09 जुलाई 2025 / आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
आजके पावन दिन वर्षायोग स्थापना हो रही है, संतो की अपनी – अपनी, सामाजिक रूप से अलग- अलग तिथि पर, यह क्या बात हुई, वर्षायोग ज्ञानार्जन का, अहिंसा के पालन का, अंतर्यात्रा का संदेश देता है और चैनल महालक्ष्मी और खर्च जोड़ने की बात करता है कि एक वर्ल्ड क्लास हाईक्लास शिक्षा का सीनियर सेकेंडरी स्कूल, एक वर्ल्ड क्लास म्लटी स्पेशिलिटी हास्पीटल, 1000 मकान और 5000 भूले-बिसरों, भटकों को वापस अपने जैन मूल धारा में लायें। पता है इन पर कितना खर्च आयेगा, डेढ़-दो हजार करोड़ तक। पहले ही चार-पांच हजार करोड़ वर्षायोग में जैन समाज खर्च कर रहा है, चालीस-पचास फीसदी और बढ़ा दें, कैसा हवा-हवाई विचार है, इस चैनल महालक्ष्मी का। बस जो मर्जी दिमाग में आये, ये टोपीवाला बोल देता है।
‘पर आपसे अनुरोध करें, पहले, बिना कुछ और खर्च किये, यह संदेश सस्ता नहीं है।’
‘ क्या कहा, बिना कुछ खर्च किये क्यों मजाक करते हो भाई, वर्ल्ड क्लास बनाने की बात करते हो और कहते हो बिना कुछ और खर्च किये, दिमाग तो नहीं फिर गया तुम्हारा?’
हां भई हां, सोलह आने सच, कुछ और नहीं खर्चकरना पड़ेगा,
सौदा पक्का, चलो चैनल महालक्ष्मी, शुरू कर दो, अगले नहीं इसी चातुर्मास से और दे दो, जैनों को ये सब, इनकी जैन समाज को जनहित में बहुत जरूरत है। आज भी 20 से 25 फीसदी जैनों के पास अपने मकान नहीं है। उनको मकान मिल जाये, सेंट कान्वेंट में हजारों बच्चे पढ़ते हैं,

वही सेंट, जिसने गोवा में दमन मचाया था, जैनों को तोप के मुख पर बांधकर उड़ाया था, उनसे अब तो मुक्ति मिल जाये, पूर्वजों ने अपने जीवन न्यौछावर कर दिये, कि धर्म नहीं बदलेंगे और आज उसके ही संस्कारों में, लाखों रुपये फीस के रूप में देकर, जैन परिजन अपने बच्चों को वहां पढ़ा रहे हैं, कैसा समय आ गया है। यही नहीं आज वर्ल्डक्लास अस्पताल तो समय की मांग है, किसी बीमारी में ही, पूरी जिंदगी की बचत खत्म हो जाती है। और जो आखिरी बात कही है कि लाखों नहीं, करोड़ों जैन मुख्य धारा से बिछुड़ गये, पर आज भी उनसे कहीं न कहीं जैनत्व के संस्कार उनमें जीवित हैं।

