लड़े, बंटे और फिर मिटे ॰ घटती शक्ति, अस्तित्व पर संकट ॰ पंथ से संतवाद की कट्टरता करती संसाधनों की बर्बादी ॰ समय की मांग, केवल जैन ही पहचान

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॰ क्रांतिकारी कदम – जैन एकता घोषणा पत्र
॰ जरूरत संसाधनों के एकीकरण, संयुक्त उत्सवों की
24 मार्च 2026 / चैत्र शुक्ल षष्ठी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन

जैन धर्म की नींव ‘परस्परोपग्रहो जीवनाम्’ जीवों पर परस्पर उपकार करना के सिद्धांत पर टिकी है। परंतु वर्तमान परिदृश्य में, यह सनातन, प्राचीन और वैज्ञानिक धर्म ‘पंथवाद’और ‘संतवाद’ की संकीर्ण गलियों में उलझता प्रतीत हो रहा है। दिगंबर और श्वेताम्बर के मूल विभाजन से शुरू हुई यह यात्रा आज अनगिनत उप-सम्प्रदायों, गच्छों और व्यक्तिगत पंथों तक पहुंच गई है। यदि इस बिखराव को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह न केवल जैन समाज की शक्ति को ही क्षीण नहीं करेगा, बल्कि इसके अस्तित्व पर भी संकट खड़ा कर सकता है और हमारा काल ज्यादा लंबा नहीं रहेगा।
दिगंबर-श्वेतांबर का वर्तमान स्वरूप: ऐतिहासिक रूप से, जैन धर्म में पहला बड़ा विभाजन वैचारिक और आचरण संबंधी भिन्नता के कारण हुआ था। जहां दिगंबर परम्परा ने पूर्ण अपरिग्रह और दिग्वस्त्र को प्रधानता दी, वहीं श्वेताम्बर परम्परा ने श्वेत वस्त्र और बदलती परिस्थितियों के साथ कुछ शिथिलता को स्वीकार किया।

पंथ से संतवाद की कट्टरता : वर्तमान समस्या केवल दो मूल सम्प्रदायों की नहीं है। आज तो समस्या और भयंकर ‘संतवाद की है’, जहां अनुयायी महावीर स्वामी की वाणी से अधिक अपने खास, विशेष, विशिष्ट गुरू या संत के प्रति कट्टर हो जाते हैं और वहीं से जैनों की सामूहिक पहचान गौण हो जाती है और फलाना-फलाना पंथी की पहचान प्रखर हो जाती है और यही स्थिति पूरे जैन समाज को राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक रूप से कमजोर बनाती है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य आज सभी के सामने है।

पंथवाद के गंभीर दुष्प्रभाव और शक्ति का विकेन्द्रीयकण: अगली जनगणना में जैनों को प्रभावी बनाने के बारे में अलग से लेख सान्ध्य महालक्ष्मी ने दिया है। पर आज की सरकारी 2011 की जनगणना में जैन मात्र 44,51,753 यानि काफी कम है। जब यह अल्पसंख्यकों में भी अति अल्पसंख्यक। यह अल्पमत समाज जब और आंतरिक गुटों में बंट जाता है, तो सरकार और वैश्विक मंचों पर अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने की क्षमता खो देता है।

उपलब्ध संसाधनों की बर्बादी : शहर एक और वहां पंथ अनेक, और उसी पंथवाद के चलते अलग-अलग जिनालयों, देरासरों, उपाश्रयों का निर्माण हो रहा है, जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सामूहिक निवेश की कमी आज साफ दिख रही है।

युवा पीढ़ी का होता मोह भंग: तार्किक और वैज्ञानिक सोच रखने वाली नई पीढ़ी जब धर्म के नाम पर आपसी विवाद और संकीर्णता देखती है, तो वह धर्म से दूरी बनाने लगती है।

समय की मांग ‘केवल जैन’ पहचान- अभी आचार्य श्री अतिवीर जी ने खुले मंच से कहा था कि आप न श्वेताम्बर कहो, न दिगंबर कहो, कहो तो सिर्फ ‘जैन’ कहो। वैसे भी जैन दर्शन का ‘अनेकांतवाद’ हमें सिखाता है कि एक बात के कई पहलू हो सकते हैं। कोई किसी का बेटा, पिता, ताऊ, चाचा, पोता, भाई, दोस्त आदि कई नाम से पहचाना जाता है, तब इसी सिद्धांत को अपने सम्प्रदायों पर लागू करें, तो हम समझ पायेंगे कि अलग-अलग परम्परायें एक ही शिखर तक पहुंचने के भिन्न-भिन्न रास्ते मात्र हैं।

आज अगर धर्म को बचाने का प्रयास करना है तो निम्नलिखित बिंदुओं पर शोधपरक दृष्टि डालनी होगी:-

जैन समाज के लिए समान नागरिक संहिता : सभी सम्प्रदाओं के बीच सामाजिक और कानूनी मुद्दों पर एक राय होना अनिवार्य है।

सामूहिक मंच: तीर्थक्षेत्रों के संरक्षण और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए ‘केवल जैन’ के बैनर तले एकजुट होना होगा।

सिद्धांत बनाम व्यक्तित्व : हां, हम सबको सभी संतों का सम्मान करना चाहिए, वहां जैसा महावीर स्वामी ने कहा कि धर्म को ‘व्यक्ति-केन्द्रित’ बनाने की बजाय ‘सिद्धांत केन्द्रित’ बनाना होगा।

