07 नवंबर 2026 / कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
जहां ज्ञान के प्रकाश से जगमगाया इतिहास सारा,
वह वीर निर्वाण संवत है, भारत का ध्रुवतारा
भारतीय संस्कृति की प्राचीन धरोहर में कालगणना का एक अनूठा और गौरवशाली इतिहास रहा है। दुनिया भर में कई संवत और पंचांग प्रचालित हैं, परंतु जब भारत के सबसे प्राचीन और आकाट्य प्रमाण वाले नववर्ष की बात आती है, तब ‘वीर निर्वाण संवत ’ का नाम सबसे शीर्ष पर आता है। यह केवल एक काल मापन प्रणाली नहीं, बल्कि हमारे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वैभव का जीवंत प्रतीक है।
इधर महावीर स्वामी को मोक्ष, उधर नववर्ष का श्री गणेश
निर्वाण दिवस की संध्या जब दीपों से सज जाती है,
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तब नववर्ष सुबह बन आती है।

ईसा से ठीक 527 वर्ष पूर्व, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन की वह प्रत्यूष बेला जब स्वाति नक्षत्र के साक्षी में महावीर स्वामी जी ने पावापुरी से निर्वाण प्राप्त किया, तब सम्पूर्ण ब्रह्मांड ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो उठा। इसी पावन प्रसंग की स्मृति में दीपोत्सव मनाया जाता है, जो इस वर्ष 09 नवम्बर को है।
सान्ध्य महालक्ष्मी इस महान घटना का सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ इससे अगले दिन को मानती है – वह है कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, यानि चांद के बढ़ने के साथ नये वर्ष की शुरुआत, जिसे ‘ॠील्ल े’ की भाषा में ‘हैप्पी न्यू ईयर’ कहते हैं। जैन आगम ‘कल्पसूत्र’ (सूत्र 116) के अनुसार मोक्ष कल्याणक के ठीक अगले दिन से भारत के सबसे प्राचीन नववर्ष ‘वीर निर्वाण’ संवत का शुभारम्भ हुआ।
सबसे प्राचीन संवत – वीर निर्वाण संवत
विक्रम, शक, ईसवीं से भी, इतिहास हमारा पुराना है,
वीर निर्वाण संवत ही भारत का आदि खजाना है।
सान्ध्य महालक्ष्मी आज विभिन्न प्रचलित संवतों और उनकी आयु का तुलनात्मक अध्ययन स्पष्ट करना चाहती है कि वीर निर्वाण संवत अन्य सभी प्रमुख संवतों से कितने वर्ष पूर्व प्रारंभ हो चुका था-
॰ वीर निर्वाण संवत : ईसा से 527 वर्ष पूर्व प्रारंभ (वर्तमान में 2553 वर्ष प्राचीन)
॰ विक्रम संवत : ईसा से 57 वर्ष पूर्व (वीर निर्वाण संवत से लगभग 470 वर्ष पश्चात्)
॰ शक संवत : ईसा से 78 वर्ष पश्चात् शुरू हुआ (वीर निर्वाण संवत के लगभग 605 वर्ष बाद)
॰ ईसवी सन : जार्जियन कलेण्डर :- ईसा मसीह के जन्म से प्रारंभ
॰ हिजरी संवत : हजरत मौहम्मद साहब के मक्का से मर्दाना हजरत (622 ई.) से प्रारंभ।
अब तो आप भी सान्ध्य महालक्ष्मी की बात मानेंगे कि यह अकाट्य सत्य है कि वीर निर्वाण संवत भारत का ही नहीं, बल्कि सबसे प्राचीन प्रमाणित नववर्षों में से एक है।

एक और प्रमाण: बड़ली का शिलालेख
ऐतिहासिक स्वर्णिम मुहर
अजमेर की माटी में जो इतिहास का पन्ना गाड़ दिया
‘चौरासी’ वीर संवत का शिलालेख, जग को राह दिखा गया।
इस संवत की प्राचीनता केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके ठोस ‘पुरातात्विक साक्ष्य’ भी मौजूद हैं। अजमेर के दक्षिण पूर्व में लगभग 50 किमी की दूरी पर भिनाइका गांव के भिलोट माता के मंदिर में वर्ष 1912 में प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. गौरीशंकर हीराचंद झा ने इस प्राचीन शिलालेख की खोज की थी।
॰ इस शिलालेख पर स्पष्ट रूप से ‘84 वीर संवत’ अंकित है।
॰ यह महावीर स्वामी के निर्वाण के 84वें वर्ष (ईसा से 443 वर्ष पूर्व) का प्रमाणित दस्तावेज है।
॰ प्रख्यात इतिहासकार डॉ. राजबली पाण्डेय ने अपनी पुस्तक ‘इण्डियन पोलियोग्राफी’ में लिखा है कि अशोक के पूर्व के शिलालेखों में तिथि अंकित करने की परम्परा नहीं मिलती, ऐसे में बड़ली का शिलालेख दुनिया के सामने एक अद्भुत अपवाद और सबसे ठोस प्रमाण है।
आओ हम प्राचीन संवत की पावन बेला को अपनाएं,
अपनी सांस्कृतिक जड़ों से हम नया उजाला लाएं।
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाला ‘वीर निर्वाण संवत’ हमारी अचल आस्था, अनुशासन और प्राचीनता का वह सूर्य है, जो आज भी हमें मार्गदर्शन दे रहा है। आइए, इस गौरवशाली नववर्ष के मर्म को समझे और सान्ध्य महालक्ष्मी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर आप सबके साथ गर्व महसूस करता है।



















