यह प्रतिमा तीर्थंकर के समवसरण में विराजमान होने की धोतक है, क्यूंकि समवसरण में विराजमान भगवान को दसों दिशाओं से देखा जाता है तो भी भगवान की मुखाकृति स्पष्ट दिखती है ।इस तरह की कलाकृति की प्रतिमाऐं अब नही बनती है।
क्या जैन धर्म के होने वाले हैं दो नए भेद ?…....
28 अप्रैल 2026 /बैसाख शुक्ल त्रयोदशी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ प्रो अनेकांत कुमार जैन,नई दिल्ली
दुनिया में प्रायः धर्म, दर्शन और अध्यात्म इन...



















