वही सिद्धक्षेत्र, वही महीना, तब नौ, अब 28 साल बाद 22 मुनि दीक्षायें

0
615

॰ मुक्त होने के लिये मुक्तागिरि
॰ 28 मूलगुणों के लिए 28 साल बाद दीक्षायें
23 फरवरी 2026 / फाल्गुन शुक्ल सप्तमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन

सभी के वंदनीय पूजनीय गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागरजी ने 131 मुनिराज, 172 आर्यिकाओं को दीक्षायें प्रदान की, अब उस परम्परा को आचार्य श्री समयसागरजी ने फाल्गुन कृष्ण, द्वितीया 19 फरवरी को, 22 दीक्षायें देकर उसी को आगे बढ़ाया।

इन क्षणों को देखते हुए 11 फरवरी 1998 के पलों को इस सिद्धक्षेत्र ने फिर ताजा कर दिया, जब निर्यापक श्रमण अभयसागरजी से मुनि चन्द्रसागर तक 9 मुनि दीक्षायें प्रदान की थीं। अब फिर लौकिक शिक्षा से अलौकिक राह पर बढ़ने वालों ने स्पष्ट कर दिया कि लौकिक शिक्षा अधूरी है। दो सीए, 8 साफ्टवेयर इंजीनियर, 1 प्रोफेसर, 1 कंपनी सेक्रेटरी, 2 एमबीए के साथ सभी ग्रेजुएट व पोस्टग्रेजुएट हैं। ये सभी वैराग्य के मार्ग पर बढ़े हैं, घर – नौकरी आदि छोड़कर।

सभी के परिवारजन-रिश्तेदार देश के कोने-कोने से पहुंचे, 40-50 हजार और भी। उ.प्र. के सहारनपुर, फिरोजाबाद, बिहार के पटना, महाराष्ट्र के वर्धा-अमरावती, पंजाब के फिरोजपुर के साथ मध्य प्रदेश के गजबसांैदा, गोटेगांव, दमोह, कटंगी, विदिशा, सतना, भोपाल, जबलपुर, गुना, इन्दौर के साथ चार ने सागर की धरा को रोशन कर दिया।

आचार्य श्री समयसागरजी ने उन सभी साधकों जिन्हें 2022 और 2023 में गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागरजी से क्षुल्लक दीक्षा प्राप्त हुई थी। उन सभी ऐलक जी – क्षुल्लकजी के पूर्व नाम को यथावत रखते हुए उन्हें मुनि पद प्रदान किया। ॰ मुनि श्री उपशमसागरजी ॰ मुनि श्री औचित्य सागरजी ॰ मुनि श्री गहन सागरजी ॰ मुनि श्री कैवल्य सागरजी ॰ मुनि श्री सुदृढ़सागरजी ॰ मुनि श्री समुचित सागरजी ॰ मुनि श्री उचित सागरजी ॰ मुनि श्री अथाहसागरजी ॰ मुनि श्री उत्साह सागरजी ॰ मुनि श्री अमाप सागरजी ॰ मुनि श्री उद्यमसागरजी ॰ मुनि श्री गरिष्ठ सागरजी ॰ मुनि श्री गौरव सागरजी ॰ मुनि श्री विचार सागरजी, मुनिश्री जागृत सागरजी, मुनि श्री आदर सागरजी ॰ मुनि श्री चिद्रपसागरजी ॰ मुनि श्री स्वरूप सागरजी ॰ मुनि श्री सुभगसागरजी ॰ मुनि श्री सविनय सागरजी ॰ मुनि श्री समन्वय सागरजी ॰ मुनि श्री हीरक सागर जी।

मुक्तगिरि, साढ़े तीन करोड़ महामुनिराजों की मोक्ष स्थली, 19 फरवरी को एक बार फिर 1998 की 08 फरवरी की यादें जहन में जागृत कर गई। सभी ने गुरुवर से दीक्षा के भाव प्रकट किये। गृहस्थ जीवन के माता-पिता का आभार प्रकट किया, सभी से क्षमा मांगी और सभी को क्षमा किया। पूरा गगन गुरुवर के जयकारों से गुंजायमान हो रहा था। आचार्य श्री ने गंधोदक, केसर और कपूर मिश्रित उबटन लगाकर केशलोंच विधि के साथ श्रीकार और अंकलेखन किया। एक क्षण जैसे टिक-टिक करती घड़ी की सुर्इंया भी रुक सी गई। वस्त्र रूपी श्रृंगार एक झटके में उतार खड्गासन निर्ग्रंथ वीतरागता का अनुभव कर रहे थे। जयकारे रुक नहीं रहे थे, तभी आचार्य श्री ने उनको खड्गासन से पद्मासन रूप में आने का संकेत दिया। फिर उन्होंने हाथों में सामग्री के रूप में अर्घ्य तथा श्रीफल देकर 28 मूलगणों को आरोपित कर उनके महत्व को समझाया। सभी 22 साधकों ने उस सामग्री को गृहस्थ जीवन की सौभाग्यवती माता-बहनों को प्रदान कर दिये।

जहां सौभाग्यशाली श्रावक बंधुओं ने नियम लेकर नये 22 मुनिराजों को पिच्छी – कमंडल भेंट किये, वहीं गुरुवर ने उनका महत्व समझाते हुए शास्त्रोक्त विधि के अनुसार पांच महाव्रतों के पालन करने का निर्देश दिया।

जहां समाजश्रेष्ठी अशोक पाटनी की मौजूदगी में और प्रतिष्ठाचार्य ब्र. विनय भैया बंडा जी द्वारा विधि विधान से दीक्षा संस्कार में सहयोग प्रदान किया।

पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3632 में देख सकते हैं।