॰ 26 सालों में गणिनी आर्यिकायें 6 गुणा, क्षुल्लिकायें पांच गुणा, आचार्य ढाई गुणा, मुनिराज, ऐलक, आर्यिकायें दो गुणा हुर्इं
॰ निर्यापक श्रमण की शुरुआत 2022 व प्रवर्तक, गणधर, स्थावर मुनि 2023 से
॰ मुनिराजों से ज्यादा आर्यिकायें, क्षुल्लकों से ज्यादा क्षुल्लिकायें बढ़ी
॰ 24 हजार से दिगंबर संत रह गये 1852, वहीं शून्य से बढ़कर श्वेताम्बर संत हो गये 22 हजार के पार
॰ गत वर्ष के दौरान दीक्षायें बढ़ीं, समाधिमरण कम
06 सितम्बर 2025 / भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
वर्तमान में अनुमानित संख्या :
आचार्य -112
उपाध्याय-26
मुनि-553
गणिनी आर्यिकायें-55
आर्यिकायें -632
ऐलक -48
क्षुल्लक -191
क्षुल्लिकायें -233
कुल 1852

दिगंबर संत बढ़ रहे, जैन घट रहे
प्रश्न उठता है कि दिगंबर संतों की गत जनगणना वर्ष 2011 से, 50 फीसदी बढ़ी, तो क्या जैनों की संख्या में भी 50 फीसदी वृद्धि हुई। सरकार जनगण्ना में जैन 44,51,753 थे, जबकि हम दावा कर रहे 2 करोड़ के लगभग का। अगर प्रत्येक पति-पत्नी के जोड़े से बच्चों की दर 1.13 मानी जाये, तो यह बहुत बड़ी गिरावट का संकेत है, यानि दो से 1.13 बच्चों का औसतन जन्म। अगर ऐसी ही यह दर रही, तो सौ सवा सौ साल में यह गिनती लाखों से सिमटकर हजारों में आ जाएगी। पारसी की तरह जैन भी लुप्त होने के कगार पर हैं। इस पर चर्चा करने से पहले 26 सालों में दिगंबर संतों की गणना पर कुछ प्रकाश डालती हैं चैनल महालक्ष्मी:
गत वर्ष की संख्या 1855 से 1852 रह गये संत, कारण?
1999 में 50 आचार्य और 26 सालों बाद 112 आचार्य, जिनमें शामिल है इस वर्ष बने दो पट्टाचार्य भी। वैसे गत वर्ष की तरह इस बार भी आचार्यों की संख्या 100 रही।
गत परीयिड में जहां आचार्य श्री नेमीसागर जी (2-11-2024) की समाधि हुई, वहीं मुनि चन्द्रगुप्त जी, मुनि यशगुप्त जी, मुनि पुण्य सागर व मुनि कीर्ति सागर को आचार्य पद प्रदान किया गया। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी पट्टाचार्य बने।

आज से 112 वर्ष पहले भी कई दिगंबर संत थे, पर उनका विहार कपड़े के घेरे में होता था। आज की तरह सार्वजनिक रूप से दिगंबर रुप में नहीं। तब 3 संतों ने यह दिगंबरत्व की परम्परा शुरु की। सबसे पहले आदिसागर अंकलीकर ने 1913 में, फिर शांतिसागर (दक्षिण) ने 1920 में मुनि दीक्षा ली, तथा क्रमश: 1915 व 1924 में आचार्य बनें। इसी क्रम में शांतिसागर जी क्षाणी तीसरे आचार्य थे। आज चल रही ये इन तीनों परम्पराओं में क्षाणी परम्परा में आज 25 संत भी नहीं हैं, वहीं शेष दोनों परम्पराओं में 900-900 के लगभग संत हैं। जहां अंकलीकर परम्परा में आचार्य श्री सुनील सागरजी चतुर्थ पट्टाचार्य (क्रम में महावीर कीर्ति जी, विमल सागर जी, सन्मति सागर जी) हैं, वहीं शेष दो में क्रम सप्तम पट्टाचार्य तक है। 2016 में पहली बार 100 से ज्यादा आचार्य थे, फिर दो साल 18 व 19 में गिनती कम हो गई। अब तक अधिकतम 117 आचार्य 2 वर्ष पूर्व 2023 में थे। सबसे ज्यादा 12 आचार्यों की संख्या 2016 में बढ़ी। वहीं 2011 में 11 तथा 2023 में 10 आचार्य बढ़े।
चार साल पहले निर्यापक श्रमण की शुरुआत
मुख्य रूप से आचार्य श्री विद्यासागर जी ने निर्यापक श्रमण की शुरुआत की, जो 2022 में 13 रही। फिर दो वर्ष एक कम रहकर, अब फिर 13 है।
घटती-बढ़ती दिगंबर संतों की संख्या
पिछले 26 वर्षों में 790 से अब 1853 दिगंबर संत यानि ढाई गुना बढ़े। उपाध्याय संख्या 22 से 26 लगभग वही रही इस दौरान। मुनिराज लगभग दोगुने 266 से 553 हुये, गणिनी आर्यिकायें 6 गुणा से ज्यादा, 9 से 55 हो गई, वहीं आर्यिकायें 309 से 632 लगभग दो गुनी संख्या हुई। वहीं ऐलक दो गुणा, क्षुल्लक ढाई गुणा, क्षुल्लिकायें पांच गुणा बढ़ीं।
उपाध्याय पद- वही 22 से 25
जहां 1999 में उपाध्याय 22 थे, जो 2012 में अधिकतम 33 पहुंचे, अब फिर 25 ही हैं। 2021 में यह संख्या मात्र 7 रह गई थी, जहां 2022 में निर्यापक श्रमण एक साथ बने, इसी तरह 2023 में पथरिया पंचकल्याणक में उपाध्याय ज्यादा बने।

