेलकूद कर क्या, हम मंदिर चलेंगे। वहां आरती कर मैं शास्त्र सुनने बैठ जाती। वो भी बराबर की लड़कियों के बीच नहीं, प्रौढ़ महिलाओं के बीच।

2. 8 साल की उम्र में ऐसा गंभीर चिंतन
उस उम्र में मां ने पदमनंदिपंचविशंतिका के एक-दो श्लोक मुझे भी पढ़ाती। तब मैं सोचती जब आत्मा अनंत शक्तिवाली है, तो मैं उसे क्यों प्रकट नहीं कर सकती?

3. लोग 60 साल में स्वाध्याय को नहीं गुन पाते
लगभग 9 साल की उम्र में स्वाध्याय आरंभ कर दिया और दर्शन कथा और शीलकथा सैकड़ों बार पढ़ डाले और शीलकथा को जीवन में गुना करती।

4. शायद आज तक किसी और ने नहीं किया यह
शीलकथा पढ़ते एक दिन भगवान के सामने बैठकर जीवन पर्यन्त शीलव्रत ग्रहण कर लिये। फिर चुपके से छोटी बहन को दे दिये और फिर साथ की कई सहेलियों को भी।

5. छोटी उम्र में बड़ी सोच
‘अंकलक निकलंक’ नाटक पाठशाला के लड़के कर रहे थे, जिसमें एक पंक्ति – ‘कीचड़ में पैर रखकर धोने की अपेक्षा, कीचड़ में पैर ही न रखना अच्छा है’। उस पंक्ति को अनेक बार गुना और जैसे सोच लिया कि विवाह कर उसे छोड़, पुन: दीक्षा लेने की अपेक्षा, विवाह ही न करना उत्तम है।

6. सम्यक्त्व की मिथ्यात्व पर विजय की अनोहनी गाथा
छोटे दोनों भाई को चेचक निकल आई। सभी ने नीम वृक्ष की पूजा और मालिन को सामाग्री देने को सभी ने कहा। पर मैंने मां को मना कर दिया, यह मिथ्यात्व है। रोज मंदिर जाती शीतलनाथ जी की पूजा करती, गंधोदक लाकर दोनों भाइयों के सर्वांग पर लगाती, तबियत बहुत खराब हो गई। सबने कहा ये अपने भाइयों को मार देगी धरम-धरम चिल्लाकर। फिर मैं घबरा गई, मंदिरजी जा कर भगवान से बोली – अब धर्म की और मेरी लाज आपके हाथ में है। मेरे दोनों भाई मर गये, तो वृक्ष और माता पूजने लगेगी, सम्यक्त्व भक्ति को कोई नहीं समझेगा। भक्ति स्तोत्र रोज पढ़ती, गंधोदक लगाती, दोनों ठीक हो गये। वहीं दूसरी महिला का, जो पेड़ पूजती थी, उसका बेटा मर गया।

7. विद्वानों को भी निशब्द करने का साहस
करवा चौथ पर सब अग्रवाल जैन महिलायें घर में गौरी बनाकर फूल चढ़ाती, सिंदूर लगाती, सास – ननद को बायना। मां को समझाया, मिथ्यात्व मां ने तो छोड़ दिया, पर दादी बोली – पति-पुत्रों का त्यौहार नहीं छोड़ना चाहिए। फिर मैंने पंडित मनोहरलाल शास्त्री से कहा तो वो बोले – वो सब मिथ्यात्व है, पर सास ननद को मिठाई दे दो। पर मैंने फिर तर्क किया कि जैन धर्म में करवा चौथ क्यों, फिर मिठाई क्यों? पण्डितजी चुप, फिर बोले – यह कन्या कोई देवी है। बहुत होनहार है।

8. गजब की स्मरण शक्ति
उम्र 9-10 की थी, तब पण्डितजी छहढाला पढ़ाते। लड़कियां खड़े होकर सुनाती, भूल जाती। मैं घर के काम करके एक-दो घण्टे लेट ही वहां पहुंचती। पण्डितजी ने कहा – जो घर से याद करके नहीं आता, वो हाथ ऊपर करे। मैंने भी किया। पण्डितजी बोले – मैना, तुम तो रोज सुना देती हो, फिर क्यों खड़ा किया। मैं बोली – मैंने घर में कभी याद नहीं किया, लड़कियां सुनाती है यहां, मैं यहीं याद कर लेती हूं। सभी आश्चर्यचकित।

