दशलक्षण को धारण करने में जिंदगी गुजार दी, पर जीवन में धर्म नहीं उतारे पाये, पहली सीढ़ी से करें दस धर्मों से आत्मसात

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27 अगस्त 2025 / भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
पर्यूषण – पर्वों का महापर्व या कहें दशलक्षण – धर्म के दस लक्षण उत्तमता के साथ – क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य – वर्तमान में, पंचम काल के 2551 वें वर्ष के लगभग समापन पर क्या कोई पालन कर सकता है? शायद कोई नहीं, जिसमें तीर्थंकर श्री पारसप्रभु जितनी क्षमा की पराकाष्ठा हो, भगवान बाहुबली जैसे मान मर्दन की क्षमता हो, परिणय बंधन में जा रहे, 22वें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ जी की तरह तप-त्याग की उत्तम भावना हो, ऐसा कौन कर सकता है इस पंचम काल में, जब कई बार षष्टम काल जैसे वातावरण का आभास लगता हो, तो शायद कोई नहीं।
पर आज तो साल में तीन बार आने वाले इस महापर्व को मनाने की क्षमता भी एक तिहाई ही रह गई है, क्यों? कारण तीन बार में से केवल एक बार भाद्रपद शुक्ल की पंचमी से चतुर्दशी तक ही मनाने तक ही सीमित रह गये हैं। वो भी क्षमावाणी तक, सब समाप्त। हर साल मनाने की परिपाटी तो चल रही है, जोरों पर। शायद उसे अपनाने की, ग्रहण करने की, अंतरंग में उतारने की बात तो शुरू ही नहीं हो पाती। हम गृहस्थों में बात करते हैं, तो दूर-दूर तक ग्रहण करने का भाव नहीं, कुछ अपवाद छोड़कर।

अब सान्ध्य महालक्ष्मी इसी को ग्रहण करने, अपनाने का एक छोटा – प्रयास करने की पहल करता है, बस आप इन काले अक्षरों को गंभीरता से पढ़कर आत्मसात कर सकें-
सभी धर्मों में उत्तमता को भावों में रखते, नीचे की पहली सीढ़ी से शुरूआत करते हैं:-
1. क्षमा – मोटे रूप में ‘सॉरी’ जो हर की जुबान पर रहता है, पर वो केवल अनजाने में होने वाली भूल के लिये। पर इससे आगे नहीं बढ़ते, दूसरे ने गलती की, उसको क्षमा नहीं कर पाते, कई बार मान-माया-लोभ में स्वयं गलती करें, उसे स्वीकार नहीं कर पाते। बस यही चोट करनी है, बस शुरूआत इसी से करें, गुस्से पर नियंत्रण रख मौन के साथ।

2. मार्दव – नाक और मूंछ ऐसी जो सदा तनी रहती है, ज्यादातर दिखाने के लिये, जहां कोई मतलब नहीं, वहां भी बड़ा दिखाने के लिये, अनावश्यक, बिना जरूरत – ऐसी जगह तो छोड़े, बस यहीं से मार्दव धर्म की पहली सीढ़ी की शुरूआत हो जाएगी।

3. आर्जव – सीधे रास्ते पर भी टेढ़े चलने की आदत बन गई है, चालाकी करना, दूसरे को उल्लू बनाना खुशी देता है। सीधा जीवन भी मुश्किल बना लेते हैं। ऐसे में बस कुटिलता को छोड़ने-रोकने का प्रयास करें। इस धर्म का पालन शुरू हो जाएगा।

4. शौच – ‘लालच’ बुरी बला है। बचपन में सीखा और युवा होते-होते भूल गये। नजर वहां तक, जहां नहीं पहुंच सकती। छलावा करना। जबकि कर्म सिद्धांत है कि एक के दस मिलते हैं, और एक के दस देने भी पड़ते हैं। उल्टा कमाया पैसा, उससे तेज निकलता है। जानते हैं, पर समझते नहीं, इसी को जान लें, तो काम हो जाये, इतना सुधार लें, इससे लाभ ही होगा, लोभ शनै:-शनै: खत्म हो शौच धर्म की शुरूआत हो जाएगी।