इतिहास गवाह है कि जो संस्कृतियां स्वयं को समय के साथ एकीकृत नहीं कर पाई, वे इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गई। जैन धर्म की रक्षा का एकमात्र सूत्र ‘एकता’ है। हमें यह समझना होगा, कि हमारी पहचान न किसी संतवाद से, न श्वेताम्बर, न दिगंबर से हैं – हमारी पहचान केवल ‘जैन’ होने से है। महावीर स्वामी का अनेकांत, हमें जोड़ने के लिये है, न कि तोड़ने के लिये।

सबसे आवश्यक क्रांतिकारी कदम : जैन एकता घोषणा पत्र – इसके माध्यम से युवाओं और समाज के प्रबुद्ध वर्ग को जोड़ सके, तो यह बिखराव को रोकने की दिशा में एक आवश्यक ठोस प्रयास होगा।

जैन एकता घोषणा पत्र : एक संकल्प, केवल ‘जैन’ कहलाने का प्रस्तावना : हम सभी, महावीर स्वामी के अनुयायी, यह स्वीकार करते हैं कि वैचारिक भिन्नता ‘अनेकांतवाद’ का सौंदर्य है, लेकिन संगठनात्मक बिखराव हमारी कमजोरी। पंथ, गच्छ और संतवाद की दीवारों को लांघ कर, हम अपनी मौलिक पहचान ‘जैन’ को सर्वोपरि रखने का संकल्प लेते हैं।

वैचारिक समन्वय: अनेकांत का प्रयोग – हम दूसरे पंथों की मान्यताओं का उपहास नहीं करेंगे। सत्य के कई पहलू हैं – इस सिद्धांत को केवल किताबों में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार में उतरेंगे।
साझा ग्रंथ: हम सभी ‘तत्वार्थ सूत्र’, ‘समयसार’ जैसे ग्रंथों को पंथों की सीमाओं से ऊपर उठकर सम्पूर्ण जैन समाज की धरोहर मानेंगे।

॰ व्यवहारिक एकता :
पहचान का गौरव- किसी भी सरकारी दस्तावेज, जनगणना या सार्वजनिक मंच पर हम स्वयं को सम्प्रदाय की बजाय ‘जैन’ के रूप में पहचान प्रस्तुत करेंगे।
तीर्थरक्षा- वर्तमान की आवश्यकता, सम्मेद शिखरजी, गिरनारजी, पालीताणा जैसे पवित्र तीर्थ किसी एक पंथ की सम्पत्ति नहीं, बल्कि समस्त जैनों की आस्था-श्रद्धा के केन्द्र हैं। इनकी सुरक्षा के लिए हमें दलगत राजनीति से उठकर एक स्वर में एक सत्य खड़ा होना होगा।

जरूरत संसाधनों के एकीकरण की-
शिक्षा और चिकित्सा : हम प्रत्येक शहर में पंथ-विशिष्ट मंदिर बनाने की बजाए ‘जैन ग्लोबल हास्पिटल’ या ‘जैन यूनिवर्सिटी’ जैसे संयुक्त प्रोजेक्टस पर ध्यान देंगे और वो सभी के लिए खुले हों।
युवा नेतृत्व : संप्रदायवाद की संकीर्णता से मुक्त एक ‘अखिल भारतीय जैन युवा परिषद’ का गठन करेंगे, जो अत्याधुनिक तकनीक और अपनी पुरातन संस्कृति ज्ञान का संगम हो।

॰ संतवाद से सिद्धांतवाद की ओर :
वंदना गुणों की- हम संतों का सम्मान उनके त्याग और संयम का आधार लेकर करेंगे, न कि उनकी अंधभक्ति दिखाकर समाज में गुटबाजी करेंगे।
समाधान विवादों का – चैनल महालक्ष्मी का मानना है कि पंथों के बीच होने वाले सम्पत्ति या परम्परा के विवादों को कोर्ट-कचहरी की बजाय एक ‘सर्वोच्च जैन न्यायापीठ’ के माध्यम से सुलझायेंगे।

चैनल महालक्ष्मी की विनम्र अपील – 2625वें महावीर स्वामी जन्म कल्याणक पर संकल्प
‘‘मेरा पंथ, मेरी निजी साधना पद्धति हो सकती है, लेकिन मेरा समाज और मेरा धर्म केवल ‘जैन’ ही है।’’

इस पर सफलता कैसे?
डिजीटल हस्ताक्षर: आज तकनीक के जमाने में, पैपरलैस की दुनिया में, एक षोषणा पत्र को एक गूगल फार्म का वेबसाइट के माध्यम से व्यापक स्तर पर फैलाएं, जहां हर जैन ‘केवल जैन’ पहचान का समर्थन करें।
संयुक्त उत्सव – पर्व : जैसा इस बार कई जगह 2625वां महावीर स्वामी जन्म कल्याणक एक साथ मनाये जाने की सूचनायें मिली हैं, उसी तरह सभी पर्वों को अलग-अलग माने की बजाय साझा करें और संयुक्त विशाल शोभायात्रायें निकालकर मनायें।

शिक्षण आधार : आने वाली पीढ़ी – बच्चों को ‘दिगम्बर – श्वेताम्बर’ अंतर सिखाने से पहले ‘जैन धर्म का मूल’ सिखाया जाये।

(चैनल महालक्ष्मी की ओर से छोटे समाज को बढ़ते खण्ड-खण्ड को रोकने की दिशा में एक बहुत छोटा-सा प्रयास है, विचार और सुझावों से ही इस ओर बढ़ने में सहायक होंगे। आप अपनी राय ई-मेल info@channelmahalaxmi.com पर शेयर कर सकते हैं या व्हाट्सप 9910690825 पर)