॰ महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन ने सिद्धक्षेत्र को बताया ट्रेकिंग स्पॉट
॰ मीडिया ने खूब की पैरवी
॰ जैन कमेटी अब क्या करे?
11 सितम्बर 2025 / आश्विन कृष्ण चतुर्थी /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
प्रकृति अपने समय पर बदला लेती जरूर है, उसके संकेत हम नहीं समझ पाते।
केदारनाथ बंद,
वैष्णोदेवी बंद
बद्रीनाथ बंद
अमरनाथ बंद
ऋषिकेश बंद
पावागढ़ रोपवे टूटा
हरिद्वार मनसा देवी मंदिर का बड़ा हिस्सा टूटा
कैलाश बंद, और भी कई…
कभी सोचा क्यों, प्रकृति ने जैसे स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अपने मंदिर को अगर पर्यटक स्थलों में बदलते रहोगे, धार्मिक स्थानों को नोट बनाने की मशीन समझोगे, मस्ती-रोमांस के ठिकाने समझोगे, तो इस बार तो कुछ दिन के लिए बंद किये, अगली बार फिर क्या करूंगी, यह सोच नहीं सकते!

अब हिंदू तीर्थों के बाद, वे लोग क्यों जैन तीर्थों पर नजर डालने लगे हैं। अभी 31 अगस्त को महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिन्द्रा, जिनका नासिक में भी प्लांट है, जहां वो जाते रहते हैं, पर इस बार सिद्ध क्षेत्र मांगीतुंगी पर नजर पड़ी। टूरिस्ट स्थानों की खोज में उनका बड़ा नाम है। हजारों ट्रिप उनके संकेत पर बन जाते हैं, फिर 31 अगस्त शाम 5.30 बजे उन्होंने ट्वीट किया कि ‘नासिक में हमारा एक बड़ा आॅटो प्लांट हैं, जहां मैं अपने पूरे करियर में जाता रहा हूं, फिर भी मुझे मांगीतुंगी ट्रेक के बारें में पता नहीं था, कोशिश करना तो दूर की बात है। यह देखने में बेहद खूबसूरत लगता है। यह न सिर्फ एक सुखद शारीरिक यात्रा है, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव भी है, जहां प्राचीन चट्टानों पर उकेरी गई मूर्तियां और सबसे ऊंची जैन मूर्तियों में से एक, विस्मयकारी 108 फुट ऊंची अहिंसा की प्रतिमा देखने का मौका मिलता है। यह एक और बात की याद दिलाती है कि सबसे अच्छे अविश्वसनीय कुछ यात्राओं के अनुभव हमारे दरवाजे पर ही मौजूद हैं। ’(एक चेतावनी: सावधानी से चलना होगा। हाल ही में एक परिवार के कुछ सदस्यों के साथ बाड़ की दीवार पर चलते समय एक दुखद दुर्घटना हुई थी।)
इस ट्वीट में उन्होंने मांगीतुंगी तीर्थ को एक ट्रेकिंग प्वाइंट बताया.48 घंटे में 3 लाख ने पढ़ लिया और समझ लो कि इस तीर्थ के लिये खतरे की घंटी बज गई। अगले ही दिन सभी बड़े अखबारों ने सुर्खियों में प्रकाशित किया और अब लग जाएगी पर्यटकों की कतार।)

चैनल महालक्ष्मी चिंतन : 99 करोड़ मुनिराजों की सिद्धभूमि, सबसे बड़ी जिन प्रतिमा की पावन स्थली अब टूरिस्टों के निशाने पर है। कौन बचाएगा जैन तीर्थों को, क्या ट्रेकिंग के लिये पर्यटन के लिये जैन तीर्थ ही मिलते हैं? क्या अन्य स्थान नहीं है। पर आज जैन तीर्थों को, जिधर से चाहें, उधर से लूट लो। क्या करें कमेटियां, कैसे बचायें, समाज अपने तीर्थ? आज अति अल्पसंख्यक समाज के सामने जैसे मुसीबतों का पहाड़ खड़ा है।

