9. आज मातायें जन्म से नौकरों को सौंप देती हैं बच्चे
मेरा प्राय:- नन्हे-नन्हे भाई-बहनों को संभालने, खिलाने-पिलाने, रोते को चुप कराने में पूरा समय निकल जाता। छोटी उम्र में भी सोचती कि नौकरों के अधीन बच्चों को डालना सही नहीं। रसोई में भी काम, गेहूं चावल भी खुद साफ करती।

10. जिनवाणी के प्रति अनूठी लगन
भाई-बहनों को संभालते समय नहीं मिलता, इसलिये जिनवाणी को विनय के साथ उच्च स्थान पर रखकर चौका साफ करते, बर्तन धोते, दाल-चावल साफ करते, एक – एक पंक्ति पढ़ते रट लेती, फिर रटे हुये को सोते समय और उठते दोहरा लेती।

11. पशुओं की पीड़ा से सिहरन
बैलगाड़ी पर ज्यादा वजन, तांगे के घोड़े को चाबुक मारने, कुत्ते को घर में घुसने पर मारते, तो रोम-रोम सिहर उठता, सोचती इन अनाथ पशुओं का नाथ कौन? कुत्ते के घर में घुसने पर मैं रोटी लेकर बाहर जाती, कुत्ते को ऐसे हटाती।

12. मां की तरह भावना
मेरी मां को नानाजी ने दहेज में ‘पदमनंदिपंचविशंतिका’ नाम का ग्रंथ दिया। मां उसका सदा स्वाध्याय करती और कहती इसी से आजन्म शीलव्रत, अष्टमी और चौदस का ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था और मेरे में भी उसी से वैराग्य बढ़ने लगा।

13. मां को दे दिया संकेत
घर में चर्चा होने लगी बेटी सयानी हो गई, वर ढूंढना चाहिये। तब एक रात्रि में मैंने मां को कह दिया ‘मैं कथमपि संसार बंधन में नहीं फंसना चाहती, मैंने गृहत्याग का पूर्ण निर्णय लिया है। ये मनुष्य भव यू हीं व्यर्थ नहीं खोना।’ मां समझने लगी शायद ही यह विवाह करायेगी।

14. ऐसे ही हर पिता के हों संस्कार
मुझे आज तक स्मृति में नहीं कि कभी पिता ने क्रोध से डांटा हो, कटु शब्द कहें हो, थप्पड़ तो दूर की बात है, वो कहते कि पराये घर जायेगी, कभी मत मारो, मत डांटो, प्यार दो।

15. बेटा-बेटी में फर्क नहीं समझना
जब मैं घर छोड़ने की बात कर रही थी, तब मेरे चार भाई, चार बहनें थीं। लोग हंसी में पिताजी से कहते कि तुम्हारी 5 लड़किया हैं। पिताजी को बुरा लगता – कहते, भाई, आज से मेरी लड़कियों को मत गिनना, किसी के भाग्य का नहीं खाती। पुत्र की तरह पुत्री भी मेरी संतान हैं।

16. बेटी को बोझ मत समझो
एक विद्वान की पिताजी से दहेज पर चर्चा चल रही थी, एक ने टोंका – छोटेलाल तुम्हारी तो 5 बेटियां हैं। पिताजी कहते – सभी अपने-अपने भाग्य का कुछ लेकर आई हैं, तुम्हारा क्यों पेट फूल रहा है। सब कहते – लाला छोटेलाल, तुम्हारा नाम तो छोटे हैं, पर तुम्हारा हृदय कितना बड़ा है।

17. गर्व करें ऐसे पिता पर
दुकान पर लोगो की चर्चा को पिताजी रोज आकर मुझे सुनाते और पूछते – मैंने अच्छा किया या बुरा। उनके कार्य का मैं अपनी बुद्धि से पिता को अच्छे कार्य को ‘अच्छा’ कहकर जवाब देती। मेरे अनुभव में ‘बुरा’ तो कभी आया ही नहीं।

18. छोटी बेटी का बड़ा काम
पिता जी मंदिर जाकर ही खाना खाते। मंदिर बंद होता, तो मैं चाबी लेकर आती, तब दर्शन करके ही खाते। घर में एक शास्त्र लाकर मैंने ही उन्हें दिया और उनको स्वाध्याय की आदत पड़ गई।

