एक हजार सम्पन्न मंदिरों को जोड़ें तीर्थक्षेत्र कमेटी से – आचार्य श्री प्रज्ञ सागरजी

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02 सितम्बर 2025 / भाद्रपद शुक्ल दशमी /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
बाहुबली एन्क्लेव में धर्मसभा के बाद आचार्य श्री प्रज्ञ सागरजी से चैनल महालक्ष्मी की चल-अचल तीर्थों की सुरक्षा पर 12 अगस्त को चर्चा हुई। इस संबंध में आचार्य श्री ने कहा कि तीर्थक्षेत्र कमेटी देश भर से एक हजार मंदिर को चुन ले और उनको सदस्य बनायें। प्रत्येक मंदिर गुल्लक योजना, सदस्य योजना, कलश योजना, सभी या कुछ के साथ हर वर्ष तीर्थक्षेत्र कमेटी को एक लाख रुपये सहयोग दे। एक हजार सम्पन्न मंदिर, आपको 25 हजार में से मिल भी जाएंगे। बस आपको चिह्नित करना है, जैन मंदिरों का यथोचित सम्मान करना है, जोड़ना आपको होगा। इस पर सान्ध्य महालक्ष्मी ने कहा कि बिना साधुओं के उद्बोधन, आशीर्वाद के बिना आज यह संभव नहीं हो पाता। इस पर आचार्य श्री ने कहा कि संतों का आशीर्वाद जरूर लें, पर एक को आगे कर उनके ही दिशा-निर्देश में चलना होगा। एक-दो बार कमेटी के 3-4 लोग जायें, तो यह संभव हो सकता है और इस तरह 10 करोड़ का फंड हर वर्ष मिल सकेगा।

इससे पूर्व धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि प्राणों के मिलने (संयोग) को जन्म और प्राणों के बिछुड़ना ही (नियोग) मरण है। ये मिट्टी से बना शरीर श्वासो-छास प्राण के रहते समय तक जिन्दा है, पर चेतना श्वासोच्छास से नहीं, चैतन्य से जिंदा है, थी और रहेगी। जीव और आत्मा एक नहीं है। प्राण सहित रहने पर जीव है, आत्मा को दस प्राणों की जरूरत नहीं। जब तक दस प्राण हैं, तब तक पंचेन्द्रिय जीव है। श्वासोच्छास उसका उत्तर है। इसीलिये जीव की हिंसा-अहिंसा कहा है। आत्मा की हिंसा नहीं होती। जीव की रक्षा करना धर्म है और आत्मा तो रक्षित ही है, अविनाशी है। निश्चय से मैं अहिंसक ही हूं, न मार सकता हूं, न मर सकता हूं, पर व्यवहार से हिंसा-अहिंसा है। आयु कर्म से ही जीव का जन्म-मरण है। संसार के सारे जीव प्राणों से जीते हैं। अनंत काल से हमारी आत्मा जीव के साथ जी रही है। आप जो भोजन लते हैं, वो प्राणों की रक्षा के लिये। ध्यान रखना जीव को मात्र शरीर या मात्र आत्मा नहीं कहा। इनकी मिश्र पर्याय ही जीव है। जीव को सुरक्षित रखकर ही आत्मा का ध्यान संभव है। प्राणों से जीने वाला जीव है और जो प्राणों के बिना जिये, वो सिद्धात्मा है।