अदृश्य शक्ति खींच रही वंदनीय कंठकोकिला को दिल्ली की ओर

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24 जून 2025 / आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
यह कौन है, कौन-सी अदृश्य शक्ति, जो दिल वालों की बस्ती की ओर खींच रही, गुरुवर सभी के वंदनीय आचार्य श्री विद्यासागरजी की सबसे लोकप्रिय सुशिष्या आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी को। जी हां, सबको अपने प्रवचन कर्णप्रिय सुर संगम भजनों, से सबको अपनी ओर खींचने वाली आर्यिका श्री अपने 37 वर्ष के दीक्षा जीवन में पहली बार दिल्ली की ओर बढ़ी, तो दिल्ली जैसे पावन हो गई। सूर्य शक्ति और ऋषभ भक्ति के बीच उन्होंने 37वें चातुर्मास के लिये सूर्य नगर को चुना। दिल्ली के बार्डर की वह नगरी धन्य हो गई। पर दिल्ली की धरा में ऐसी कोई शक्ति छिपी है, जो 3 भाइयों में छोटी वीणा जी के नाम से अक्षय तृतीया के पावन दिन जन्मी, 21वें सावन के साथ आहारजी तीर्थ पर दस प्रतिमा व्रत को ग्रहण करने के बाद, दमोह के कुंडलपुर तीर्थ पर 1989 की श्रावण शुक्ल षष्ठी, जी हां, पारस प्रभु के मोक्ष कल्याणक से ठीक एक दिन पहले, लौकिक मार्ग से परलौकिक मार्ग की दिशा में बढ़ गई और इस उत्तम मार्ग पर बढ़ने के लिये उनके सौभाग्य के द्वार खोले गुरुवर आचार्य श्री ने।

दिल्ली उनका कब से इंतजार करती आ रही है, उनको अपनी पलकों पर बैठाने के लिये और जैसे उस नैय्या की पतवार सौंप दी लाल मंदिर और ऋषभ विहार के पास, कि आप में से कोई भी करा लें माताजी का चातुर्मास, पर भाग्य से ज्यादा नहीं मिलता। प्यासी ही रही गई दिल्ली, लाटरी खुल गई सूर्यनगर की।

वर्तमान से थोड़ा अतीत का पहिया घुमाते हैं, तो माताश्री की सीधी आर्यिका दीक्षा 07 अगस्त 1989 को हुई। आपके गृहस्थ जीवन के पिता समाधिस्थ मुनि श्री हेमन्त सागर जी थे। आपके सान्निध्य में अनेक विधान, पूजन, भजन, स्तुति आदि की रचना की गई है, अनेक कृतियों का सृजन किया है, जिसमें डूबने के लिये प्यासी दिल्ली एनसीआर तरस रहा है। पर हां, अब उस बात पर आते हैं, जहां से शुरू की थी। क्या कोई अदृश्य शक्ति दिल्ली की ओर माताजी को खींच रही है। वैसे उस शक्ति ने तो ग्वालियर में ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी।
अब माता जी दिल्ली से दूर नहीं, दिल्ली के पास ही हैं, पलकें बिछा रही हैं दिल्ली और यूपी, एक साथ। पर उस अदृश्य शक्ति ने एक अलग ही ज्योत जला दी है दिल्ली व सूर्य नगर के लिये ही नहीं, पूरे सकल समाज के लिये।

पूर्वी दिल्ली की नाक कहलाने वाले ऋषभ विहार के लिये सौभाग्य के द्वार भी खुले हैं, माता जी का प्रवेश वर्षायोग के लिये वहीं से होगा, साथ ही गुरु की पूर्णिमा, उनके चरण वंदन का सौभाग्य, साथ ही वर्तमान जिनशासन नायक की दिव्यध्वनि खिरने वाले पावन दिन को मनाने का भी डबल सौभाग्य भी ऋषभ विहार को मिला। फिर उनको वर्षायोग धरा पर पहुंचाने में अपनी पलकें बिछा देंगे। पर उस अदृश्य शक्ति ने अपना अनोखा खेल खेला। 12 जुलाई को दिल्ली से यूपी में सूर्यनगर के चातुर्मास हेतु विहार, पर वर्षायोग की स्थापना दिल्ली के ऋषभ विहार के पास यमुना स्पोर्ट्स क्लब में ही होगी। यह अद्भुत संयोग है और वो भी इसी आशा के साथ कि दिल्ली के बॉर्डर सूर्य नगर में चल रहे चातुर्मास के कुछ अनमोल पल, ऋषभ विहार के माध्यम से दिल्ली ही नहीं, पश्चिमी यूपी को भी मिल जाये। एक ऐसा दुर्लभ संयोग जो सूर्य को ऋषभ से जोड़कर एक अलग ही रोशन इतिहास का पन्ना बनेगा, बस यही भावना हम सब भाते हैं। कुछ तो यह भी कहते हैं कि जिस राज्य में वर्षायोग की स्थापना की जाती है, चातुर्मास वहीं का होता है, तो फिर क्या वो अदृश्य शक्ति इसे दिल्ली वालों का कहना चाहती है?

वंदनीय माताजी के शब्दों में – ‘अपने मन को कहां सुरक्षित रखना है? जहां मन में संक्लेश न हो, शुभ परिणाम ही हो। जब मन को मंदिर कहने का मन हो जाये, तो मन भी सुरक्षित हो जायेगा। जो आज गुरुओं के विहार में चल रहे हैं, समझ लेना, कल वो तीर्थंकरों के विहार में चलेंगे, इसी तरह जो आज गुरुओं की सभा में होंगे, निश्चित ही वो आगे समोशरण में बैठे होंगे।’ बस इसी को मन में धारण करें, उनके साथ विहार में चलें और उनके प्रवचनों को अपने भीतर उतारकर अपना जीवन सही मार्ग पर बढ़ायें।