सुदर्शन स्वामी की मोक्ष स्थली कब्जाने की कोशिशें तेज

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कमलदह तीर्थ बुलडोजर चलाकर कब्जे की कोशिश
5 एकड़ के जैन तीर्थ में सरकार व दिगंबर हिस्से पर कब्जे की कोशिशें
72 फीट की महावीर स्वामी की स्थापना विवाद में, जैन एकता के प्रयासों पर झटका

28 दिसंबर 2025 / पौष शुक्ल अष्टमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी
25 दिसम्बर को जिन सुदर्शन स्वामी जी का निर्वाण दिवस मनाया, उन्हीं की मोक्ष स्थली पटना के गुलजार बाग की कमलदह सिद्धक्षेत्र पर जैनों का दूसरा सम्प्रदाय आपसी प्रेमभाव को तार-तार करते मानो पूरा कब्जा करने की कोशिश करने में लगा है।

बिहार तीर्थक्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष पराग जैन ने चैनल महालक्ष्मी को पूरा घटनाक्रम बताते हुये कहा कि यह सिद्धक्षेत्र जैनों के दोनों सम्प्रदाय दिगंबर-श्वेताम्बर की एकता का प्रतीक रहा है। जब भद्रबाहु स्वामी 12 हजार मुनिराज के साथ उत्तर में भीषण लम्बे अकाल को देखते पश्चिम की ओर बढ़ गये थे, तब इधर ही ठहरे मुनिराजों के साथ आचार्य स्थूलभद्र स्वामी ने श्वेताम्बर सम्प्रदाय की शुरूआत की थी, कारण था कि जैन संस्कृति को किसी तरह बचाया जाये और दिगंबर रूप में तब आहार की व्यवस्था होना असंभव सा हो गया था। यहीं तत्वार्थ सूत्र के रचियता उमास्वामी जी की भी जन्मस्थली है। चन्द्रगुप्त मौर्य ने यहीं संतों से शिक्षा ग्रहण की।

श्री पराग जैन ने बताया कि 1890 में सरकार द्वारा 2 एकड़ 99 डिसबिल जगह विकास क्षेत्र के रूप में दी, जबकि 2 एकड़ 5 डिसबिल जगह दोनों सम्प्रदायों की थी, इस प्रकार इस तीर्थ की 5 एकड़ 5 डिसबिल जगह जैन समाज के पास थी। गत 05 दिसम्बर को श्वेताम्बर सम्प्रदाय ने यहां 72 फीट की महावीर स्वामी की प्रतिमा स्थापित करने के लिए शिलान्यास का एकतरफा आयोजन किया। इसके लिये जहां तालाब क्षेत्र को भर दिया गया, वहीं जमीन पर कब्जा करने की कोशिशें शुरू कर दी। यहीं इस तीर्थ का नाम बदलने की शुरूआत कर दिगंबरों को एक साइड करने की कोशिश की गई। 4 दिसम्बर को तीर्थक्षेत्र कमेटी द्वारा प्रशासन के विभिन्न विभागों को पत्र लिखे गये। बुलडोजर चलाकर क्षेत्र को बराबर किया, तालाब में मिट्टी भर सरकार द्वारा विकास क्षेत्र को कब्जाने की कोशिशें की गई।
इसकी पूरी रिपोर्ट चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3570 में देख सकते हैं।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन – जहां एक तरफ दोनों सम्प्रदायों के संत एक मंच पर एकता का उद्घोष करने का प्रयास करते हैं, वहीं कुछ लोग/ कमेटी इन एकता के संबंधों को तार-तार करने में लगे रहते हैं। ऐसा शिरपुर के बाद कमलदह तीर्थ पर दिख रहा है। थोड़े से जैन समाज को एक होना समय की बड़ी मांग है। अपने-अपने सम्प्रदाय में रहते हुए भी बाहर एक होना होगा, मिलकर कदम उठाने होंगे और इस तरह कब्जाने की कोशिशों को छोड़ना होगा, वर्ना जैन समाज की दुर्दशा पारसी की तरह होने में देर नहीं लगेगी।