19. पिता के अच्छे संस्कार
पिताजी जब कभी कानपुर जाते, तो पूड़ी साग बनाकर लेकर जाते। कई दिन के लिये विराजते तो खिचड़ी का सामान ले जाते और वहां अंगीठी पर अपने हाथ से बनाकर खा लेते। होटल का या बाजार का, कभी पसंद नहीं करते।

20. पिता की सरलता
पिता का वो किस्सा, जिसे सुनाते खूब हंसे, गरमी के दिनों में एक गृहस्थ कंबल ओढ़कर आया। कपड़े देखता रहा, फिर उसने साटन का एक थान कंबल में दबा लिया, मैंने देख लिया, कुछ नहीं बोला। फिर हंसने लगे। मैंने कहा – आपने क्यों नहीं फटकारा? वे सदा कहते, गरीब था, चोरी का माल बेचकर कितने दिन खायेगा।

21. काम ऐसा क्यों? जिसमें हो हिंसा
पिताजी पहले आटे की चक्की का काम करते थे, किंतु उसमें घुन पिसते देख, उसी दिन काम बंद कर दिया। संतोष में सदा सुख मानते, मायाचारी से दूर, सट्टे को जुआ मानते थे।

22. बाजार का घी त्यागा
एक दिन घी की मटकी में अनगिनत लाल चींटियां, सभी मरी हुई। मां ने ग्वालिन को घी दिखाकर वापस किया, तो ग्वालिन बोली – क्या हो गया, छान कर ले आती हूं। बस यह सोच, उसी दिन से मैंने बाजार का घी त्याग दिया।

23. दृढ़ता से कभी डिगी नहीं
बाजार का घी त्याग दिया और टिकैत नगर में जैनों में दही जमाकर बिलौने की आदत नहीं थी। सब कहते – अब सूखी रोटी खायेगी। पर मैं दृढ़ थी। तब मां ताजी-ताजी रोटी दूध में भिगोकर खाने को दिया करती। मां जानती थी, यह बहुत दृढ़ है, मानेगी नहीं।

24.दृढ़ता मजबूत
एक दिन मुनीम बढ़िया गहने लेकर आया, बोला लाला ने कहा है मैना को पसंद कराओ, मैंने मां को कहा, ‘ मुझे नहीं, शांति को पसंद करा लो’, यह देख मां फूट-फूट कर रोने लगी। पिताजी आये, वो कुछ बोलते उनको भी धर्म पाठ पढ़ा दिया। गांव में चर्चा फैल गई, मैना विवाह नहीं, ब्रह्मचर्य व्रत लेना चाहती है।

25. सरलता में नहीं समझी, माया प्रपंच
ब्रह्मचर्य व्रत की बात सुन मामाजी गुस्से में मुझे समझाने लगे – जैन शास्त्रों से कुंवारी कन्यायें दीक्षा नहीं लेती। मैंने पूछा- ब्राह्मी, सुंदरी, अनंतमती, चंदना ने कैसे दीक्षा ली? मामा बोले – वे सब नपुंसक थीं। मामा, शास्त्रों में कन्या कहा है, नपुंसक नहीं। मामा फटकारे, मैं टस से मस नहीं, तो सारा गुस्सा जीजी पर उलट दिया।

26. अडिग दृढ़ता
पिताजी ब्रह्मचर्य नहीं स्वीकार पा रहे थे, वे यही कहते – अरे कुछ नहीं, जबर्दस्ती शादी करो, उसे बकने दो, वह अभी क्या समझती है? अभी दूध के दांत नहीं टूटे हैं। भला इतनी छोटी लड़की के ब्रह्मचर्य व्रत ले लेने से दुनिया हमें क्या कहेगी? पर उनकी बातों का मुझ पर असर नहीं पड़ा।

27. दृढ़ता हर दबाव से मजबूत
पूरे गांव में लोग कहते – सैकड़ों वर्षों से ऐसा नहीं सुना, किसी लड़की ने ब्रह्मचर्य व्रत लिया हो। दूसरे कहते हजारों साल में ऐसा नहीं हुआ। मां कहती – मंदिर से आकर हाथ के हाथ दूध न मिले, तो चक्कर आने लगते है। उपवास इसके वश में नहीं। मैं सिर्फ कहती – धीरे-धीरे अभ्यास हो जाएगा।

