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Home सामाजिक SOCIAL शंकर के नंदी और आदि तीर्थंकर के चिन्ह मूरत को पूजने...
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शंकर के नंदी और आदि तीर्थंकर के चिन्ह मूरत को पूजने वालो, जिंदा नंदी , आदि चिन्ह को बचा लो , सरकार चाहती है बेचना , किसलिए?

By
Channel Mahalaxmi
-
June 16, 2023
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    15 जून 2022/ आषाढ़ कृष्ण त्रियोदिशि /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ EXCLUSIVE/शरद जैन

    आपको सुनने में तो हैरानगी होगी, पर विश्वास कीजिए वही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, जिन्होंने 2014 के चुनावों से पूर्व कहा था कि हमारा पशुधन विदेशियों के स्वाद के लिए काट काट कर क्यों भेजा जा रहा है। आज उन्हीं की सरकार में उनका मत्स्य पालन और पशुपालन मंत्रालय , आज पशुओं के लिए तारण और मरण मंत्रालय बनकर रह गया है। हकीकत में जो गौशालाओं में गौ माताओं को रखा जाता था, सुरक्षा की जाती थी , उन्हीं के बछड़े बछियों को जिंदा निर्यात करने की तैयारी में है सरकार और वह भी बहुत तेजी से। जनता को विचार के लिए समय भी ज्यादा नहीं देना चाहती नहीं चाहती कोई किंतु परंतु करें । आज सरकार को मांस के निर्यात से 30000 करोड रुपए मिलते हैं, अब जिंदा पशुओं के निर्यात की कोशिशें शुरू कर दी गई है। अफसोस यह है कि जिसकी अनुमति ना संविधान देता है, ना सुप्रीम कोर्ट का आदेश। पर उन दोनों को ताक पर रखकर यह कोशिशें की जा रही है। बचाना होगा अगर, अपने गौ माता को, शंकर के नंदी को, प्रथम तीर्थंकर के चिन्ह को, तो आज ही आपको कुछ करना होगा । नीचे दिए प्रारूप को दिए गए ईमेल पर तुरंत भेजिए , क्योंकि सरकार ने सुझावों की अंतिम तिथि 17 जून निर्धारित की है।

    श्रीमान संयुक्त सचिव महोदय,
    मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय,
    कृषि भवन,
    नई दिल्ली-110001
    ईमेल: gn.singh13@nic.in , gagan.garg@nic.in

    विषय: आपके कार्यालय ज्ञापन दिनांक 07.06.23 के द्वारा सूचित किया गया- पशुधन आयात और निर्यात विधेयक, 2023 (ड्राफ्ट)
    के सन्दर्भ में।

    महोदय,
    नमस्कार

    उपरोक्त विषय में हमारे विचार निम्नलिखित हैं :-
    1.हितधारकों की जागरूकता के लिए, ड्राफ्ट बिल का प्रिंट मीडिया में उचित प्रचार किया जाना चाहिए!
    2. जीवित पशुओं को कमोडिटी मानकर उनका आयात करना संविधान की मूल भावना के उपबंधों के विरुद्ध होने के अतिरिक्त, यह राष्ट्रीय पशु संपत्ति के उत्थान के विपरीत असर करेगा। जबकि पशु वर्ग तो पहले से ही, समाज, सरकार और उसकी मशीनरी की उदासीनता का शिकार है। इसके अतिरिक्त, जीवित पशुओं से संबंधित पालिसी और मसला, आपके मंत्रालय के दायरे में भी नहीं है। इसलिए प्रस्तावित बिल के पैरा 4 को पूरी तरह से हटा देना ही उचित होगा।
    3. इस विधेयक को बहुत जल्दबाजी में पास करवा लेना बहुत अनुचित होगा। हमें विस्तृत अध्ययन के लिए कुछ और समय की आवश्यकता है।इसलिए टिप्पणियां प्रस्तुत करने की समय सीमा 30.09.2023 तक बढ़ाई जाए।
    हमें आशा है कि उपरोक्त मसले पर पुनर्विचार कर आप सही निर्णय लेंगे।

    सधन्यवाद!

    7 जून को आदेश, जिसका कोई प्रचार-प्रसार नहीं किया गया, ऐसे में उस कानून को बनाने की कोशिश, जिससे अरब, वियतनाम मलेशिया, इराक आदि देशों में उनको जिंदा भेजा जा सके, जिन्हें मार, कांटे खाए । आज हमारा देश चंद रुपयों के लिए ,इस तरह की कोशिश कर रहा है। संविधान में आर्टिकल 51a जीवित प्राणियों के लिए दया का मंत्र दिया गया है। उसमें कहा गया है कि प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत झील, नदी और वन्य जीव है, उनकी रक्षा करें ,उनका संवर्धन करें और प्राणी मात्र के प्रति दया का भाव रखें। अनुच्छेद 48 , 51a में भी इसी तरह कहा गया है कि यह राज्य का कर्तव्य है कि वह कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके के व्यवस्थित करने का प्रयास करें। उनके संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाए। वध पर रोक लगाये, गाय और बछड़ा और अन्य दुधारू और वाहक मवेशियों की।