मुनिराजों-आर्यिकाओं में बढ़ता अंतर व क्षुल्लिकायें निकली क्षुल्लकों से आगे
अगर 1999 का आंकड़ा देखें, तो 266 मुनिराजों के समय 309 आर्यिकायें थीं, लगभग बराबर। 2007 में यह अंतर घटकर मात्र 24 का रह गया पर फिर अंतर बढ़ता गया। जहां मुनिराजों ने 500 का आंकड़ा 2023 में छुआ, वहीं आर्यिकायें दस वर्ष पूर्व ही 500 के पार थी। आज दोनों के बीच 81 का अंतर है। वहीं 1999 में क्षुल्लक 79, क्षुल्लिकाओं 45 से लगभग डेढ़ गुणा थे, 2011 में क्रमश 161-107 थे, पर वह अंतर कम होते -होते क्षुल्लिकायें, अब 233 व क्षुल्लक गत वर्ष के 230 से 39 कम रहकर 191 ही रह गये।

श्वेताम्बर संतों से दस फीसदी हैं दिगंबर संत
दिगंबर संतों की संख्या जहां आज 1852 है, वहीं श्वेताम्बर संत 22 हजार से भी ज्यादा हैं, जबकि दिगंबर संत पहले से हैं। आचार्य भद्रबाहु के समय 12 वर्ष के आकाल के समय भी 24 हजार दिगंबर संत थे। फिर वहीं से, जो उत्तर भारत में रह गये, उन्हें परिस्थितिवश वस्त्रों को अंगीकार करना पड़ा। दिगंबर संतों की कठिन तपस्या, बढ़ते परिषह को देखते, श्वेताम्बर मार्ग ज्यादा सरल लगा और जिस कारण उनकी गिनती में तेजी से वृद्धि होती जा रही है। जहां दिगंबर संत एक बार में 10 से 15 ही कभी-कभार बने वहां, 50 से 60 भी, एक साथ बनते हैं।
गत दो वर्षों में दीक्षायें (139/159) समाधि (70/47) नये पद (8/13)
पिछले दो वर्षों 2024 व 2025 के आंकड़ों को देखें, तो 2024 में जहां दीक्षायें 139 हुर्इं, इस वर्ष 159, जथा गत वर्ष समाधि 70 हुई, इस वर्ष 47 हुई। पिछले वर्ष 8 से बढ़कर इस बार 13 नये पद दिये गये। जुलाई 24 में 23, अगस्त में 14, सितम्बर में 7, अक्टूबर में 30, नवम्बर में 17, दिसम्बर में 2, जनवरी में 9, फरवरी में 1, मार्च में 29, अप्रैल में 18, मई में 20, जुलाई 25 में दो दीक्षायें दी गर्इं।
इस वर्ष नये पद में 4 आचार्य, 3 उपाध्याय, 1 वर्णी, 2 गणिनी आर्यिका, एक-एक पट्टाचार्य, पाठक मुनि व आचार्य कल्प पद प्रदान किये गये।
दावे कितने भी कर लें, अगर दो से 1.13 की वृद्धि दर होगी, तो निश्चित गिरावट होगी। चैनल महालक्ष्मी का मानना है कि पिछली बार जैनों ने जनगणना में गंभीरता नहीं दिखाई, तभी लगभग डेढ़-दो करोड़ वाले, 45 लाख से भी कम पर सिमट गये। इस बार यह गलती न हो, इसके लिये व्यापक जनजागरण अभियान चलाना होगा। बिना सही गिनती, न सरकार का ध्यान पड़ेगा, न उसी अनुपात में सुविधायें मिलेगी।
बढ़ती उम्र में विवाह, लड़कियों को ऊंची शिक्षा, रोजगार में बढ़ता रुझान, जैन बुद्धि का विदेशों में पलायन, लड़कियों का अन्य सम्प्रदाय में गठबंधन, जैन लड़कों की बजाय अन्य में पसंद, पैर जमाने के चक्कर में बढ़ती उम्र, ऊंचे घराने में विवाह के चक्कर में इंतजार, ऐसे अनेक कारण हैं, जो जनसंख्या में आज दीवार बन गये हैं, अगर इस गिनती को हम दो, हमारे एक से पहले हम दो, हमारे कम से कम दो, फिर तीन तक नहीं लाया गया, तो आने वाले दशकों में स्थिति भयावह होकर लुप्त हाने की ओर बढ़ती जायेगी।















