क्या आज भी मूर्तियों से रजत सिक्के बरसते हैं? ॰ माता जी के सामने विज्ञान भी नतमस्तक!

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06 फरवरी 2026 / फाल्गुन कृष्ण पंचमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
20 जनवरी का वह दिन, रोज की तरह निकला तो, पर आज अलग रंग था। जहाजपुर स्वस्तिधाम की प्रणेता गणिनी आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी का प्यावड़ी-पीपलू अतिशय क्षेत्र प्यावड़ी के श्री दिगंबर जैन चन्द्रप्रभु तीर्थ पर देखने को मिला, उसे देखकर विज्ञान के भी धरा से मानो पैर उखड़ गये, जिसके आधार पर आज का पढ़ा-लिखा समाज अपने को वैज्ञानिक समझता है। उस दिन जैसे ही माताजी ने वहां प्रवेश किया तो मानो वह अतिशय देवों ने मनाया।

जी हां, पिछले 2 साल से पूर्णिमा भी मानो इसका इंतजार कर रही थी। हां, 20 जनवरी को जैसे ही माताजी का जिनालय में प्रवेश हुआ पूर्णमासी का चमत्कार तब हो गया। दो दिन बाद ही भव्य जिन मंदिर का शिलान्यास व माताजी का 30वां दीक्षा जयंती महोत्सव भी होना था। अभिषेक का समय, और तब मनोहारी चंद्रप्रभु के समीप चरणों में दो चांदी के सिक्के नजर आये और तभी अचानक पूरा परिसर चंदा प्रभु और गुरु माताजी के जयकारों से गूंज उठा। साथ ही शिखर पर केसर की वर्षा। क्या चमत्कार था? जिसे स्वयं माताजी ने भी कभी भीतर से स्वीकार नहीं कर पाई, वो क्या, कोई भी नहीं कर पाता स्वीकार।

पर आज तो माता जी ने स्वयं देखा। यह क्या सचमुच अतिशय होता था, जो आज भी हुआ। माताजी ने दोनों रजत सिक्के, वहीं चरणों पर रखने को कहा। विश्वास नहीं हो रहा था, पर यह तो उनकी आंखों के सामने हुआ।

फिर निवाई पहुंची माताजी विहार करते और सारी बातें आचार्य श्री वर्धमान सागरजी ससंघ को बताया, जो स्वयं आश्चर्यचकित हुए।
इसकी पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3608 व 3615 में देख सकते हैं।