आस्था का सवा सौ साल पुराना पहरा और मौन साधना की अनकही कहानी… भाग- 3
22 जून 2026 / जयेष्ठ शुक्ल अष्टमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/
‘भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी’ के गौरवमयी 125 वर्ष के इतिहास की अनकही गौरव गाथा की परतें खोलते हुए एक-एक करके सान्ध्य महालक्ष्मी आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही है। भाग-2 में आपने पढ़ा कैसे सन् 1906 में बम्बई की सुप्रसिद्ध हीराबाग धर्मशाला का दीवानखाना कमेटी का पहला आधिकारिक कार्यालय बना। सेठ माणिकचंद के देवलोकगमन के बाद कौन बना संकटमोचन। प्रस्तुत है यहां तीसरी भावपूर्ण कड़ी:

जब पूर्वजों के पसीने और खून से लिखी गई सम्मेद शिखरजी की सुरक्षा की अमर कहानी
आज जिस शाश्वत सिद्धभूमि श्री सम्मेद शिखरजी की पावन वंदना हम बहुत सुगमता से, डोली या पैदल मुस्कुराते हुए कर लेते हैं, सवा सौ साल पहले वहाँ का दृश्य ऐसा नहीं था। पर्वतराज का वह मार्ग केवल पथरीला और दुर्गम ही नहीं था, बल्कि पग-पग पर कपट और संकटों से घिरा हुआ था।
1901 का वो संकल्प… और द्वेष की वो ‘काली रात’
यात्रियों के पैरों के छालों और बूढ़े मां-बाप की तकलीफों को देखकर, विक्रम संवत के उस दौर में दिगंबर जैन समाज ने राजा पालनगंज की अनुमति से ‘सीता नाले’ से ‘कुन्थुनाथ स्वामी की टोंक’ तक भक्ति की सीढ़ियाँ गढ़ना शुरू किया।

क्रूर प्रहार: अभी आस्था की लगभग 500 सीढ़ियाँ बनकर तैयार ही हुई थीं कि ईर्ष्या और द्वेष की एक ‘काली रात’ आई। अधर्मियों ने रातों-रात उन पावन सीढ़ियों को तोड़कर खंडित कर दिया।
अदालत में गूँजी सत्य की हुंकार: यह सिर्फ पत्थरों का टूटना नहीं था, जैन समाज की अस्मिता पर सीधा प्रहार था। यहीं से शिखरजी के ऐतिहासिक मुकदमों का सूत्रपात हुआ। मामला देश की सर्वोच्च अदालतों तक पहुँचा। सत्य की जीत हुई और विरोधियों को अपने ही हाथों से वे सीढ़ियाँ दोबारा बनाकर देनी पड़ीं। आज भी वे खंडित सीढ़ियाँ उस भीषण संघर्ष की मूक गवाह बनकर खड़ी हैं।
सात समंदर पार… लंदन की ‘प्रिवी काउंसिल’ तक गूँजा न्याय!
जब पर्वतराज की माटी को अपवित्र करने की कोशिशें बढ़ीं, तो हमारी तीर्थक्षेत्र कमेटी ने अपनी पूरी ताकत दांव पर लगा दी।
पर्वत रक्षा आॅफिस (1916): मुकदमों के इस चक्रव्यूह से निपटने के लिए कमेटी ने विशेष रूप से ‘स. शि. पर्वत रक्षा आॅफिस’ की स्थापना की। इसके कार्यालय कलकत्ता, हजारीबाग, रांची और पटना जैसी राजधानियों में दिन-रात सक्रिय रहे।
वैश्विक न्याय-युद्ध: यह लड़ाई साधारण नहीं थी, हमारे अधिकारों की रक्षा के लिए समाज के प्रतिनिधि सात समंदर पार लंदन की ‘प्रिवी काउंसिल’ की चौखट तक जा पहुँचे। उस दौर में पानी की तरह लाखों रुपये बहे, पर समाज के दानवीरों ने कभी अपने त्याग के हाथ पीछे नहीं खींचे।

वो युगपुरुष… जिन्होंने तीर्थों की भक्ति में अपने घर-बार बिसरा दिए!
तीर्थों के प्रति अनुराग ऐसा था कि सुख-सुविधाओं के महलों में रहने वाले श्रेष्ठी वर्ग ने फकीरों जैसी तपस्या की:
महीनों का वनवास: सहारनपुर के लाला जम्बू प्रसाद जैन और फिरोजपुर के लाला देवीसहाय जी जैसे महामना मुकदमों की पैरवी के लिए अपने परिवार को छोड़ हजारीबाग और पटना की तंग गलियों में महीनों डेरा डाले रहे।
लक्ष्मी का सार्थक विसर्जन:
उस जमाने में, जब चंद रुपयों में जिंदगी सवर जाती थी, इन महापुरुषों ने 50,000 – 50,000 रुपये जैसी विशाल और ऐतिहासिक राशियां तीर्थ-रक्षा के महायज्ञ में सहर्ष होम कर दीं।
कलम के अमर सिपाही: बैरिस्टर बाबू चंपतराय जी और एडवोकेट बाबू अजितप्रसाद जी जैसे प्रकांड विद्वानों ने रातों की नींद और दिन का चैन भूलकर, बिना किसी स्वार्थ के इन जटिल मुकदमों की पैरवी की।
चौमुखी सुधार की एक क्रांतिकारी लहर
कमेटी की दिव्य दृष्टि केवल शिखरजी तक सीमित नहीं रही। रामटेक का गौरव हो, पावागढ़ की ऊंचाई हो, श्रवणबेलगोला की पावन धरा हो या शत्रुंजय की माटी—हर तरफ व्यवस्थाओं में सुधार की बयार बही। हिसाब-किताब में आईने जैसी पारदर्शिता लाने के लिए डॉ. भाई शिवलाल शाह जैसे कर्मठ इंस्पेक्टर्स की नियुक्ति हुई और बदइंतजामी के अंधेरे का अंत हुआ।
आज 2026 के इस स्वर्णिम काल में जब हम और आप शिखरजी की पावन टोंकों पर श्रद्धा से सिर झुकाते हैं, तो याद रखिएगा—उस वंदना की हर एक सीढ़ी के नीचे हमारे पूर्वजों का लहू, पसीना, सर्वस्व और अटूट संघर्ष छुपा है।

मथुरा का महाधिवेशन: कृतज्ञता प्रकट करने का आमंत्रण!
आइए, पूर्वजों के इस भगीरथ उपकार के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करने के लिए मथुरा के इस ऐतिहासिक महाधिवेशन के साक्षी बनें और तीर्थ सुरक्षा का संकल्प दोहराएं।
इस श्रृंखला के अगले भाग में पढ़िए: कैसे बदली हमारे पावन तीर्थों की सूरत और क्या हैं भविष्य के स्वर्णिम संकल्प! (जारी)













