तीर्थों के संरक्षण – संवर्धन में नारी शक्ति का आह्वान

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॰ ललितपुर के बाद देहरादून-अहमदाबाद में महिला सम्मेलन
17 सितम्बर 2025 / आश्विन कृष्ण एकादशी/चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /

जैसा सर्वविदित है भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी 325 के लगभग प्राचीन तीर्थों के संरक्षण-संवर्धन को करते 125 साल पूरे करने वाली है। अभी हाल में विभिन्न तीर्थों के जीर्णोद्धार के लिये 2 करोड़ रुपये का आवंटन भी किया है। शतकोत्तर रजत स्थापना वर्ष में (22 अक्टूबर 2026 से 22 अक्टूबर 2027 तक) वृहद स्तर पर विभिन्न कार्यक्रमों को आयोजित कराकर जन-जन में तीर्थों के संरक्षण-संवर्धन के लिये व्यापक जागरूकता अभियान चलायेगी। इस कड़ी में इससे पूर्व नारी शक्ति का क्षेत्रीय स्तरों पर आह्वान करते हुए एक धर्म जागरण आंदोलन देने का प्रयास किया है। माताओं-बहनों का सहयोग चाहे वो बच्चों में संस्कार देने की बात हो या फिर मंदिर-मंदिर पूजा-अर्चना, विधान-आरती, आहार-भोजन आदि सेवा-भक्ति के कार्य हो या फिर समयानुसार जरूरतों में जुड़ाव की बात हो, महिलायें अपनी अग्रणी भूमिका निभाती हैं।

इसीलिए ललितपुर (उ.प्र.) के महिला सम्मेलन के बाद शनिवार 20 सितंबर को देहरादून में आचार्य श्री सौरभ सागरजी तथा रविावर 28 सितंबर को अहमदाबाद में आचार्य श्री सुनील सागरजी के पावन सान्निध्य में नारी शक्ति के आह्वान रूपी महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया है। इसी कड़ी में शीघ्र अयोध्या, कोलकाता, दिल्ली में भी महिला सम्मेलन आयोजित किये जायेंगे।

स्थापना वर्ष समिति के चेयरमैन जवाहरलाल जैन जी ने सान्ध्य महालक्ष्मी को बताया कि महिलायें तीर्थ सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान कर सकती है। तीर्थों की यात्रायें, तीर्थ सुरक्षा संबंधी सांस्कृतिक आयोजन, तीर्थों पर विभिन्न प्रतियोगितायें – कार्यशालाएं तथा साथ ही छोटी-छोटी बचत की प्रेरणा देने वाली अपने-अपने परिवार से छोटी-छोटी राशि तीर्थ संवर्धन के लिये योगदान देकर यानि तीर्थों की आन-बान-शान के लिये तन-मन-धन से यथासंभव योगदान।

सभी कार्यक्रमों की अध्यक्षता तीर्थक्षेत्र कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जम्बू प्रसाद जैन करेंगे। उन्होंने कहा कि तीर्थों के योगदान के लिये, उससे संबंधित कार्यक्रमों में भाग लेकर हर किसी को अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिये।

यह कहने में गर्व की ही अनुभूति होती है कि महिलाओं ने अपनी पवित्रता, अटूट आस्था, गहन सेवाभाव और नि:स्वार्थ समर्पण से दिगंबर जैन धर्म की जड़ों को सींचा है।