आचार्य श्री कुंदकुंदाचार्य की जन्म स्थल कोनाकोंडला के जीर्णोद्धार के लिये एक और कदम

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08 जनवरी 2026 / माघ कृष्ण षष्ठी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
84 पाहुड़ के रचियता, विदेह क्षेत्र में समोशरण में जाकर आने वाले, जैन संस्कृति को सतत जारी रखने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले या कहें वर्तमान में जैन धर्म की धारा प्रवाहित करने वाले आचार्य कुंद कुंद की जन्म स्थली, जिसकी दुर्दशा को वर्तमान परिस्थिति में रोक पाना मुश्किल होता जा रहा था, तब भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी द्वारा सतत कोशिशें और उसमें आचार्य श्री गुणधरनंदी जी के पूर्ण सहयोग के आश्वासन के बाद नई किरण चमकी है।


वर्तमान के आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के पास कोंडकुंदु, जो कौंडकुंदपुर भी कहा जाता रहा और वर्तमान में कोनाकोंडला के नाम से जाना जाता है, जहां से कहा जाता है, उनको नाम मिला। वहीं से कई शिलालेख भी प्राप्त हुये।

ईसा पूर्व दूसरी-प्रथम सदी (ई.पू. 127-172) के आचार्य कुंदकुंद ने मात्र 11 वर्ष की उम्र में दीक्षा ली थी। उन्होंने 84 पाहुड़ की रचना की, जिनमें से अधिकांश आज उपलब्ध नहीं है। उनके प्रमुख ग्रंथों में मूलाचार, प्रवचनसार, समयसार, नियमसार, पंचास्ति काय, अष्टपाहुड़, रयणसार, बारा अणुवेक्खा, दस भक्ति, कुरलकाव्य आदि आज उपलब्ध प्रमुख ग्रंथों में से हैं।

तीर्थक्षेत्र कमेटी राष्ट्रीय अध्यक्ष जंबू प्रसाद जैन जी के नेतृत्व में, 125 वर्ष की कमेटी के चेयरमैन जवाहरलाल जैन जी व चैनल महालक्ष्मी के साथ कुछ समय पूर्व आचार्य श्री गुणधरनंदी जी के पास वरूर भी गई। इसके जीर्णोद्धार की विस्तार से चर्चा हुई, लगभग 20 हजार की उपस्थिति में आचार्य श्री गुणधरनंदी जी ने सार्वजनिक मंच से घोषणा की, कि इसके जीर्णोद्धार में पूरा सहयोग देंगे और यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ के रूप में समाज के सामने होगा। पर इस क्षेत्र पर अधिकार वन विभाग का है, और यह चारों तरफ से खुला है, कोई दीवार नहीं है। पानी भी आधा किमी दूर से लाना पड़ता है।

स्थानीय लोग इसे रसासिद्धुला गुट्टा कहते हैं, गुट्टा यानि गिरि और सिद्धुला मतलब सिद्धगिरि। हर अमावस को यहां फूल आदि चढ़ाने आते हैं। पुरातत्व विभाग में यह इसी नाम से दर्ज है।

तीर्थक्षेत्र कमेटी के तमिलनाडु अंचल के अंतर्गत यह क्षेत्र आता है। कमेटी ने इस क्षेत्र की देखभाल के लिये सुरेश जैन जी को वर्षों से रखा हुआ है, अब उन्होंने चैनल महालक्ष्मी को बताया कि अभी हाल में यह सर्वे सं. 377/एन के अंतर्गत सरकारी कागजों में दर्ज है। आसपास यहां पर खनन कार्य हो रहा है, जिसके लिये पत्थर बाहर से लाकर तोड़े जाते हैं। यह जमीन वन विभाग के अंतर्गत आती है। 2.6 एकड़ की इस जमीन के लिये प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने दौरा किया, क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और उसके बाद आश्वासन मिला कि शीघ्र यह क्षेत्र वन विभाग से पुरातत्व विभाग को सुपुर्द कर दिया जाएगा, फिर वहां से तीर्थक्षेत्र कमेटी को स्थानांतरण की प्रक्रिया शुरू होगी। क्षेत्र का सर्वेक्षण करने अनंथापुरम के संयुक्त कलेक्टर शिव नारायण शर्मा, गुंतकाल राजस्व मंडल अधिकारी एबीवीएस श्रीनिवास तथा वज्रकारूर तहसीलदार एम. नरेश कुमार और ग्राम राजस्व अधिकारी छथारा नायक आदि ने किया।

तीर्थक्षेत्र कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जंबू प्रसाद जैन जी ने बताया कि जमीन पर अधिकारिक कागज मिलते ही, पहले इसकी बाउंड्री व दो-तीन कमरों के निर्माण के साथ कार्य शुरू कर दिया जाएगा। आशा करते हैं 2026 की शुरूआत इस क्षेत्र जीर्णोद्धार के लिये इतिहास में दर्ज होगी।

इस बारे में पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3581 में देख सकते हैं।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन : जैन समाज के लिए 2.6 एकड़ कोना कोंडला क्षेत्र ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यहां कई शिलालेख मिलने के साथ आज भी पहाड़ पर त्रिलोक रचना व अन्य कई महत्वपूर्ण चित्र उकेरे हुए हैं। पास में पत्थरों को तोड़ना और स्थानीय ग्रामवासियों का हर अमावस को आकर इसे अपने रूप में पूजना आने वाले भविष्य में चिंता का विषय बन सकते हैं। 10 वर्ष पहले इसे लेने का प्रस्ताव प्रशासन ने महासभा को दिया था, पर तब अधिग्रहण कुछ कारणों से नहीं हो पाया था। अब तीर्थक्षेत्र कमेटी का यह कदम प्रशंसनीय है, प्राचीन तीर्थों के जीर्णोद्धार की दशा में।