28. स्वप्न में पूर्णिमा के चांद का संकेत
रात्रि के पिछले पहर में मैंने स्वप्न देखा, ‘मैं श्वेत वस्त्र पहनकर हाथ में पूजन की सामग्री लेकर मंदिर जा रही हूं। आकाश में ऊपर पूर्णिमा का पूर्ण चन्द्रमा मेरे साथ-साथ चल रहा है। मेरे ऊपर और मेरे आसपास खूब अच्छी चांदनी छिटक रही है, पर अन्यत्र नहीं जा रही है।’ मैं अद्भुत स्वप्न देखकर प्रसन्न हो गई, मेरी इच्छा सफल होने वाली है। छोटे भाई कैलाशचंद ने कहा – जीजी, तुम जल्द अपनी मनोभावना सफल करोगी।

29. आचार्य श्री का संकेत छोटी उम्र में दीक्षा नहीं
तभी एक दिन पिताजी बोले – लखनऊ में दिगंबर मुनिराज आये हैं, उनका बड़ा प्रभाव है। मुझे दर्शनों की उत्कंठा हुई पर पिता राजी नहीं हुए… कहीं वहीं न रह जाये। पर मेरे वैराग्य की बात चर्चा बन गई कि टिकैत नगर की छोटी लड़की दीक्षा लेना चाहती है। तब महाराज ने कहा – हां, ऐसे-ऐसे श्मशान वैराग्य तो बहुत देखे हैं। छोटी उम्र में दीक्षा लेना कोई सरल कार्य नहीं है। यह जवाब किसी के द्वारा मुझ तक पहुंच गया। मैं घबराई नहीं, अपने निर्णय पर अडिग रही।

30. मरण संन्यास में है, घर में नहीं
आचार्य श्री देशभूषण जी का संघ टिकैत नगर आया, तब एक दिन समय पाकर मां मुझे महाराजश्री के पास लेकर चली गई और बोली – महाराज जी, इसका हाथ देखकर बताओ, इसके भाग्य में विवाह है या नहीं। महाराजजी ने हाथ देखा और प्रसन्न होकर बोले – इसके हाथ में राजयोग है, यह बहुत शीघ्र घर छोड़ देगी और इसका मरण संन्यास में है, घर में नहीं। मां को ज्योतिष से चिढ़ थी, मैं भी अविश्वास रखती थी, पर दिगंबर मुनि की बात पर अविश्वास नहीं, विश्वास था।

31. बायीं आंख-भुजा फड़कने का मतलब
एक दिन महाराज का केशलोंच होना था, मंदिर के बाहर बड़ा पण्डाल बना था। महाराज केशलोंच कर रहे थे, हजारों जैन-जैनेत्तर देख रहे थे। लोग कहते कैसी निर्मम साधु चर्या, घास की तरह सिर-दाढ़ी-मूंछ के बाल उखाड़ रहे हैं।मैं सोच रही थी – मेरे जीवन में ऐसा दिन कब आएगा? बस इसी के साथ मेरी बायीं आंख और बायीं भुजा फड़कने लगी, मेरे में आनंद की लहर दौड़ गई। आज भी केशलोंच के समय वो दृश्य सामने आ जाता है।

32. पहली बार मस्तक पर पिच्छी का आनंद
आचार्य श्री देशभूषण जी का टिकैत नगर से त्रिलोकपुर की ओर विहार होना था, घर में सबने निर्णय निया कि आज रात्रि में आरती, भजन में मैना को घर से बाहर नहीं भेजना। कड़ी पहरेदारी, मैं घर में महामंत्र का जाप करती रही। रात 10.30 बजे सब अपने-अपने घर चले गये, फिर मैंने मां की आज्ञा ले, अकेली चली दर्शन करने। कुछ श्रावक महाराज जी के साथ सोते थे, उन्होंने दर्शन करा दिये। उन्होंने मेरे मस्तक पर पिच्छी रखकर आशीर्वाद दिया और मौन से धैर्य रखने का संकेत दिया।

