प्राकृत भवन लोकार्पण में क्या हुआ, उससे जरूरी है उसका अतीत, प्राकृत भाषा की सुरक्षा व संरक्षण में पहल का बीजारोपण

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31 मई 2025 / जयेष्ठ शुक्ल पंचमी /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
17 मई 2025, सायं उदयपुर में जैन संस्कृति के अतीत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रखा। अवसर था प्राकृत भवन लोकार्पण का। गरिमामयी उपस्थिति थी प्राकृताचार्य श्री सुनील सागरजी ससंघ और दो दिन पूर्व ही आचार्य कल्प पद पर अलंकृत श्री पुण्य सागरजी ससंघ की। साथ ही राजनीति के मैदान में राजस्थान के गौरव, फिर असम के राज्यपाल और अब पंजाब के राज्यपाल तथा चंडीगढ़ के प्रशासक, गुलाब चंद कटारिया आज उस राजनायिक ऊंचाई की हैसियत के साथ लोकार्पण करने आये जरूर, पर दिगम्बर संतों के मंच पर बैठने की बजाय सामने एक भक्त की तरह बैठे। धन्य हैं, ऐसे राज्यपाल, जितने ऊंचे, उतनी गरिमा।

हां, इस प्राकृत भवन को आकार देने के लिये भारतीय ग्लोबल महासभा के जमनालाल हपावत जी के अथक प्रयास, साथ ही अभी बने दो खण्डों में से एक का निर्माण गुलाब चंद कटारिया के द्वारा सरकारी सहयोग से, वहीं दूसरा भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जम्बू प्रसाद जैन जी के निजी सहयोग से हुआ। उनके साथ चैनल महालक्ष्मी को जाने का सहयोग भी मिला।

प्राकृत भवन लोकार्पण में क्या हुआ, उससे जरूरी है उसका अतीत, प्राकृत भाषा की सुरक्षा व संरक्षण में पहल का बीजारोपण। सन् 2023 के ऋषभ विहार वर्षायोग के दौरान आचार्य श्री सुनील सागरजी से कई बार प्राकृत भाषा, ग्रंथों, पांडुलिपियों के संरक्षण पर चर्चा हुई, गोष्ठी हुई, क्योंकि अगर इन्हें नहीं बचाया गया, तो हमारे अतीत को छोटा करने, उसकी गौरवमयता, विश्व को उसकी देन आदि पर असर पड़ेगा। सौभाग्य मिला 27 सितम्बर 2024 को जब भारतवर्षीय दि. जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के अंतर्गत जैन समाज की पहली मीटिंग राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में अल्पसंख्यक मंत्रालय के मंत्री, अध्यक्ष आदि के सान्निध्य में आयोजित कराने का सौभाग्य चैनल महालक्ष्मी को मिला।

मीटिंग के दो ही उद्देश्य थे –
पहला- जैन तीर्थों की सुरक्षा में आयोग का योगदान, जिसके लिये उन्हें विभिन्न तीर्थों से मिले 12-13 आवेदन सौंपे।
दूसरा – प्राकृत भाषा संरक्षण, जिस पर मंत्रीजी ने वहीं कहा, इस पर पूरा प्रतिवेदन बनाकर प्रधानमंत्री कार्यालय में भेजेंगे।
कुछ भी हो, एक सप्ताह के भीतर प्रधानमंत्री जी द्वारा अन्य के साथ प्राकृत व पाली को भी शास्त्रीय भाषा घोषित किया और अधिकृत गजट जारी हुआ। कहने का उद्देश्य, तीर्थक्षेत्र कमेटी की एक सार्थक भूमिका, जिसे कोई नहीं जानता।

पर हां, उसके बाद आयोग से मिलकर प्रधानमंत्री महोदय को धन्यवाद सभा के भीतर अपनी योजनायें रखी जायें, पर हम एक नहीं हो पाये। शेष सभी ने प्रधानमंत्री धन्यवाद सभायें कीं और हजारों करोड़ के फण्ड, स्थान आदि प्राप्त किये। पाली ने भी। पर सम्पन्न जैन श्रेष्ठियों की यहीं असम्पन्नता है।

इस लोकार्पण समारोह में आचार्य श्री सुनील सागरजी, आचार्य श्री पुण्य सागरजी, जमनालाल हपावत जी सहित अनेक ने विचार रखे। 50 हजार से अधिक प्राकृत पाण्डुलिपियों का संरक्षण, शोध की सुविधा आदि से जैन संस्कृति की पहचान में यह एक महत्वपूर्ण कदम रहेगा।