॰ क्षमा की नींव पर सुलह रुपी दीवारों पर बनता है मित्रता का महल
02 सितम्बर 2025 / भाद्रपद शुक्ल दशमी /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
आज आगम से, अपने कर्म बंधन की गहराई से उतरने की बजाय, वर्तमान समय के स्वरूप में ढालकर क्षमावाणी महापर्व का, हर व्यक्ति के जीवन में चाहे वह ‘जैन’ हो या अन्य किसी धर्म में ये शब्द क्षमा, माफी, सॉरी कैसे जरूरी हैं, आज उस पर चैनल महालक्ष्मी थोड़ा प्रकाश डालने का प्रयास कर रहा है। वैसे तीनों शब्दों को सूक्ष्म रूप से काफी अंतर है, पर उतनी गहराई में न जाकर प्रत्येक व्यक्ति के हित में मोटे तौर पर स्वीकार्य हित में ही चर्चा करेंगे।

हम माफी क्यों मांगते हैं?
शुरुआत इसी शब्द से करते हैं, कारण क्षमा को धारण कर, व्यक्त किया जाता है। दसलक्षण के पहले दिन क्रोध के विनाश के लिये धारण, फिर अंत में उस की अभिव्यक्ति, काफी गहराई में उतरने के बाद उसे समझ पाएंगे। पर माफी हर की जुबान पर, साथ में ‘सारी’ भी हम क्यों मांगते हैं? कई लोगों के लिए अपनी गलती स्वीकार करना और अपने अपराध को स्वीकार करने का साहस जुटाना बहुत मुश्किल होता है। किसी प्रेम या पारिवारिक रिश्ते में हुई मामूली गलती से लेकर, कार्यस्थल पर सार्वजनिक रूप से किया गया कोई गलत काम या यहां तक कि कई व्यक्तियों के विरुद्ध समाज, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाला असहनीय और हिंसक संघर्ष वर्तमान में जैन समाज में दिख भी रहा है, राष्ट्रों के बीच भी, माफी मांगने का कारण बन जाता है, ऐसे कई कारण होते हैं, वर्तमान में देखे तो चार मुख्य कारण हैं-
1. आत्मदोष
2. सम्बंधों का मूल्य
3. व्यक्तिगत सुविधा
4. प्रतिबंधों का डर
(इन सब में धर्म को अलग रखा है।)
आखिर गलती क्यों करते हैं
बड़ा अजब सवाल कर रहा है चैनल महालक्ष्मी, गलती भी कोई क्या जानबूझ कर करता है? हां करता भी है, नहीं भी। गलती और भूल में अंतर है, क्षमा दोनों में मांगी जाती है, पर यहां गलती की बात कर रहे हैं। गल्तियां समझ की कमी, गलत शिक्षा, भावनात्मक आवेगों के कारण होती है, क्योंकि हम अपने गुस्से, क्रोध और कुंठाओं को नियंत्रित करना नहीं जानते। दसलक्षण धर्म का पहला लक्षण इसी का आधार है। जब अनियंत्रित भावनाएं कार्य में उतरती हैं, तो वह गलती बन जाती है। यह दिमाग या कहें बुद्धि ही है, जो इन अनियंत्रित भावनाओं को नियंत्रित करती हैं, बुद्धि ही आपके कार्य करने से पहले सोचने पर मजबूर कर देती है। लोग बुद्धि की कमी, खुशी की कमी या अपने भगवान के साथ आंतरिक संबंध के अभाव में गल्तियां करते हैं। जो व्यक्ति आंनदित, संयमित, वात्सल्यपूर्ण, सरल है वह किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। पर यह आज के परिपेक्ष्य में असंभव सा दिखता है। दूसरे को नुकसान पहुंचाते हुए, उसके दिमाग में एक ही बात आती है कि उसके अंदर उसके कारण जो घाव हुआ, वह उसी से भर पायेगा। क्षमा यानि माफी, सॉरी का सर्वोच्च रूप उसमें यही समझना होगा कि दूसरे ने अज्ञानतावश गलती की है और उसके प्रति मुझे करूणा का भाव रखना है। करुणा के भाव से दूसरे को क्षमा करना क्षमा का सर्वोत्तम रूप हैं।

क्या क्षमा करना आसान है?