33. मन ही मन स्त्री पर्याय की घोर निंदा
आचार्य श्री का विहार होने लगा तो मैं गांव के बाहर आकर, महाराज के साथ जाने लगी। चाचा-ताऊ जोर-जोर से वापस चलने की बात कहने लगे। हल्ले-गुल्ले के विषम वातावरण को देख महाराज आगे बढ़ गये। तब मैं आगे बढ़कर भागने को तैयार हुई, तभी मेरे ताऊ ने आगे बढ़कर मेरा हाथ पकड़ लिया और जबर्दस्ती पकड़कर घर ले आये। सारे दिन रोती रही, खाना-पीना कुछ नहीं लिया, बस थोड़ा-सा दूध पीया। तब सोच रही थी, यदि मैं पुरुष होती तो किसी भी मुनि से दीक्षा ले लेती।

34. मंत्रित जल की शक्ति
एक दिन मां के पेट में जोरों का दर्द उठा, वे तड़फने लगी। दादी ने पड़ोस से धाय को बुलाया, दरवाजे पर परदा। मैंने शुद्ध वस्त्र पहन एक कटोरी में शुद्ध छना जल लेकर एकांत में जिनवाणी लेकर बैठ गई और चौकी पर कटोरी रखकर ‘सहस्त्रनाम’ का पाठ करने लगी। उधर दादी कह रही थी आज बच्चा होने के लक्षण नहीं दिख रहे। रात ऐसे ही निकालनी पड़ेगी। इतने में मैंने मां को वह जल पिलाया। कुछ ही देर में दादी बोली – मैना, जल्दी से थाली बजाओ, तुम्हारी एक बहन आ गई है। सहस्त्रनाम पढ़कर पिलाया जल। तब से मान लिया सबने कि स्तोत्र से मंत्रित जल में बहुत बड़ी शक्ति होती है।

35.घर से अंतिम प्रस्थान
मैं छोटी थी और भाई कैलाश भी 5-7 वर्ष का छोटा ही था। उसे साथ चलने को कहा अगली सुबह। मैं रात भर महामंत्र स्मरण करती रही। रवीन्द्र मुझे पकड़ कर सो रहा था, धीरे-धीरे उसे अलग किया और खटिया से नीचे उतर आई। ब्रह्ममुहुर्त के 4 बजे सामायिक, स्नान से निवृत होकर मंदिर के दर्शन किये। प्रार्थना की – हे तीन लोक के नाथ, मुझे भी संकटों से, उपसर्गों को सहन करने की शक्ति दो, मनोरथ सफल करो। मां की आज्ञा लेकर बाहर निकली कि मां बोली- बिटिया मैना, आज ही वापस आ जाना। खाली हाथ कैलाश के साथ चल दी बाराबंकी की ओर।

36. किसी को देख अपने अच्छे कार्य मत रोको
मुझे भगवान की पूजा करने का बहुत ही प्रेम था, तब महिलायें मंदिर में पालथी नहीं, पैर पसार कर बैठती और जाप कर चली जाती। मैं अपने हाथ से सामग्री धोकर, चौकी पर रखकर, सुखासन में बैठकर पूजा करती, फिर मां ने भी और बाद में कुछ महिलाओं ने भी पूजा शुरू कर दी । वहां यही चर्चा होती – ‘छोटी-सी ये बहुत धर्मात्मा बन रही है, अब तो पुजारिन बन रही है।’ मैं उनके हंसने की परवाह नहीं करती, फिर पूजा कर स्वाध्याय भी शुरू कर दिया। कुछ महिलायें कहती ‘ अरे ये तो पंडिता बन रही है…’ उस क्रम के बाद आज उस गांव के सभी घर की सभी महिलायें-पुरुष शुद्ध वस्त्र से पूजा पाठ करते हैं।

37. दीक्षा की दृढ़ता में केशलोंच
आश्विन शुक्ल चौदस का दिन था। आचार्य श्री देशभूषण जी का केशलोंच था। मैं बाराबंकी में ही थी। आसपास से बहुत लोग आये थे। माता-पिता – भाई भी आये। मैंने पिता से कहा – चलो, आचार्य श्री के पास मुझे दीक्षा दिला दो। सब मुझे महाराज के पास ले गये, मैंने कहा – ‘मुझे आप संसार समुद्र पार करने वाली दीक्षा प्रदान कीजिए।’ आचार्य श्री ने कहा – तुम्हें अभी तक अष्टमूल गुण भी नहीं है। गुरु साक्षी में कुछ व्रत नहीं लिये हैं। एकदम दीक्षा कैसे? मैंने जिद की ‘मैं दीक्षा के सब नियम पालन कर लूंगी’। माता-पिता मुझे वापस ले जाने की कोशिश में थे। मैंने तभी आचार्य श्री के सामने, अपने सिर के बालों का केशलोंच शुरू कर दिया। पिताजी पागल से होकर बाहर चले गये। मां की गोद में छोटी मालती थी, वो मूर्छित हो गई। आचार्य श्री मेरे साहस पर आश्चर्य में पड़ गये। हल्ला मच गया – रोको-रोको, इसकी उम्र छोटी है, पुलिस को बुलाओ, कोई कहता केशलोंच रोको। पर कन्या को हाथ कौन लगाये?

