अतिशय तीर्थ पर प्रतिमा का रंग बदलना, क्या दे रहा संकेत?

0
884

06 फरवरी 2026 / फाल्गुन कृष्ण पंचमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
वैसे तो सभी जानते हैं कि जहाजपुर के स्वस्तिधाम तीर्थ पर विराजित तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रतनाथ जी प्रतिमा जब खुदाई के दौरान निकली, तब उसे ले जाने के लिये आये प्रशासन को उसने कैसे अपनी शक्ति दिखाई और फिर 5 बार अपना रंग बदला, आज वही क्षेत्र विकास की नई गाथायें लिख रहा है। यही नहीं, श्री महावीरजी के बाद मानो दूसरा बड़ा अतिशय तीर्थ बन गया है। इसमें गणिनी आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी की प्रेरणा, त्याग, संघर्ष के भी अतुलनीय योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता।

इससे पहले का तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान का ही केशोराय पाटन अतिशय क्षेत्र पर भी 28 जनवरी को सायं सवा 6 बजे कुछ ऐसा ही हुआ। यह तो सबको पता ही होगा कि इस तीर्थ पर हमला करने वाले मुगल सम्राट की सेना को कैसे यहां से भागना पड़ा था। प्रतिमा पर अनेकों हथियारों से उन सैनिकों ने हमला किया, पर प्रतिमा के छिद्रों से दूध की तेज धार निकली और मधुमक्खियों ने फिर उन्हें क्षेत्र की सीमा स ेबाहर खदेड़ कर ही दम लिया। यह घटना 500 साल पुरानी है।

उस प्रतिमा का तेज आज भी सबको निस्तेज कर देता है। चमकीले श्याम रंग की प्रतिमा 28 जनवरी को सायं सवा 6 बजे अचानक रंग बदल गई। चमकीले श्याम से रेतीले रंग की हो गई। प्रतिमा के रंग बदलने को अतिशय माना जाने लगा। इसकी पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3612 व 3615 में देख सकते हैं।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन : अतिशयकारी प्रतिमा का सदियों बाद रंग बदलना, जिसने पहले वहां आये कष्ट पर आक्रमणकारियों को खदेड़ा हो, जिसके निशान आज भी हैं। वहीं प्रतिमा अपने चमकीले रंग से अचानक निस्तेज से रेतीले रंग में आ जाये, उसके कारण और संकेत तो विद्वान आगम से ही दे सकते हैं। रंग बदलना अतिशय यानि चमत्कार भी होता है और निस्तेज होना आने वाले समय के प्रति सचेत होने का संकेत भी हो सकता है। कारण बिना जाने, खुशी या गम मनाने पर व्यक्त करने से पहले, इसकी जानकारी लेना आवश्यक है।