16 जुलाई 2025 / श्रावण कृष्ण षष्ठी/चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
गुरु पूर्णिमा का पावन अवसर, वह भी गुरुवार को और आषाढ़ महीने का आखिरी दिन, 10 जुलाई को तरुण सागरम तीर्थ पर, आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी के सान्निध्य में इस पर्व को मनाने का अवसर मिला, तो सचमुच सांध्य महालक्ष्मी गदगद हो गया। अब तक गुरु पूर्णिमा पर सभी साधुजन अपने-अपने गुरु का पूजन करते हैं, गुणगान करते हैं। पर यहां पर आचार्य श्री ने अपने गुरु के साथ 10 आचार्यों का स्वयं पूजन किया, गुणगान किया, जो बिल्कुल लीक से हटकर था और उसने स्पष्ट संदेश दे दिया कि गुरु एक नहीं होते, गुरु तो कई होते हैं।

जैसे लौकिक जीवन में जन्म से मां, फिर पिता, फिर स्कूल, कॉलेज के अध्यापक और बाद में कोई और भी, पर धर्म के शासन में, जो आपको दीक्षा देते हैं, उनके साथ कई और भी आपके जीवन को सही राह में बदलते हैं और यही कारण था कि आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी ने आदि सागर अंकलीकर, चारित्र चक्रवर्ती शांति सागर जी, महावीर कीर्ति जी, विमल सागर जी, सन्मति सागर जी, संभव सागर जी, विद्यासागर जी, पुष्पदंत सागर जी, सुनील सागर जी, विशुद्ध सागर जी – इन सभी 10 आचार्यों का पूरे भक्ति भाव से अष्ट द्रव्यों के साथ, न केवल पूजन किया बल्कि गुणगान भी किया। जिन्होंने खड़ा किया, चला कर दिखाया, उनके लिए दिन, पूरी तरह समर्पित रहा।
शायद यह पहला अवसर था, जब लोगों ने एक नहीं, 10 आचार्य का गुणानुवाद किया।
इस अवसर पर आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ने कहा कि
एक बार ज्ञान गंगा में नहा कर तो देखो, अनुपम सुख मिलेगा।
यहां आकर के देखो, एक बार, सन्मति, पुष्प दंत की
ज्ञान गंगा में डुबकी लगाकर, बहुत आनंद मिलेगा।।
गुरु से मत कहो कि समस्या विकट है,
समस्या से कहो कि गुरु निकट है।
वह अमीर, अमीर क्या, जिसका कोई फकीर ना हो,
और वह फकीर, फकीर क्या, जिसका दिल अमीर ना हो।
गुरु दूर हो या पास, एहसास होना जरूरी है,
दूरियां चाहे कितनी भी हो, बस भाव स्पर्श होना जरूरी है।
पंखों पर जिसे विश्वास नहीं, वह परिंदा क्या?
जिसको अपने गुरु पर विश्वास नहीं, वह शिष्य क्या?
दीपक से किसी ने पूछा: जलते क्यों है, उसने मुस्कुरा
कर कहा, किसी को ठोकर न लगे इसलिए जलते हैं।
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उन्होंने इस तरह कई मुक्तक, छंद कहकर धर्म सभा का मानो दिल जीत लिया। उन्होंने कहा कि
खरीद सकते गुरु को, तो अपनी जिंदगी बेच कर खरीद लाते,
पर अफसोस कुछ लोग संपत्ति से नहीं, किस्मत से मिला करते हैं।
रावण के पास सब कुछ था, पर दिशाबोध देने वाला, बस गुरु नहीं था, वही राम जी के साथ वन में कुछ नहीं था, पर गुरु वशिष्ठ जी का हाथ सिर पर था।
गुरु की सूरत देखो, तो आंखें भर आएं,
उनके चरणों पर ध्यान लगाओ, तो दुख दूर हो जाए।
जब गुरु पास हो तो आकार दिखाई देता है,
मिटती हुई मानवता का आकार दिखाई देता है।
होली, दशहरा, दिवाली तो आते हैं, चले जाते हैं,
जब गुरु पास विराजमान हो जाए , तो हर दिन त्यौहार दिखाई देता है।।

आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ने कहा की इंद्रभूति गौतम को महावीर स्वामी के रूप में गुरु की प्राप्ति होती है। देव शास्त्र गुरु के अलावा कोई शरण नहीं है। आज जगत में बिना गुरु के कल्याण नहीं हो सकता। विद्यार्थी अच्छी शिक्षा से पहचाना जाता है, गौतम स्वामी से लेकर आज तक जितने गुरु हुए, जिन्होंने जैनत्व को एक पहचान दी , हमें राह दिखाई, पर उसे पर चलना स्वयं पड़ेगा, तभी इस संसार भंवर से बाहर निकल पाएंगे। जहां गुरु शिष्य पर उपकार करता है, उसे शिक्षा व दीक्षा के संस्कार देकर, वही शिष्य भी गुरु पर उपकार करता है, उसके बताए मार्ग का अनुसरण करके। हम किसी गुरु का नाम के कारण, बखान नहीं करते, बल्कि उनके गुणों को नमस्कार करते हैं। आज गुरु का बखान करने से ज्यादा, उनकी अनुभूति को जागृत करने का समय है। जब शिष्य गुरु के पास जाकर लघु हो जाएगा, उसकी झोली में अमृत स्वयं भर जाएगा। अपनी गलती को सुधारने के लिए गुरु का ध्यान करो। अपने गुरु को संभालने के लिए नहीं, अपनी दिशा को सही करने के लिए गुरु बनाओ।
शायद पहली बार ऐसा भी देखा कि पाद प्रक्षालन का अवसर सभी त्यागी व्रतियों और भक्तों को मिला, बस एक ही शर्त थी कि शुद्ध वस्त्र पहने हो। सैकड़ों भक्तों ने इसका लाभ लिया। तरुण सागरम में हर रविवार को 3:30 बजे विशेष प्रवचन हो रहे हैं, एक बार आकर लाभ लीजिए, फिर बार-बार स्वयं आयेंगे। शास्त्रों की भाषा को कठिन शब्दों में नहीं, बहुत सरल रूप में अंगीकार करने के लिए यह शुभ अवसर है।














