दिखावे-प्रदर्शन से विनाश के मुहाने पर खड़ा जैन समाज : आत्ममंथन या अंत?

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22 सितम्बर 2026 / भाद्रपद शुक्ल एकादशी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
सत्य, अहिंसा, संयम की जो कभी बनी पहचान थी, महावीर की उस पावन भूमि पर क्या छाई श्मशान-सी खामोशी थी?

सदियों से जिस जैन समाज ने अपरिग्रह की छत्रछाया में मानवता को करुणा का दीपक थमाया, आज वही समाज वास्तव में भीतर ही भीतर सुलग रहा है। जिस दीपक ने विश्व को शांति की राह दिखाई, क्या उसकी लौ अब संस्कार की आंधी में थरथरा रही है?

दिखावे के बाजार में बिखरती आस्था

मंच सजे हैं वैभव के, पर लुप्त हुई जिनवाणी है
त्याग-तपस्या की धरती पर, फैली राग कहानी है


आज का कड़वा सच यही है कि जैन समाज तड़क-भड़क और विघटन के मुहाने पर खड़ा है।
होड़ अहंकार की – पद की लालसा, नाम की भूख और ‘मैं श्रेष्ठ’के दंभ ने साधु-संतों से लेकर गृहस्थों तक को कटुता के जाल में उलझा दिया है।

आज धर्म या प्रदर्शन – आज करोड़ों के आलीशान पण्डाल और दिखावे का बढ़ता आडम्बर – ऐसा लगता है जैसे साधना के केन्द्र अब आध्यात्मिक स्थल न रहकर, प्रतिष्ठा की सीढ़ियां बन चुकी है।

ह्रास मर्यादा का:-
जिन पवित्र मंचों में करुणा का स्वर गूंजना चाहिए था, वहां से अब विवाद, अपमान और पंथों की कटु वाणी सोशल मीडिया के गलियारों में तैरती है।
आज हम अपनी-अपनी रोटियां सेंकने में इतने व्यस्त हैं कि अपनी मूल संस्कृति, पुरातत्व और परम्परा की नींव भी दरकने लगी है।

जड़ों को काटकर वृक्ष कभी लहराया नहीं करते,
अहंकार के महलों में महावीर स्वामी आया नहीं करते।


क्या अपने कदमों को हम अभी भी संभल नहीं सकते?
राख में तब्दील होने से पहले अभी भी चेतने की गुंजाइश बाकी है। यदि अपना अस्तित्व बचाना है, तो मार्ग बिल्कुल स्पष्ट है।

साधना को प्राथमिकता-
साधु-संतों में पद और वर्चस्व की नहीं, केवल आत्म-साधना की महिमा है।

संस्कारों पर निवेश :
आज दिखावटी आडम्बरों का धन-शिक्षा, स्वस्थ और भावी पीढ़ी के संस्कारों में करो।

समन्वय का मार्ग:
वक्त की मांग है कि संकीर्ण पंथों की दीवारें हटाकर समन्वय और प्रेम की भाषा बोली जाए।
‘उठो, संभालो तपोभूमि को, नव प्रभात का आह्वान करो,
अहंकार की ज्वाला तजकर, जिन शासन का सम्मान करो।’


यदि हम आज भी नहीं जागे, तो आने वाला इतिहास हमें एक जीवंत परम्परा के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास की धूल में खोई एक चेतावनी के रूप में याद रखेगा। समय तेजी से भाग रहा है, बस संभल जाइये।

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