5. सत्य – मोबाइल से बिना वजह झूठ बोलना बच्चे-बच्चे को सिखा दिया है। कई बार मजे के लिये, कभी बिना किसी कारण झूठ बोल देते हैं। एक सर्वेक्षण से पता चला कि व्यक्ति रोजाना 95 फीसदी झूठ बिना मतलब के बोलते हैं और इसमें से भी 70 फीसदी अर्थहीन होते हैं। बस इसको पहले बाहर करिये। आपके दो-तिहाई झूठ तो यूं ही खत्म हो जाएंगे। शुरूआत कीजिए।

6. संयम – बिना ब्रेक के गाड़ी कभी नहीं चलानी चाहिये, यह सब जानते हैं। फिर जीवन की गाड़ी बिना ब्रेक को क्यों चलाते हैं। बस फर्क यही है, लगाम के साथ चलना सीखिये। हर को लगाम कहां लगानी है, कहां लगा सकते हैं, उससे बेहतर कोई नहीं जानता, शुरूआत कीजिए।

7. तप – मत करिये, उपवास, व्रत, पर बाजार का स्वाद बंद कर दीजिए। पेट से ही सभी रोग उठते हैं, रात्रि में मत खायें, शरीर भी एक मशीन है, उसे आराम दें, चित्त सवस्थ रखें, इसे वैज्ञानिक भी कहते हैं। अगली सीढ़ी में जिमीकंद पर लार टपकाना बंद कर दें, फिर उसके बाद आधी रोटी कम, जल ज्यादा और जल छानकर, यह है तप की पहली सीढ़ी।

8. त्याग – कोई वस्तु छोड़े, त्याग यानि फिर याद भी नहीं करना, जो आपको लगता है वो मेरे मतलब की नहीं, उसी से शुरूआत करें। जो बेकार की वस्तु एक बार त्याग दी, तो फिर याद नहीं करना। मन में भी नहीं लाना। यानि ममत्व का त्याग करें। ये वस्तु मेरी है, मैं इसका मालिक हूं। मेरा पैन, मेरी किताब, मेरी कुर्सी – इनमें से मेरा-मेरा छोड़ दें। हकीकत में कुछ भी सदा के लिये मेरा नहीं है। एक शुरूआत पाजीटिविटी के साथ।

9. आकिंचन्य – कितने जोड़ी कपड़े, जूते और भी सामान हैं। साल में कितने जोड़ी पहनते हैं। दो-चार-दस-पन्द्रह। इसमें भी एक लागाम लगा लें। 15 ही मान लें, अगले साल 14 कर दें, बस ऐसे ही एक शुरूआत कर दें। जब एक नया वस्त्र आये, तो पुराना एक निकाल दें, है बहुत सरल, बस संकल्प, सीमा बांधने का लेना है।

10. ब्रह्मचर्य – अरे, आपको ब्रह्मचारी नहीं बना रहे, पर स्त्री पर गलत भावों से बुरी नजर को रोकना। कहते हैं ना, बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला। अपने चंचल मन पर नियंत्रण। अपने भीतर रावण को मत घुसने दो। इतना तो आप कर ही सकते हैं।

उत्तमता के साथ ये सभी 10 श्रमण धर्म बन जाते हैं, महाव्रती के धारण के लिए। यह मत सोच लेना कि साल में तीन बार आने वाले दशलक्षण केवल त्यागी-व्रतियों के लिये हैं। नहीं, ये श्रावक के लिये भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

त्यौहार और पर्व में महत्वपूर्ण अंतर को समझिये। त्यौहार सबके साथ मनाये जाते हैं, पर्व अकेले। त्यौहार खुशी के, बन-ठनने के, किसी विशेष कारण से मनाये जाते हैं, यही पर्व अपने भीतर उतराने के, सादगी से तथा अनादि-निधन होते हैं। चलिये, देर से सही, इस बार से शुरू करें अपने जीवन में दशलक्षण धर्म की सार्थकता।