आइये, इसे पहले व्यापक परिपेक्ष्य में देखते हैं, तो लगता है कि क्षमा करना आसान होता है। जब आप व्यापक दृष्टिकोण से देखते हैं, तो आपको क्षमा करने की आवश्यकता ही नहीं होती, क्षमा तो स्वयं ही हो जाती है, यह धारण की जाती है, क्योंकि वास्तव में आपके हृदय में स्वत: ही करुणा उत्पन्न हो जाती है।
किसी को क्षमा करना, करुणा दर्शाता है और विपरीत, क्षमा मांगना यह दर्शाता है कि आप अपनी गल्तियों को पहचानते हैं और भविष्य में उन्हें न दोहराने का संकल्प लेते हैं। वैसे इसांन गल्तियों का पुतला है, गलती तो करेगा ही, वर्ना भगवान नहीं बन जाएगा। पर जो गलती एक बार हो, वह दोबारा न हो, इसलिये क्षमा मांग ली जाती है।
विभिन्न धार्मिक और ऐतिहासिक संस्मरण हमें संघर्ष पर विजय पाने, उपचार को बढ़ावा देने और एक अधिक न्यायपूर्ण एवं करुणामय समाज के निर्माण में क्षमा की अतुलनीय शक्ति को प्रदर्शित करती है। इसीलिए तो क्षमावाणी मनाते हैं, जैन ही नहीं, दुनिया में कई समाज-संस्कृति क्षमा दिवस मनाती है। यह ऐसा दिन है, जब आप अपने आसपास के लोगों से, जिन्हें आप जानते हैं और उनसे भी, जिन्हें आप नहीं जानते, उनसे क्षमा मांगते हैं। पर आज ऐसा चलन है, क्षमा उनसे मांगते हैं जिनसे गलती की ही नहीं। जिनसे गलती की होती है, उनसे दूरी बनाकर रखते हैं, तभी क्षमा मांगना कठिन है।
मिच्छामि दुक्कड़म् – क्षमावाणी के प्रेरक दो शब्द, जिनका अर्थ काफी गहरा है यानि अपने उन कार्यों या कहे गये शब्दों के लिये क्षमा मांगना, जिनसे किसी को चेतन या अचेतन रूप से ठेस पहुंची हो। प्रधानमंत्री भी संसद में, कार्यक्रमों में कहते रहे हैं।
क्षमा से हो सकती है सुलह-परिवार में, समाज में, राष्ट्रों में
क्षमा द्वारा पुनर्स्थापनात्मक न्याय, संघर्ष में पीड़ित और अपराधी के बीच उपचार और शांति की भावना पैदा करते हैं। अपराध होने के बाद अपराधी या तो विनम्रतापूर्वक आगे आकर, पूरे दिल से क्षमा याचना कर सकते हैं, या अपने कार्यों को उचित ठहराने के लिये कमजोर प्रयासों के माध्यम से क्षमा मांग सकते हैं, याचना कर सकते हैं। सुलह तभी संभव है, जब अपराधी के कृत्य के लिए अंतरंग भावना और पश्चाताप को प्रकट करते हुए, पीड़ित से खुलकर सच्ची क्षमा याचना की जाए। ऊपरी या सतही क्षमायाचना केवल उन घावों पर पट्टी बांधती है, जिन्हें और अधिक उपचार की आवश्यकता होती है। क्षमा में पीड़ित और अपराधी, दोनों को सही दिशा में बढ़ाने और ठीक करने की शक्ति है। शत्रुता को मित्रता में बदलने का दम है। लेकिन तभी, जब ऐसी क्षमा याचना में, जो भीतर गलत काम के दुख और आत्मग्लानि को जगाये। तभी पारिवारिक रिश्ते, समाज और यहां तक कि राष्ट्र भी मेल मिलाप की जटिल प्रक्रिया को अच्छे रूप में शुरू कर सकते हैं।



