आचार्य श्री ज्ञान सागरजी ने, मुनि श्री अक्षय सागरजी ने, और भी अनेकों संतों के सतत प्रयास हुए, चल रहे हैं, जरा कराओ तो टोपी वाले, तुम्हारे मुंह में घी-शक्कर। इसके लिये पूरा जैन समाज आपके साथ होगा।
‘अरे नहीं भाईसाहब, यह चैनल महालक्ष्मी नहीं करेगा, आप मिलकर ही कर देंगे। हम तो केवल उस रास्ते पर जाने के लिये टार्च जलाकर रोशनी करेंगे।
‘क्या, पलट रहे अपनी बात से,’
‘नहीं भाई नहीं,’
‘ तो फिर बताओ तो कैसे यह हो सकता संभव?’
‘ तो पढ़ो-सुनो जरा ध्यान से। लगभग डेढ़ हजार जगह चातुर्मासों की स्थापना होती है पूरे देश में सभी सम्प्रदायों की यानि दिगम्बर-श्वेताम्बर दोनों की, वैसे बता दूं दो हजार के लगभग दिगंबर संतों की 250 जगह और 20 हजार के लगभग श्वेताम्बर संतों की डेढ़ हजार जगह।’
‘हां, मान लिया, ऐसा ही है, पर वो बताओ कि स्कूल, अस्पताल, हजार मकान आदि कैसे बन पायेंगे।’
‘चलिये, आप सब मान गये, तो मूल मुद्दे की बात करते हैं, क्या आपको पता है देशभर में वर्षायोग के चार माह में कितना खर्च किया जाता है – चार से पांच हजार करोड़। हां, कुछ संत ऐसे ही हैं, जिनके लिये कोई खर्च नहीं, जैसे मुनि श्री शिवसागरजी, मुनि श्री सुवंद्य सागरजी और भी कुछ हैं, पर इन्हें अंगुलियों पर गिन सकते हैं। मुख्यत: बड़े महाराजों के वर्षायोग में 10-15 करोड़ से न्यूनतम दस लाख तक खर्च होता है। और इसका 90 से 95 फीसदी पैसा, खर्च के नाम पर जैनों से निकलकर अन्य के पास पहुंच जाता है। बड़े-बड़े पण्डाल, जरूरत से ज्यादा आवाभगत, भोजन, रहना, बैंड बाजे, भाड़े पर कलाकार, अति प्रदर्शन, अति प्रचार दिखावे में, सम्मेलनों के नाम पर अनावश्यक खर्चे, मुद्रण सामग्री, सम्मान के नाम पर आये खर्च, दिखावे में, मेरी मूंछ तेरी मूंछ से छोटी क्यों? हकीकत में भाई साहब, इन खर्चों को करने को मना नहीं कर रहा सान्ध्य महालक्ष्मी, बस नियंत्रण करने को कह रहा है। और विश्वास कीजिए अगर इसमें 25 से 30 फीसदी भी कटौती कर ली, तो सब संभव हो जाएगा। सवा हजार करोड़ में आप सब मिलकर एक वर्ल्ड क्लास स्कूल, एक मल्टी स्पेशिलिटी अस्पताल, हजार बेघर जैनों के लिये मकान तथा 5000 बिछुड़े जैनों को आर्थिक सहयोग, नौकरी, शिक्षा, सुविधा देकर यह संभव कर सकते हैं।
‘और जो आप कह रहे 50 तीर्थों का जीर्णोद्धार?’
हां, हमें मालूम था, आप इस पर भी जरूर बोलेंगे। इसके लिये श्वेताम्बर भाइयों से ज्यादा दिगंबर समाज को जरूरत है। कई जगह तो आपस में ही लड़ रहे हैं और तीसरा मजे ले रहा है, कब्जे में लगा है। पहला तो, यह प्रयास करें कि खत्म हो मनमुटाव। ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहते तो हैं, पर जीवन में नहीं उतारते। पूरी दुनिया इस पर्व को मनाती है, अपने-अपने रूप में, दैनिक चर्या में ‘सॉरी’से सबके जीवन में जुड़ें हैं, पर दिलों में नहीं उतारा हमने। दिल बड़ा करना है। घरों में दीवारें खड़ी करने की बजाय पर्युषण इस बार खाइयों को भरने, दिवारों को मिटाने पर समर्पित कर दें।
‘तो क्या इससे तीर्थों का जीर्णोद्धार हो जाएगा, क्या समझा रहे हो हमें?’
नहीं भाई, पहले ये बताना जरूरी था। आप यह तो मानेंगे कि हर संत नहीं, पर दस फीसदी संत की ओर खिंचाव समाज का बहुत ज्यादा होता है, अगर आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी के शब्दों में कहें तो ज्यादा तार वाली चाशनी वाले मुनिराज, जिन पर अनेक कमेटियां मक्खियों की तरह भिन-भिनाती रहती हैं (कड़े शब्दों के लिये क्षमा सहित) उनका लक्ष्य यही होता है, पांच-दस करोड़ खर्च करें, दस-15 करोड़ इकट्ठे करें और उस बचत का ना खाता होता है, न हिसाब इसकी चर्चा अलग से करेंगे। पर हां, वो ‘कई तार की चाशनी’ वाले वंदनीय मुनिराज-आचार्यगण अगर अपने वर्षायोग ऐसे तीर्थों पर कर लें, तो सबकुछ हो सकता है। आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी का ‘कुलचारम’- उदगांव तीर्थ पर किये गये। पिछले दो चातुर्मास इसके मूक गवाह हैं।

50 दिगंबर संत, 50 तीर्थों पर वर्षायोग करें, तो पांच साल में ऐसा कोई तीर्थ नहीं बचेगा, जिसको जीर्णोद्धार की आवश्यकता हो।
‘हां, बात तो पते की बताई, पर वर्षायोग कमेटियों को अनावश्यक खर्चों में कमी करने और पूजनीय संतों को ऐसे तीर्थों पर वर्षायोग करने के लिये प्रेरित कौन करेगा?’
बस, इस बात पर टोपीवाले की गर्दन झुक गई, अब शब्द मुंह में ही रहकर मानो मस्तक में लौटने लगे। बात लाख सही हो, पर बिना शुरूआत के वैसा ही है, जैसा भैंस के आगे बीन बजाना। पर अच्छी बात को, या कहें छोटे मुंह, बड़ी बात को स्वीकारना, समाज की प्रगति, विकास में सहयोग देना, हर किसी की जिम्मेदारी व कर्तव्य है। और ऐसा करने वालों को समाज पलकों पर रखता है, गुणगान करता है।
घटती जनसंख्या, उपेक्षित और बदलते तीर्थ, धर्म से दूर होते युवा, स्पर्धा में धन की बर्बादी, ऐसी कई समस्याओं का हल निकालने में सहायक हो सकते हैं, ऐसे कुछ कदम।
अगर आपको भी यह बात सही लगी हो, तो प्रेरक बनें, प्रेरणा के लिये, दो कदम सही दिशा में बढ़ने के लिये। अगर कुछ संत और श्रेष्ठी भी सही दिशा में बढ़ने के प्रयास करेंगे, तो चैनल महालक्ष्मी का बोलना सार्थक हो जाएगा।

