38. दृढ़ता के साथ केशलोंच बिना व्रत दीक्षा के
आचार्य श्री इस बीच पंडाल में चले गये और केशलोंच शुरू कर दिया। सारी जनता वहीं चली गई, पर मैंने केशलोंच नहीं रोका। मामा जी ने मेरा हाथ पकड़ मुझे रोक दिया। मैं मंदिर में चली गई। वेदी के सामने नियम ले लिया कि जब तक मुझे व्रत नहीं मिलेंगे, तब तक चतुराहार का त्याग है और घर जाने का भी त्याग है। मैंने इतनी दृढ़ता से नियम लेकर संकल्प लिया – इस उपसर्ग से रक्षा होने तक मैं यहां से नहीं ऊठूंगी। ’ फिर रात्रि 9-10 बजे मां ने आश्वासन दिया और जहां ठहरी थी, वहां ले आई। रात भर मेरी मां से वैराग्य पर चर्चा होती रही।

39. मां की अनुमति से ही मिलेंगे व्रत
केशलोंच के दौरान मेरा दो ढाई साल का भाई रवीन्द्र खड़ा-खड़ा रोता रहा – जीजी घर चलो, घर चलो। मां मुझे समझाती- आचार्य श्री ने कह दिया है कि मैं इस मैना को कोई व्रत नहीं दे सकता। मैंने कहा – मां यदि तुम मेरी सच्ची माता हो तो मेरा एक काम कर दो, मैं तुम्हारा उपकार जिंदगी भर नहीं भूलूंगी, बस आचार्य श्री को मुझे व्रत देने की आज्ञा दे दो। मां कांप गई, पिता इस कठोरता को सहन नहीं कर पायेंगे। रात भर चर्चा होती रही थी। मैंने मां के हाथ में कागज, पेंसिल दिया और कहा, मां ने कांपते हाथ से लिखा – आंसू गिर रहे थे – पूज्य महाराजश्री! मेरी पुत्री मैना को, जो भी व्रत चाहती है, आप दे दीजिए। मुझे पूर्ण विश्वास है, वह दृढ़ता से निभायेगी। मां समझ गई थी – मै न घर जाऊंगी, न अन्न-जल ग्रहण करूंगी।

40. 18 साल की उम्र में पुनर्जन्म
मां अपने आंसुओं को पल्लू से पोंछती जा रही थी, महाराज जी पत्र पढ़कर मां को देखते हैं। मां बोली- महाराजश्री इस लड़की की दृढ़ता बचपन से ही बहुत रही है, यह सभी नियमों का पालन करने में समर्थ है, समाज का विरोध व्यर्थ है। कोई मुझे स्वीकृति मिलते देख ना ले, मैं मंदिर में चली गई। महाराज ने मां से कहा – ‘जाओ, तुम इन्हें शीघ्र ही स्नान कराकर, नई साड़ी पहनाकर ले आओ’ मैं महाराज के पास श्रीफल लेकर आई। महाराज ने जीवन भर के लिए ब्रह्मचर्य व्रत और सप्तम प्रतिमा के व्रत दे दिये। वह शरद पूर्णिमा थी, आज ही 18 वर्ष की हुई थी। मां बोल उठी – आज इसका इस आश्विन सुदी पूर्णिमा को पुनर्जन्म हुआ है।

41. आचार्य श्री की सटीक भविष्यवाणी
मेरी क्षुल्लिका दीक्षा के बाद पहला चातुर्मास टिकैत नगर में हुआ। पिताजी आकर आचार्य देशभूषण जी के दर्शन करने आये, तो आचार्य श्री कई बार कहते – ‘लाला छोटेलाल, तुम छोटे नहीं हो, बहुत बड़े हो। तुमने यह अनुपम कन्यारत्न जन्म दिया कि जिससे भारतवर्ष में बहुत प्रभावना होगी।’।