NCERT की पाठ्य पुस्तकों से जैन इतिहास की सफाई ॰ यूपी के एक लाख प्राइमरी स्कूलों की किताबों में बदलाव

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23 जनवरी 2026 / माघ शुक्ल पंचमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
॰ ऐतिहासिक मूडबद्री जिनालय का स्थान लेगा, अब श्रीराम मंदिर

उत्तर प्रदेश के एक लाख प्राइमरी स्कूलों से अब जैन संस्कृति की पहचान को अगले शैक्षणिक वर्ष 2026-27 से मिटा दिया जाएगा। यह पहल हुई कक्षा 4 के गणित मेला पुस्तक से। इस पुस्तक के पेज 39 पर ‘1000’ की संख्या पहचान में मूडबद्री के हजार खम्बों वाले मंदिर की जानकारी दी गई थी, अब उसे अयोध्या के श्रीराम मंदिर से बदल दिया जाएगा।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ, जब अल्पसंख्यक जैन समाज के इतिहास को दूर किया गया। जहां एक तरफ नये पाठ्यक्रम के लिये आचार्य श्री विद्या सागरजी के गुरुकुल शिक्षा के सुझावों का स्वागत प्रधानमंत्री द्वारा भी माना गया तथा शिक्षक कमेटी एक बार उनसे बहुमूल्य निर्देश लेने भी गई, पर अफसोस यह है कि सिलेबस मेटेरियल कमेटी तथा टेक्स्ट बुक डेवलेपमेंट कमेटी, दोनों में ही किसी जैन को शामिल नहीं किया गया और जैन के अलावा सभी धर्मों की उपस्थिति इन कमेटियों में है। आज सबसे ज्यादा शिक्षित समाज पर इसमें बड़ा सरकारी प्रहार शिक्षा के क्षेत्र में हो नहीं सकता। जहां आचार्य श्री की प्रेरणा से शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में बदलाव की शुरूआत की गई और उसकी दोनों NCERT की कमेटियों से जैनों को साफ ही नहीं किया, बल्कि जैनों के इतिहास को भी मानो, धीरे-धीरे खत्म करना शुरू कर दिया।

यही नहीं, संसद भवन में भी जैनों के इतिहास को मात्र 2650 वर्ष प्राचीन लिखा गया है। आज देश की दो प्रमुख सनातनी परम्पराओं में से एक को छोटा कर, अपने को बड़ा दिखाने का यह एक गलत कदम है।
चौथी कक्षा की ‘गणित मेला’ पुस्तक में ‘हमारे आसपास हजारों की संख्या में’ विश्व प्रसिद्ध प्राचीन मूडबद्री जिनालय का उल्लेख रहा है, उसमें हजार खंबों वाला मंदिर व उसकी जानकारी दी है, पर अब उसे नवनिर्मित अयोध्या के श्रीराम मंदिर से बदला जा रहा है। यानि अगले शैक्षणिक वर्ष में अब जैनों का इतिहास भी बच्चों की पाठ्य पुस्तकों से खत्म हो जाएगा।

इस बारे में पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3587 में देख सकते हैं।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन : जिस तरह से वर्ष दर वर्ष अल्पसंख्यक जैन समाज के इतिहास, संस्कृति, समाज पर, एक प्रकार से अलग तरह से हमले, कब्जे, उत्पीड़न और अब ऐतिहासिक सामग्री हटाने की कोशिशें हो रही हैं, वह चिंताजनक है। श्री राम मंदिर को साथ ही जोड़ना, बेहतर रहता, न कि उसके लिये प्राचीन ऐतिहासिक जिनालय की जानकारी को हटाना। अफसोस तो यह भी है कि जैनों में कोई साधु-संत, श्रेष्ठी वर्ग, इस पर कोई आवाज नहीं देता। न ही शैक्षणिक कमेटियों में कम से कम एक जैन को शामिल करने की मांग भी कोई नहीं करता। केवल नये मंदिर व मूर्तियां स्थापित करने से क्या जैन संस्कृति बच पायेगी, शायद नहीं। क्योंकि अगर ऐसे ही चलता रहा, तो 50-100 साल बाद न जैन इतिहास बचेगा, न ही जैन संस्कृति।