13 मई 2026 / जयेष्ठ कृष्ण एकादशी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/
जयपुर में कानूनी लड़ाई की शुरूआत श्रीमती शशि माथुर द्वारा दायर एक याचिका से हुई थी। विवाद का मुख्य केंद्रबिंदु यह था कि क्या सामुदायिक केंद्र के लिए आवंटित भूमि पर धार्मिक प्रतीक या मूर्तियां स्थापित की जा सकती हैं। मार्च 2026 में सिविल कोर्ट और उसके बाद अप्रैल 2026 में एडीजे कोर्ट ने संस्थान के विरुद्ध फैसला सुनाते हुए ‘अस्थायी निषेधाज्ञा’ लागू कर दी थी। निचली अदालतों का मानना था कि सामुदायिक भूमि का उपयोग किसी ‘विशेष धर्म’ के लिए नहीं होना चाहिए और वहां मूर्तियां नहीं लगाई जानी चाहिए। इस आदेश से जैन समाज में निराशा की लहर थी, क्योंकि इससे संस्थान की गतिविधियों पर रोक लग गई थी। ये प्रतिमायें मार्च में ही स्थापित की गई थी।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप और न्यायमूर्ति समीर जैन का तर्क
मामला जब राजस्थान हाईकोर्ट पहुँचा, तो न्यायमूर्ति समीर जैन ने इस विवाद को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखा। कोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी परिसर को केवल वहां स्थापित प्रतीकों या मूर्तियों के आधार पर ‘प्रतिबंधित धार्मिक स्थल’ नहीं माना जा सकता।

सार्वजनिक उपयोग बनाम धार्मिक प्रतीक: हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी परिसर में समाज के सभी वर्गों के लिए गतिविधियां संचालित हो रही हैं, तो मात्र मूर्तियों की उपस्थिति उसे विशेष धार्मिक उपयोग की श्रेणी में नहीं डालती। कोर्ट ने विवादित भूमि को ‘फैसिलिटी एरिया’ माना। इसका अर्थ है कि यह स्थान जनहित और सामुदायिक कल्याण के लिए समर्पित है।

न्यायमूर्ति ने स्पष्ट कहा कि जब तक यह साबित न हो जाए कि परिसर में प्रवेश केवल एक धर्म विशेष तक सीमित है, तब तक उसे सार्वजनिक माना जाएगा। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब श्री महावीर साधना संस्थान में निम्नलिखित सामाजिक और कल्याणकारी कार्य बिना किसी बाधा के जारी रहेंगे:
योग और स्वास्थ्य कक्षाएं: शारीरिक और मानसिक कल्याण के लिए नियमित सत्र।
सांस्कृतिक आयोजन: समाज को जोड़ने वाले विविध उत्सव और कार्यक्रम।
सामाजिक एवं शोक सभाएं: दुख और सुख के क्षणों में समुदाय की भागीदारी।
सार्वजनिक कल्याण: कोई भी ऐसी गतिविधि जो समाज के व्यापक हित में हो।

इसकी पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3714 में देख सकते हैं।
चैनल महालक्ष्मी चिंतन:
यह फैसला केवल एक जमीन के टुकड़े की जीत नहीं है, बल्कि यह उन मूल्यों की जीत है, जिनके लिए जैन समाज जाना जाता है—‘सेवा और समर्पण’। हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धार्मिक आस्था और सामाजिक सेवा एक साथ चल सकते हैं। यदि कोई संस्थान अपने धार्मिक प्रतीकों के साथ समाज के हर व्यक्ति की सेवा कर रहा है, तो कानून उसकी ढाल बनेगा। राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय उन सभी संस्थानों के लिए एक मिसाल बनेगा, जो सामुदायिक भूमि पर सामाजिक सरोकारों के साथ अपनी धार्मिक पहचान को भी जीवित रखना चाहते हैं। जयपुर के टोंक रोड पर स्थित श्री महावीर साधना संस्थान अब और भी अधिक ऊर्जा के साथ मानवता की सेवा कर सकेगा।
