    माननीय मोदी जी, हमारे देश की नीति अहिंसा पर आधारित है, जहां शंकर के नंदी को आज भी पूजा जाता है आओ पूजा जाता रहेगा। जहां प्रथम तीर्थंकर का चिन्ह, सबके लिए वंदनीय है। ऐसे में मूक प्राणियों का जिंदा, वध के लिए निर्यात करना कहां की सोच है और किस चीज का परिचायक है। निश्चय ही यह विदेशी मुद्रा अर्जित करने की कोशिशों, लेकिन यह करोड़ों देवी देवताओं के देश में , धर्मानुकूल नहीं है। आप बहुत ज्ञानवान है, ऐसे में इन जीवित प्राणियों को भी एक वस्तु या समान समझना क्या दर्शाता है? आज गौशाला खोलने में अपने को धन्य समझते हैं और वही उनके बच्चों के जिंदा निर्यात के लिए हम तैयारी करते हैं। कैसी सोच विकृत हो गई है ? अदालत में पाषाण के नंदी के लिए लड़ने को तैयार हैं और दूसरी तरफ जिंदा नंदी को खाने, पकाने, मारने के लिए निर्यात करने को तैयार हैं । इस बारे में चैनल महालक्ष्मी, एक बहुत सरल रूप में , आप सभी को समझाने के लिए, आज शुक्रवार 16 जून को रात्रि 8:00 बजे एपिसोड नंबर 1929 में पूरी जानकारी देगा। आवाज उठाने के लिए हमने जैन धर्म संरक्षण महासंघ की ओर से भी कोशिश की है। कई ईमेल भेजें और एक पत्र की प्रतिलिपि यहां संलग्न है। आप सभी को भी, जैसा ऊपर बताया है, वैसे ईमेल भेजने हैं

    7 मई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने AWBI के मामले में अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा, कृषि और पशुपालन विभागों को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेंगे और गाय बछड़ों तथा अन्य दुधारू पशुओं की नस्लों के सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिबंध करने के लिए कदम उठाएंगे। जानवरों को दर्द और असुविधा, चोट , बीमारी, भूख, भय संकट से मुक्ति और सामान्य व्यवहार व्यक्त करने का मौलिक अधिकार है । लेकिन आज तक संसद में इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया, बल्कि अब उन्हें जिंदा भेजने की प्रक्रिया को कानून बनाने की शुरुआत कर दी है। इतनी जल्दबाजी में वक्त बस 10 दिनों का दिया है।
    हमारी मांग है मुख्य बिंदु निम्न प्रकार है:-
    1. सरकार की घोषित नीति के विरुद्ध मात्र 10 दिवस का समय दिया गया है।
    2. जीवित पशुओं को वस्तु मानकर निर्यात करने हेतु कानून लाया जा रहा है जबकि जीवित पशुओं में भी आत्मा होती है। वह कोई निर्जीव वस्तु या कोमोडिटी नहीं है।
    3. भारत का संविधान का अनुच्छेद 48, 51ए पशुओं व जीवित प्राणियों की रक्षा एवं सद्भावनाएं रखने का निर्देश देते है। जीवित पशुओं को निर्यात करने से संबंधित संविधान में कोई प्रावधान नहीं है।
    4. जीवित पशुओं को मांसाहार के लिए निर्यात करने से मांसाहार में वृद्धि होगी जिससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी और जलवायु परिवर्तन होगा।
    5. पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960. में प्रस्तावित संशोधन विधेयक सर्वोच्च न्यायालय ओं पारित निर्देश व सांसदों द्वारा संसद में मांग किए जाने के बाद भी पारित नहीं हुआ है और इस बिल को शीघ्र से पारित किया जाने के पीछे क्या कारण है?

    किसानों के हृदय पर सूली है, जिसका दर्द वही जानता है, क्योंकि हमारे देश का खेत वही बैल जोतता हैं, जिनको मरने के लिए जिंदा निर्यात की कोशिश हो रही है। वही गौ माता ,जिनके बच्चे आगे गौ माता बनेंगे, वो गाय भैंस, जिनका दूध पीकर ही हर भारतीय बड़ा हुआ है, उनको बचपन में ही मारने के लिए जिंदा भेजना, कहां की सोच है । इस धर्म प्रधान देश में ,जहां पर कृत , कारित, अनुमोदना से पाप होते हैं, आज तो विज्ञानिक भी कहते हैं कि मूक पशुओं की चीत्कार, कराहना, आदि से प्राकृतिक विपदाये आती है, जैसा कि प्रकृति का विधान होता है, एक भलाई की 10 भलाई मिलती है और एक बुराई की 10 बुराई भी। इसीलिए पशु पक्षियों की थी यह चीत्कार भरी पुकार भी प्राकृतिक विपदा का बड़ा कारण बनती है। ऐसे मीट उत्पादों से 30 हजार करोड़ कमाने वाला हमारा देश , इस राशि के बदले, इससे कई गुना , विपदा को रोकने और उनके घटने की परिस्थिति को सही करने में , खर्च करने को आज मजबूर होता है। सोचिए और आज कदम उठाए , चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी इसमें आपके लिए सदा सहयोगी बनकर आगे खड़ा रहेगा। देखिएगा रात 8:00 बजे आज, 16जून को, जरूर चैनल महालक्ष्मी का विशेष एपिसोड 1929 एपिसोड नंबर।

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